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Categories: बीच बहस

सु्प्रीम कोर्ट के अन्याय के शिकार 48 हजार झुग्गीवासियों को फिर जरूरत है एक वीपी सिंह की!

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के भीतर 70 किलोमीटर रेलवे ट्रैक के आस-पास 48 हजार झुग्गी- झोपड़ियों को 3 महीने में हटाने के निर्देश 31 अगस्त को जारी कर दिए हैं। फैसले की जानकारी मिलने के बाद से मैं जब बहुत बेचैन हूं तब दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों में बसने वाली 47 प्रतिशत आबादी विशेष तौर पर ढाई लाख झुग्गीवासियों की बेचैनी समझी जा सकती है।

कोरोना काल मे झुग्गियों  के रहने वाले निवासी कहाँ जाएंगे? नया घर कैसे बनाएंगे, ऐसे समय में जब उनके रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं है। इस परिस्थिति की ओर जस्टिस अरुण मिश्र की बेंच का ध्यान क्यों नहीं गया, यह फैसले का सबसे महत्वपूर्ण एवम दुखद पक्ष है। जो संवेदनहीनता की पराकाष्ठा दर्शाता है।

न्याय की सर्वोच्च पंचायत बिना पुनर्वास की व्यवस्था का आदेश दिए कैसे लाखों गरीबों को बेघर करने का निर्देश दे सकती है, यह मेरी समझ के परे है। भारत का संविधान हर नागरिक को सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है।  संवैधानिक अधिकारों के पालन में यदि कोई कोताही की जाती है तो पालन कराने की जिम्मेदारी सर्वोच्च न्यायालय की मानी जाती है। इसीलिए सभी तरफ से एक ही आवाज़ आ रही है कि सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला किया है न्याय नहीं। विशेष तौर पर इसलिए क्योंकि झुग्गीवासियों का पक्ष सुना ही नहीं गया।

ढाई लाख गरीबों को बेघर करना और उसी बेंच द्वारा अडानी को 5 हज़ार करोड़ की छूट देना ऐसा संयोग नहीं है जिसे नज़र अंदाज़ किया जाए। मैं इस फैसले को रेलवे के निजीकरण के साथ जोड़कर देखता हूं। जब कोई संपत्ति बेचनी होती है तो उसके पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि उसमें कोई भी अतिक्रमणकारी ना रहे। मोदी सरकार  600 रेलवे स्टेशन तथा 51 रेलवे ट्रैक बेचने के बाद लगता है अब रेलवे की जमीन को बेचने का मन बना चुकी है। इसलिए गरीबों से जमीन खाली कराई जा रही है।

इसी तरह का एक प्रयास सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से एक करोड़ तथाकथित अतिक्रमणकारी आदिवासियों  से जंगल को खाली कराने की मंशा से किया था। यह बात अलग है कि आदिवासी संगठनों के भारी विरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा।

यह पहली बार नहीं है जब, रेलवे ट्रैक के आसपास अतिक्रमण को खाली कराने का निर्देश न्यायालय द्वारा दिया गया हो। पहले कई बार उच्च न्यायालय द्वारा इस तरह के निर्देश दिए जाते रहे हैं। परंतु पिछली मार्च को शकूरबस्ती की झुग्गियों को हटाने के बारे में दिए गए निर्देश में स्पष्ट तौर पर दिल्ली स्लम एंड जे जे रिहैबिलिटेशन एंड रिलोकेशन पॉलिसी को लागू करने के आदेश दिए थे।

इसके पहले भी निरमी कॉलोनी को लेकर 8 अगस्त, 2007 के मामले में निर्देश आया था। झुग्गी बस्ती का मुद्दा 30 जनवरी, 1995 को दिलीप की पुलिस हिरासत में हुई मौत के बाद  प्रदर्शनकारियों पर हुए गोली चालन के समय 3 नागरिकों की मौत के बाद भी सामने आया था। कठपुतली कॉलोनी का संघर्ष कभी दिल्ली वाले भूल नहीं सकते।

लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पहली बार निर्देश देते हुए यह कहा गया है कि इस मामले में कोई राजनैतिक हस्तक्षेप ना करे और कोई अदालत का स्टे मान्य नहीं होगा। मुझे नहीं मालूम कि सर्वोच्च न्यायालय को कब से यह अधिकार मिल गया कि वह तय करे कि राजनीतिक दल कौन से मुद्दे को उठाएंगे और कौन से नहीं ? यह स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार से जुड़ा मामला है।

जिसे इस तरह सर्वोच्च न्यायालय सीमित नहीं कर सकता। यह देखना दिलचस्प होगा कि देश के राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट की गीदड़ भभकी से डर जाएंगे या झुग्गी वासियों को न्याय दिलाने के संघर्ष में कूदेंगे। दिल्ली के रेलवे ट्रैक को लेकर एक बार दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसी तरह का फैसला दिया था। उस समय क्या हुआ था, यह मैं लोगों को याद दिलाना चाहता हूं।

तब मैं मुलतापी से विधायक था। पर दिल्ली में उन दिनों था। पूर्व प्रधानमंत्री श्री वीपी सिंह जी का फोन आया और उन्होंने मुझे अपने निवास पर बुलाया। वहां दिल्ली के अशोक विहार के झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले निवासी बैठे हुए थे। उनके पास में दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देश की कॉपी थी, जिसमें झुग्गियों को अगले दिन हटाने का आदेश दिया गया था। श्री वी पी सिंह जी ने मुझसे पूछा इसमें हम क्या कर सकते हैं?  मैंने सुझाव दिया कि आंदोलन ही एकमात्र रास्ता है। उन्होंने कहा कि आप बतलाइए क्या करना है, मैं मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री रहा हूं लेकिन मुझे आंदोलन करने का अनुभव नहीं है।

मैंने कहा कि हम शाम को वहां जाएंगे तथा आंदोलन की रूपरेखा झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के बीच में जाकर बनाएंगे। शाम को अशोक विहार में सभा रखी गई। वीपी सिंह जी ने हज़ारों झुग्गीवासियों के बीच मंच से वही बात कही जो बात अपने घर पर कही थी। उन्होंने कहा कि अब डॉ. सुनीलम आगे के आंदोलन की रूपरेखा बतलाएंगे। मैंने कहा कि सामने जो बुलडोजर खड़े हैं वे जब तक वापस नहीं चले जाते तब तक वीपी सिंह जी यहीं रुकेंगे। बुलडोजर चलेगा तो वीपी सिंह जी की छाती पर चलेगा, झुग्गी पर नहीं।

मैंने बुलडोजर के सामने झुग्गी झोपड़ीवासियों से अहिंसक सत्याग्रह करने की अपील की। सब ने हाथ खड़े कर के स्वीकृति दी। सभा खत्म होने के बाद मैंने वीपी सिंह जी से पूछा कि अब आपका आगे का क्या कार्यक्रम है? उन्होंने कहा कि आपने ऐलान कर दिया है जब तक बुलडोजर वापस नहीं जाते तब तक मैं यहीं रुकूंगा। इसलिए अब रात को यहीं रुकना है। जब अंधेरा हुआ और बहुत ज्यादा मच्छर मुझे दिखे तथा पास के नाले की बदबू असहनीय लगने लगी तब मुझे मन में ग्लानि होने लगी कि एक ऐसा व्यक्ति जिसको हर दूसरे दिन डायलिसिस करानी होती है उन्होंने मुझ पर भरोसा किया और मैंने उन्हें फंसा दिया। यह बात मैंने वीपी सिंह जी से कही उन्होंने कहा कि

आपने ठीक किया कोई चारा नहीं था, अब आप अपने साथियों को बुलाइए। मैं समझ गया वे क्या चाहते हैं मैंने सीताराम येचुरी जी, डी राजा जी, राम विलास पासवान जी और रघुवंश प्रसाद सिंह जी को फोन किया। सभी आए भी सभा भी हुई।  देर रात दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी आईं। उन्होंने कहा कि मेरे जीते जी  आप रात को ऐसी स्थिति में यहां नहीं बैठ सकते। आपका स्वास्थ्य और जीवन हम सब के लिए बहुमूल्य है।

उन्होंने वीपी सिह जी से घर जाने का आग्रह करते हुए कहा कि आप जाइए मैं यहां तब तक रुकूंगी जब तक आप की घोषणा के मुताबिक बुलडोजर वापस नहीं हो जाते। वीपी सिंह जी ने उन्हें मुख्यमंत्री के उच्च न्यायालय के निर्देश के खिलाफ बैठने पर उत्पन्न होने वाली कानूनी स्थिति के प्रति आगाह किया । शीला जी ने कहा आप निश्चिंत रहिए। मैं रास्ता निकाल लूँगी। अगले दिन बुलडोजर लौट गए।

आज दोनों हमारे बीच नहीं हैं पर मैं दोनों को सलाम करता हूँ। यह उल्लेख करना आवश्यक समझता हूं कि इस घटना ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि इस अनुभव के बाद आजीवन वीपी सिंह जी झुग्गीवासियों के लिए लड़ते रहे। डायलिसिस के लिए अस्पताल से आते जाते झुग्गियों को बचाने के लिए मोहल्ले मोहल्ले चले जाते थे। सर्वोच्च न्यायालय का वर्तमान फैसला आने और विशेष तौर पर सुप्रीम कोर्ट के यह आदेश देने के बाद राजनीतिक दल हस्तक्षेप न करें अब क्या होगा यह कहना मुश्किल है।

क्या अरविंद केजरीवाल 48 हजार झुग्गी वासियों को बचाने के लिए वीपी सिंह जी या शीला दीक्षित जी की तरह की कार्यवाही करने की हिम्मत दिखाएंगे? क्या दिल्ली में झुग्गी झोपड़ियों के बीच कार्य करने वाले संगठन एक साथ आकर संघर्ष का ऐलान करेंगे?

क्या राहुल गांधी और प्रियंका गांधी या संपूर्ण विपक्ष मिलकर 48 हजार झुग्गी झोपड़ियों को बचाने या उनका संपूर्ण पुनर्वास कराने के लिए संघर्ष छेड़ेगा?  उच्चतम न्यायालय की आंखों की किरकिरी बने प्रशांत भूषण और उनके साथियों के लिए यह परीक्षा की घड़ी होगी कि वह लाखों गरीबों के आवास का अधिकार दिलाने के लिए क्या कुछ करते हैं ?

मेधा पाटकर जी ने घर बचाओ-घर बनाओ आंदोलन के माध्यम से मुम्बई में लाखों झुग्गीवासियों की झुग्गियां बचाई हैं। उन्हें जमीनें दिलाई हैं। क्या वे नर्मदा घाटी में बाढ़ की स्थिति के बावजूद दिल्ली में इस संघर्ष के लिए आगे आएंगी ? फिलहाल वृंदा करात जी ने तो रेलवे मंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग कर आंदोलन की दिशा में बढ़ने की शुरुआत कर ही दी है।

अगले तीन महीने में सब स्पष्ट हो जाएगा। पर यह तो कहा ही जा सकता है कि रेलवे को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का परिपालन करना आसान नहीं होगा। दिल्ली की झुग्गीवासियों का संघर्ष आने वाले समय की राजनीति का प्रस्थान बिंदु भी साबित हो सकता है।

(डॉ. सुनीलम समाजवादी नेता हैं। आप मध्य प्रदेश विधानसभा के विधायक भी रह चुके हैं।)

This post was last modified on September 8, 2020 9:47 am

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