Sunday, March 3, 2024

आज़ादी एक अधूरा शब्द नहीं है?

पिछली सदी के आखिरी पहर में अद्वितीय लेखक-पत्रकार राजकिशोर की एक किताब आई थी। उसमें छीजती हुई आज़ादी की चिंता के साथ लिखे उत्कृष्ट और विचारोत्तेजक निबंधों में पहला निबंध ही यही था: ‘आजादी एक अधूरा शब्द है’। इस निबंध में राजकिशोर लिखते हैं,

“आज़ादी का एक और अर्थ है असहमति। जो चीजें आदमी की आज़ादी के खिलाफ हैं, उनके ख़िलाफ़ अपनी राय ज़ाहिर करने की हिम्मत। उन्हें बदलने के कोशिश। आज़ाद व्यक्ति में ही असहमत होने का माद्दा होता है। वही अपनी असहमति प्रदर्शित भी कर सकता है। पर हमने आज़ादी को कल्पवृक्ष ही समझा। और यही वजह है कि दिन-प्रतिदिन हमारी आज़ादी छीजती गई है। जिस चीज का इस्तेमाल नहीं होता, उसमें जंग लग जाता है। वह धीरे-धीरे व्यर्थ हो जाती है, जिन्होंने आज़ादी का इस्तेमाल किया, वे मजबूत होते गए। नेता, मंत्री, पूंजीपति, अफसर, व्यापारी, तस्कर, गुंडे। जिनके लिए आज़ादी गहना भर थी, वे कमजोर होते गए। आज़ादी आभूषण नहीं है, जिसे पहनकर हम इतरा सकें। वह हथियार है, लड़ने का हथियार। एक तरह की आज़ादी से दूसरे तरह की आज़ादी तक जाने का हथियार। राजनीतिक आज़ादी से आर्थिक आज़ादी तक। आर्थिक आज़ादी से सामाजिक आज़ादी तक। सामाजिक आज़ादी से व्यक्तिक आज़ादी तक। सिर्फ़ आज़ादी का कोई मतलब नहीं होता। यही कारण है कि हर 15 अगस्त और ज्यादा उदासी लिए आता है।”

फिर आ धमका है 15 अगस्त। सोचता हूं आज राजकिशोर जीवित होते तो क्या कहते? राजकिशोर शुरू से ही आज़ादी पर नज़र रखे हुए थे। आज़ादी के बीस वर्ष बीत गए, पर देश से गरीबी नहीं गई। आज़ादी के 25 वर्ष बीत गए, पर बच्चों को दूध नसीब नहीं हुआ। आज़ादी के 30 वर्ष बीत गए, पर गरीब को न्याय नहीं मिलता। आज़ादी के 31 वर्ष बीत गए, पर गांवों में पीने का पानी नहीं है। आज़ादी के 32 वर्ष बीत गए, पर…., आज़ादी के 40 वर्ष बीत गए, पर ….।

उन्हें निरंतर यह चिंता सताती रही कि जो आज़ादी हमने हासिल की थी उस आज़ादी का हमने क्या किया। उन्होंने लिखा,

हम लगातार आज़ादी शब्द से धोखा खाते रहे हैं। इसे भारतीय जनता ने किसी सुहागिन की तरह सिंदूर बनाकर अपनी मांग में लगा रखा है और समझती रही है कि उसके सारे कलेश दूर हो जाएंगे, लेकिन आज़ादी एक अधूरा शब्द है। यह पूरा तब होता है जब हम इसका इस्तेमाल करते हैं। आज़ादी कोई सूर्य नहीं है, जिससे अनायास रोशनी आती रहती है। आज़ादी कोई नदी नहीं है, जिसके पानी से हम अपनी प्यास बुझा सकें। न ही आज़ादी लंगरखाना है, जहां मुफ्त खाना बंटता हो। हम आज़ादी से कोई उम्मीद करते हैं तो इसका एक मतलब है कि हम आज़ाद नहीं हुए। हमारी गुलामी नहीं गई। पर-निर्भरता नहीं मिटी। जो आज़ाद होता है वह किसी से कुछ मांगता नहीं। उम्मीद नहीं करता। वह अपने हक़ के लिए लड़ता है। निष्क्रिय, निठल्ले आदमी के लिए आज़ादी एक झूठा शब्द है- अधूरा शब्द है।

चलिए मान लिया कि जो आज़ाद होता है वह अपने हक़ के लिए लड़ता है। जो अपने हक़ या दूसरों के हक़ के लिए लड़ता है, क़ैद कर लिया जाता है तो उसकी आज़ादी कहां जाती है? लड़ ही तो रहे थे वरवर राव, गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, प्रो. साईबाबा और कितने सारे लोग। सब आज सलाखों के पीछे क़ैद हैं। गाते रहिए क़ैदख़ानों के अंधेरे कोनों में बैठकर,
मताए लौहो-कलम छिन गई तो क्या गम है
कि खूने-दिल में डुबो ली हैं उंगलियाँ मैंने

कहीं कोई सुनवाई नहीं है। मीडिया बिक चुका है। संसद में सब साथ-साथ हैं। अदालतें….. सर्वोच्च न्यायालय के चार सीनियर जज प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मुख्य न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं और उन्हें लोकतन्त्र के जनाज़े पर फूलमाला चढ़ाते हुए अभी थोड़े दिन पहले ही हमने देखा। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य जज के बारे में सर्वोच्च नयायालय के मुख्य न्यायाधीश को हमने कहते सुना कि वह पागल हो गया है। सर्वोच्च नयायालय के मुख्य न्यायाधीश की मानें तो यह मान लिया गया कि कोई न्यायाधीश भी पागल हो सकता है, भ्रष्ट हो सकता है, द्वेषी हो सकता है, किसी दबाव में आकर कोई फ़ैसला दे सकता है।

सीजेआई गोगोई पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली महिला को फिर से बहाल किए जाने के बाद ‘राममंदिर’ के पक्ष में हुए फैसले के बाद ‘रामलला’ की मेहरबानी से राज्यसभा की सीट पक्की हो सकती है। प्रशांत भूषण को सज़ा हो सकती है। अब अपनी आज़ादी वाली पीपणी लेकर आज़ाद आदमी कहां जाए?

क्या वजह है कि मोदी राज में पत्रकार भी अब भीड़ का निशाना बन रहे हैं? भीड़ पर कोई कानून लागू नहीं होता. इसलिए इस भीड़ की मदद से सबसे ज्यादा प्रयोग मोदी राज में हुए। फरवरी में जब दिल्ली में अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ भाजपा नेताओं ने पूरी आज़ादी के साथ नारे लगाए ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो, …. को’ तो भीड़ इशारा समझ रही थी कि किसको गोली मारने की बात भाजपा नेता कर रहे हैं। जमके हुई हिंसा, लाशें गिरीं, खून बहा। वहां भी भीड़ बड़ी अच्छी तरह से जानती थी कि कौन इस नफ़रत की राजनीति के खिलाफ़ लिखता है, भीड़ ने उसी को अपना निशाना बनाया।

न्यूज़ एक्स की वरिष्ठ पत्रकार श्रेया चैटर्जी, टाइम्स नाउ की प्रवीना पुरकायस्था, टाइम्स ऑफ इंडिया के अनिंद्य चटोपाध्याय, रायटर्स के दानिश सिद्दकी और कई अन्य पत्रकारों को भीड़ ने अपना निशाना बनाया। अपना काम ईमानदारी से करने के लिए अखबार ‘हिन्दू’ के उमर रशीद और कन्नड़ अखबार ‘वरथा भारती’ के इस्माइल जॉर्ज, जहां एक तरफ भीड़ के गुस्से का शिकार हुए वहीं दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस ने भी इनकी जमकर ‘खातिर-सेवा’ की।

यह रुझान कोविड19 के दौरान की गई तालाबंदी में भी जारी रहा। राइट्स एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप की एक रिपोर्ट के मुताबिक 25 मार्च से 31 मई के दौरान 55 पत्रकारों के विरुद्ध अलग-अलग तरह की पुलिस कारवाई की गई। कईयों के विरुद्ध केस दर्ज किए गए, कईयों को नज़रबंद किया गया, कईयों को सम्मन और कारण बताओ नोटिस जारी किए गए।

बीते दिनों उत्तर-पूर्वी दिल्ली में कारवां के तीन पत्रकारों के साथ भीड़ ने मारपीट की। शायद कपिल मिश्रा जानते हों वह कौन थे? अयोध्या में राम जन्मभूमि पूजन की पूर्व संध्या को खुद को केंद्र सरकार के बंदे बताने वाले कुछ लोगों ने पत्रकारों को पीटा और महिला पत्रकार के साथ दुर्व्यवहार करने के बाद यह भी बताया हमारे खिलाफ़ यहां पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं करती। बोलो, जय श्री राम।

सफूरा जरगर।

अब पुलिस नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ़ आंदोलन में हिस्सा लेने वालों पर अपना हाथ साफ करने पर जुटी है। गुलफ़िशां फातिमा, सफ़ूरा ज़र्गर, देवांगना कालीता, नताशा नरवाल और अन्य को गिरफ्तार किया गया है। इस केस में बुद्धिजीवियों और सामाजिक चिंतकों जैसे हर्ष मंदर, अपूर्वानंद, योगेंद्र यादव आदि को घसीटा जा रहा है। घंटों पुलिस स्टेशन में बैठाकर नाहक पूछताछ की जा रही है। इस काम के लिए सरकार ने उन्हें पूरी आज़ादी दे रखी है।

अब सर्वोच्च न्यायालय ने पूरी आज़ादी के साथ प्रशांत भूषण को भी घेर लिया है। सौ हाथ रस्सा सिरे पर गांठ यह कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन तमाम लोगों से उनकी आज़ादी छीन ली है जो उनका विरोध कर रहे हैं और जो बचे हुए हैं वह इसलिए कि उनकी आवाज़ अभी वहां तक नहीं पहुंची है।

‘सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं और हर कोई अपनी निजता में अपना संप्रभु शासक है।’ यह बात जॉन लॉक ने कही थी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने जॉन लॉक को झूठा साबित नहीं कर दिया है? तीन हजार से अधिक जातियों-उपजातियों में बंटे हुए इस समाज में जहां जाति प्रथा ही हिंदू तत्व का सबसे मजबूत किला है, मनुष्य के पास आज़ादी हासिल करने का क्या कोई रास्ता है? एक नवजात शिशु का खतना, मुंडन, बैपटिज़्म या अमृत-पान करवा कर सबसे पहले उसका परिवार ही उसकी ‘इंसान’ बने रहने की आज़ादी छीनकर उसे हिंदू, सिख, ईसाई या मुसलमान नहीं बना देता है?

आम आदमी के व्यक्तित्व से जुड़ी धर्म की इन्हीं बेड़ियों को क्या राजनीतिक दल इस्तेमाल नहीं करते हैं? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिल जाते क्या आज़ादी एक अधूरा शब्द नहीं है?

सवाल-दर-सवाल है, हमें जवाब चाहिए।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल लुधियाना में रहते हैं।)

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