Tuesday, October 19, 2021

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फ्रेंच प्रधानमंत्री एडवर्ड फिलिप की कुर्सी भी हो गयी कोरोना की शिकार!

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कोरोना संकट के बीच, फ्रांस के प्रधानमंत्री एडवर्ड फिलिप ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनकी जगह 55 वर्षीय जीन कास्टेक्स ने ली है। मीडिया के अनुसार नये प्रधानमंत्री कास्टेक्स फ्रांस की आम जनता के लिए उतना जाना पहचाना नाम नहीं है। हालांकि वे एक सीनियर नौकरशाह हैं और दक्षिण में स्थित शहर परेड (Prades) के मेयर रहे हैं। एड्वार्डो फिलिप की तरह वे भी दक्षिणपंथी रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य रहे हैं।

बढ़ते हुए कोरोना संकट ने एडवर्ड फिलिप की कार्यकुशलता पर बहुत सारे सवाल खड़ा किया। मिसाल के तौर पर जिस वक़्त फिलिप ने अपने पद से इस्तीफा दिया उस वक़्त फ्रांस में 1 लाख 60 हज़ार से भी ज्यादा मामले सामने आ चुके थे। याद रहे कि फ्रांस की जनसंख्या 6.7 करोड़ है। मतलब यह कि फ़्रांस की जनसंख्या भारत की जनसंख्या से लगभग 20 गुना कम है।

ताज़ा आंकड़े के मुताबिक फ्रांस में अब तक कुल 1 लाख 66 हज़ार मामले आ चुके हैं, वहीं भारत में 6 लाख 99 हज़ार केस ‘पॉजिटिव’ पाए गए हैं। अगर जनसंख्या अनुपात के मुताबिक देखा जाए तो फ्रांस में आबादी के अनुपात में ‘पॉजिटिव रेट’ ज्यादा है। अगर भारत के बराबर फ्रांस की जनसंख्या होती तो वहां पॉजिटिव केस बढ़कर 33 लाख के करीब होते। हालांकि भारत में भी हालात संतोषजनक नहीं हैं और यहाँ भी ‘अंडर-रिपोर्टिंग’ अर्थात आंकड़े छुपाए जाने का अंदेशा जताया जा रहा है। भारत सरकार भी लोगों को स्वास्थ्य और अन्य ज़रूरी सुविधा मुहैया कराने में भी बुरी तरह नाकाम रही है।   

बढ़ते कोरोना संकट के दौरान फ़्रांस के स्वास्थ्यकर्मी अपनी सुरक्षा के लिए मेडिकल संसाधनों की मांग कर रहे हैं, लेकिन कई मौकों पर सरकार ने उनकी मांगों से अपनी ऑंखें मूंद लीं। वहां स्थिति एक आपदा बन चुकी थी। कई जगहों से ऐसी रिपोर्ट भी आई कि श्रमिकों के लिए मास्क, दस्ताने और हाथ की सफाई और परीक्षण करने वाले किट तक उपलब्ध नहीं थे। हेल्थ उपकरणों की कमी के कारण बहुत सारे डॉक्टर, नर्स और मेडिकल स्टाफ की मृत्यु भी हुई है।

मगर फिलिप सरकार की अवाम विरोधी नीतियां थमने का नाम नहीं ले रही थीं। श्रमिकों के अधिकार पर चोट करने के लिए एक के बाद एक पॉलिसी बनती रही। मजदूरों के काम करने की अवधि बढ़ने का ‘प्लान’ तैयार किया गया। साथ साथ स्वस्थ पर बजट की कटौती का सिलसिला चलता रहा। इनसे नाराज़ होकर स्वास्थ्यकर्मी प्रदर्शन करने को बाध्य हुए। स्वास्थ्य सुविधा मुहैया न कराने के लिए भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार भी जनता की नाराज़गी झेल रही है। 

पिछले कुछ समय से फ्रांस में फिलिप की सरकार के विरोध में फ़्रांस में पेंशन में कटौती के खिलाफ भी ज़बरदस्त मुज़ाहरा हुआ, जिसमें रेलवे के मजदूरों ने भी हिस्सा लिया है। इसके अलावा ‘येलो वेस्ट’ प्रदर्शन ने भी प्रधानमंत्री फिलिप की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। प्रदर्शनकारी इंधन पर बढ़ाये जा रहे टैक्स के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे। देखते ही देखते यह आन्दोलन वर्ग असमानता के खिलाफ सड़कों पर फ़ैल गया। आन्दोलन की मांग को पूरी करने के बजाय प्रधानमंत्री फिलिप ने ताक़त का इस्तेमाल किया और इसे कुचलने की कोशिश की। कई शहरों में प्रदर्शन पर पाबन्दी लगा दी। इन दमनकारी नीतियों ने फिलिप के खिलाफ फ्रेंच अवाम का गुस्सा और बढ़ा दिया।

संक्षेप में कहें तो बढ़ते कोरोना संकट के दौरान, अवाम को राहत पहुंचाने में एडवर्ड फिलिप की सरकार नाकाम रही। अंग्रेजी ‘गार्डियन’ ने हाल में एक रिपोर्ट में छापी है जिसमें कहा गया कि “जैसे-जैसे कोरोनावायरस फ्रांस में फैला, वैसे-वैसे प्रधानमंत्री की प्रभावशाली दाढ़ी सफेद होती गई”। 

कोरोना महामारी फिलिप के लिए मुसीबत बनती गयी और उनकी सियासी कुर्सी वेंटिलेटर पर चली गई। फ्रांस में वैसे ही अर्थव्यवस्था ख़राब हालत में थी। कोरोना ने इसे और ख़राब कर दिया। शुक्रवार को अपने भाषण में नये प्रधानमंत्री जीन कास्टेक्स ने भी कोरोना संकट की बात का ज़िक्र किया और कहा कि दुर्भाग्य से अभी तक यह खत्म नहीं हुआ है। हालांकि ‘द टेलीग्राफ’ का कहना है कि 49-वर्षीय फिलिप ने कोरोना संकट को अच्छे तरीके से हल किया है और इससे उनकी लोकप्रियता राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रोन से ज्यादा बढ़ी है और फिलिप 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में मैक्रोन के प्रतिद्वंदी साबित हो सकते हैं। कुछ इस तरह की बात भारत में भी खबर में आई थी जब दावा किया गया कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता कोरोना महामारी के बीच बढ़ गई है!

इसी बीच फ्रांस की एक अदालत ने सरकार ने खिलाफ एक जाँच बैठा दी है। जांच इस बात की होगी कि सरकार ने कोरोना संकट का सामना किस तरह से किया। कर्मचारी संघों और डॉक्टरों की शिकायत के बाद शुरू की गई इस जांच में सरकार के तीन अहम व्यक्तियों की भूमिका पर विचार किया जाएगा जिनमें निवर्तमान प्रधानमंत्री एडवर्ड फिलिप भी शामिल हैं। 

मीडिया की खबर के अनुसार, सीनियर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर फ्रैंक्वोएस मोलिन ने कहा है कि जांच के दायरे में एड्वार्डो फिलिप भी आयेंगे और फरवरी में इस्तीफा देने वाली स्वास्थ्य मंत्री एग्नेस बुज़ीन और उनके बाद के स्वास्थ्य मंत्री ओलिवर बुरान आयेंगे।

हालांकि यह बात सही है कि कोरोना महामारी के दौरान प्रधानमंत्री फिलिप और राष्ट्रपति मैक्रोन के बीच ज़बरदस्त असहमति उभर आई थी। फेंच मीडिया में ऐसी ख़बरें गश्त कर रही थीं कि फिलिप और मैक्रॉन के बीच आपसी संबंधों में तनाव पैदा हो गया था। विवाद का विषय यह था कि फ्रांस के अन्दर लगाये गए आठ सप्ताह के लॉकडाउन को कैसे और कहाँ ख़त्म  किया जा जाये। 

ख्याल रहे कि फ्रांस में राष्ट्रपति ही गणराज्य और कार्यपालक के प्रमुख होते हैं। प्रधानमंत्री की नियुक्ति भी राष्ट्रपति ही करते हैं। इस प्रकार फ्रांस के राष्ट्रपति के अधिकार यूरोप के अन्य देशों के नेताओं की तुलना में काफी अधिक हैं। साल 2017 में 39 साल की उम्र में राष्ट्रपति बनकर मैक्रोन ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया था। नेपोलियन के बाद वह फ्रांस के सब से कम उम्र में राष्ट्रपति के ओहदे पर विराजमान हुए हैं।

(अभयकुमार एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। इससे पहले वह ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ काम कर चुके हैं। हाल के दिनों में उन्होंने जेएनयू से पीएचडी (आधुनिक इतिहास) पूरी की है। अपनी राय इन्हें आप debatingissues@gmail.com पर मेल कर सकते हैं।)

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