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Thursday, August 5, 2021

कारपोरेट और शोषण परस्त नीतियों के खिलाफ दरकार है एक मुकम्मल लड़ाई की

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गणतंत्र दिवस पर पिछले दो महीनों से भी अधिक समय से दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले किसानों के ट्रैक्टर मार्च के साथ जो कुछ देखने को मिला है, वह अपने आप में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को खड़ा करता है। ये प्रश्न किसी भी पूंजीवादी लोकतंत्र में किसी न किसी समय आने ही थे, और जिस नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के चरण में भारत प्रवेश कर चुका है, उसमें ऐसा होना लाजिमी था।

पिछले कुछ दशकों से मिश्रित अर्थव्यवस्था, गुट निरपेक्षता सहित पंचशील सिद्धांतों की देश ने कब तिलांजलि दे दी, उसकी किसी ने सुध ही नहीं ली। याद रखें, सिर्फ मनुष्य का ही रूपांतरण नहीं होता, बल्कि राष्ट्र भी सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक बदलावों के दौर से गुजरते हुए कब अपना रूपांतरण कर लेता है, उसका अंदाजा खुद उसमें जी रहे लोगों को कई बार अहसास में नहीं होता।

72 वर्ष पूर्व अंग्रेजों की दासता से मुक्ति पर देश के नीति निर्माताओं ने जिस मिले जुले संविधान और राज्य की स्थापना की थी, उसके लिए संविधान सभा द्वारा 26 जनवरी 1950 में जिन मूल्यों के साथ गणतंत्र की संकल्पना की गई थी, उससे हम काफी दूर चले आये हैं। थामस पिकेटी के अनुसार 1950 से लेकर 1980 के बीच में भारत के सबसे अधिक गरीब जनसंख्या की आय में जो वृद्धि देखने को मिली, उसकी तुलना में सबसे समृद्ध 10% लोगों की आय में वृद्धि देखने को नहीं मिली थी। लेकिन 80 के दशक से ही नीतियों में बदलाव और 90 के दशक के बाद इसने जो रफ्तार पकड़ी, वह 2010 के दशक तक आते-आते पूरी तरफ से बुलेट ट्रेन की रफ्तार पकड़ चुकी थी।

90 के दशक से ही भारतीय क्रोनी पूंजी ने खुलेआम कहना शुरू कर दिया था कि कांग्रेस और भाजपा मेरी दो जेबों में हैं। रिलायंस के शेयर देश के करीब करीब सभी इलीट तबकों के बीच में अपनी पैठ बना चुका था। अर्थात रिलायंस का हित ही देशहित में कब बदल गया, इसका अंदाजा देश ने नहीं लगाया। संसद में नीतियों के निर्धारण में बजट में से लीक सूचनाओं से कैसे पूंजीपतियों के एक हिस्से में इस सूचना से करोड़ों अरबों के वारे-न्यारे होने लगे, और प्रतिद्वंद्वी को धूल चटाना संभव हो गया, हम इसकी बानगी देखते रहे।

इसी प्रकार पहले जहाँ चुनावी राजनीति में शामिल तमाम राष्ट्रीय दलों को अपने-अपने चुनावों को जीतने के लिए अक्सर ही टिकट बेचने पड़ते थे, उसकी जगह पर मुंबई के धनकुबेरों पर अतिशय निर्भरता ने पूरे संसदीय लोकतंत्र के ताने-बाने को ही बदलकर रख दिया। इस मामले में तबके प्रमोद महाजन की भूमिका को कई समीक्षक बखूबी जानते हैं। कइयों का तो मानना था कि यदि प्रमोद महाजन जिन्दा होते तो आज हम नरेंद्र मोदी का नाम ही नहीं जानते। कांग्रेस इस मामले में भाजपा से दोयम दर्जे की साबित हुई। उसके पास 2000 के पहले दशक तक 24 अकबर रोड में टिकटों के लिए बन्दरबांट करते और उम्मीदवार के जरिये ही धन उगाही का पुराना ढर्रा ज्यादा प्रचलित था। लेकिन यहाँ तो मामला ही काफी उलट चुका था। 80 के दशक के साथ ही भारतीय एकाधिकारी पूँजी अब अपने लिए निर्धारित दायरे से बाहर निकलने के लिए छटपटा रही थी, उसे धीरे-धीरे इन कण्ट्रोल राज से मुक्ति के बजाय अबाध गति से विकास की दरकार थी।

जिस मात्रा में इस बीच और खासकर 2014 के लोकसभा चुनावों में धन-बल और मीडिया, इन्टरनेट के जरिये आम भारतीयों के मानस को पलटने का काम हुआ, वह भारतीय इतिहास में अभूतपूर्व था। आम लोगों ने भी इसे महसूस किया होगा कि 10 वर्षों तक लगातार सत्ता में रहने के बावजूद यूपीए सरकार में शामिल कांग्रेस एवं अन्य दलों की सभाओं में जिस प्रकार का शामियाना और मंच-माइक की व्यवस्था थी, उसकी तुलना में मोदी की सभाओं का आकार और मंच व्यवस्था दस गुना बेहतर थी। प्रबंधन का कौशल भी भाजपा और आरएसएस को घुट्टी में मिला हुआ होने के कारण, इसमें और भी बढ़ोत्तरी हुई। 2019 तक आते आते तो स्थिति एक लाचारगी की हालत में तब्दील हो गई। सोचिये सत्ता में रहने वाली एक मुख्यधारा की पार्टी कांग्रेस का हाल यदि ऐसा था, तो बाकी के क्षेत्रीय दलों और वाम-मार्गी दलों की हालत क्या रही? कई दल तो अछूतों की तरह व्यवहार किये जाने लगे।

आर्थिक व्यवस्था में एक निर्णायक बदलाव के साथ-साथ सामाजिक धरातल पर भी ये बदलाव 80 के दशक से शुरू हो चुके थे। इसके लिए भाजपा से अधिक कोई जिम्मेदार था तो वह केंद्र में आसीन कांग्रेस ही थी। विश्व हिन्दू परिषद को उसकी पहचान देने, रुद्राक्ष गले में धारण करने के इंदिरा गांधी के फैसले में कहीं न कहीं बहुसंख्यक हिन्दू मतों को अपनी ओर आकृष्ट करने का मंसूबा सत्ता के केंद्र में घनीभूत होता जा रहा था। इससे पूर्व कभी कश्मीर के नाम पर तो कभी पंजाब के नाम पर इंदिरा और कांग्रेस ने देश की ‘एकता और अखंडता’ के नारे को अपना आदर्श वाक्य बना डाला था। यह सब सत्ता में किसी भी तरह खुद को बनाये रखने के लिए किया गया कुकृत्य था, जिसकी सजा प्रत्यक्ष तौर पर जहाँ कश्मीर और पंजाब को दी गई, उसका अपरोक्ष भुगतान शेष देश और विशेषतौर पर हिंदी की गोबर पट्टी को उठाना पड़ा।

70 के दशक के बाद से ही लाइसेंस राज, हिन्दू ग्रोथ ऑफ़ इकॉनमी जैसे जुमलों को आमजन के बीच में उछाला जाने लगा था। मानो सारे देश को विकास के लिए बस मुक्त अर्थव्यवस्था के जरिये ही अबाध गति से आगे बढ़ाया जा सकता है। देश में दक्षिण कोरिया, ताइवान जैसे एशियाई टाइगर बनने की आकांक्षा को हवा दी गई। यह सब जहाँ एक तरफ बड़ी पूंजी द्वारा संचालित किया जा रहा था, वहीं भारत का अधपका मध्य वर्ग जिसे खुद इस मिश्रित अर्थव्यवस्था ने तैयार किया था, उसके अंदर विकास की हिलोरें उठने लगी थीं।

यह वही आर्थिक, सामाजिक आधार था जो फिलवक्त भले ही कांग्रेस जैसे मध्यमार्गी लेकिन पूंजी परस्त दल को सत्तारूढ़ करने के लिए सहज था, लेकिन कहीं न कहीं इसने संघ, भाजपा और उसके सैकड़ों संगठनों को आधारभूत ढांचा मुहैय्या कराने का काम किया। वह चाहे 84 में इंदिरा हत्याकांड से उपजा सिख विरोधी नृशंस हत्याकांड हो या बाबरी मस्जिद विवाद में कांग्रेस द्वारा परोक्ष रूप से हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियों को दी गई खुली छूट का मामला हो।

1989 के बाद से भारत में गलती से भी रोजगार, भुखमरी दूर करने और गरीबों और अमीरों के बीच की खाई को पाटने, श्रम आधारित अर्थनीति को लागू करने की बात सरकारी नीतियों में सुनने को नहीं मिलीं। मण्डल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के जरिये भले ही कुछ सीटों पर पिछड़ों के कुछ लोगों को नौकरियां मिली हों, और राजनीतिक स्तर पर उनकी दावेदारी कुछ राज्यों में बनी हो, लेकिन वास्तविक धरातल पर सरकारी नौकरियों और पब्लिक सेक्टर के जरिये देश के विकास का ढर्रा ही बदलता चला गया। अब हाथ में आरक्षण का कटोरा जरुर है, लेकिन नौकरियां ही गायब हैं। पिछड़ों के पास अधिकार हैं, लेकिन उन्हें हासिल करने के लिए कोई जरिया ही नहीं है।

यह कुछ इसी तरह से है जिसमें देश के लोगों को कई प्रकार के संवैधानिक अधिकार तो दे दिए जाते हैं, लेकिन उसके लिए जरुरी कदम पीछे खींच लिए जायें, और समाज को अधिकाधिक विभाजित करके तमाशा देखा जाए। दावे के साथ इस बात को कहा जा सकता है कि आर्थिक उदारीकरण के साथ-साथ राजनैतिक स्तर पर भी समाज के ताने-बाने को तोड़ने और आपस में लड़ाने के लिए राज सत्ता की बागडोर संभाले लोगों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे की जगह आज ‘स्टार्ट अप’ ‘स्टैंड अप’ नारों से देश को गुंजायमान बनाया जा रहा है, हम नारों और जुमलों के देश में तब्दील हो चुके हैं।

किसानों के मामले को ही ले लीजिये। किसानों के सामने ही दावे किये जाते हैं कि उनके लिए स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट को लागू करा दिया गया है। उनके हितों की उन्हें समझ नहीं है, उनके लिए इन तीन कृषि कानूनों में पहली बार अपनी मर्जी से अनाज कहीं भी बेचने की पहली बार आजादी मिली है। लेकिन यह आजादी बिहार के किसानों को तो पिछले 15 सालों से मिली है, और उनका क्या हश्र हुआ है इसे वहां के मौजूदा विपक्षी दल तक बता पाने की स्थिति में नहीं हैं। यह बेचारगी और पतनशील विपक्ष की आवाज क्या 70 के दशक में संभव थी?

इसे संभव बनाया है राज्य सत्ता पर बड़ी पूंजी, मीडिया और साइबर मीडिया पर धन-बल के प्रभाव ने, पतनशील मूल्यों के साथ-साथ परंपरा और फिर से अतीत से गौरव हासिल करने की छटपटाहट ने। हम शिक्षित होकर भी 50 के दशक के किसी अशिक्षित किसान से अधिक दकियानूसी विचारों के लोगों को देख सकते हैं। हमारी एक महिला न्यायाधीश नाबालिग बच्चियों के साथ बलात कपड़ों के ऊपर से हमले को अपराध नहीं बता सकतीं। एक न्यायाधीश बिना किसी प्रमाणित अपराध के एक तरफ तो एक स्टैंड अप कामेडियन को समाज के लिए खतरा बता सकते हैं लेकिन वहीँ दूसरी तरफ एक अन्य मामले में तुरत फुरत एक संज्ञेय अपराध के लिए जमानत दिलवा देते हैं। जब विधायिका और कार्यपालिका पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी और संविधान की विवेचना करने वालों का यह हाल हो तो आम जन की क्या बिसात है?

ऐसे में यदि हम फिर वही पुराने दिनों और मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले राज्य और मुलायम धर्मनिरपेक्ष भारत की याद में ही टेसुए बहाते रहे तो उससे कुछ भी हासिल नहीं होने जा रहा।

निश्चित तौर पर आज हमें इस बात को पूरी ताकत से बताने की जरूरत है कि बुनियादी तौर पर वह नेहरूवियन मॉडल भी आज को ध्यान में रखकर ही निर्मित किया गया था। इसे आजादी से पूर्व देश के चुनिंदा पूंजीपतियों द्वारा ‘बॉम्बे प्लान’ में की गई घोषणा से भी समझा जा सकता है। उस समय पूंजीपतियों ने खुलकर इस बात को स्वीकार किया था कि आजादी पाने की स्थिति में वे इस देश की बागडोर अपने हाथों में लेने में सक्षम नहीं हैं। इसका अर्थ था कि पब्लिक सेक्टर के जरिये यह सरकार की ही जिम्मेदारी होगी कि वह देश में आधारभूत ढाँचे को निर्मित करे, बड़े बाँध, बिजली, कोयला, सड़क, रेल का निर्माण करे। हम जब सक्षम हो जायेंगे तो इसे देखेंगे। 47 से 80 तक का काल इस देश ने अपने हाथों से बनाया, जिसकी बुनियाद के आकार ग्रहण करने और पूंजी के इस दौरान संचय के बाद उनके लिए खुला खेल फरुखाबादी खेलने के लिए भारत देश को सौंपा जा रहा है। भारतीय संविधान की व्याख्या भी उसी के अनुसार बदलती रहती है।

पिछले चंद वर्षों में मोदी सरकार ने पब्लिक सेक्टर की बिकवाली में नए-नए कीर्तिमानों को तोड़ने का काम किया है। ये वे सार्वजनिक उपक्रम हैं, जिसे देश ने बेहद गरीबी में जब अंग्रेजों ने इसे पूरी तरफ से निचोड़ लिया था, के बावजूद बनाने में सफलता हासिल की थी। एक सामान्य बुद्धि के भारतीय को भी यह समझने में परेशानी नहीं होनी चाहिए कि जब देश ने धीमी आर्थिक विकास के बावजूद इन सार्वजनिक क्षेत्रों के निर्माण कार्य में सफलता हासिल कर ली थी, तो भला आज जब हम लाखों करोड़ का बजट बनाते हैं, ऐसा क्यों है कि उन्हीं उपक्रमों को बेच-बेचकर आज सरकार अपना काम चला रही है?

आज सरकार के पास इतने लाखों करोड़ का बजट होने के बावजूद वह हर आपदा-विपदा या महामारी में आमजन से सेश वसूलने, पेट्रोल डीजल के दामों में मनमानी एक्साइज वसूली के जरिये, सुई से लेकर जहाज तक पर जीएसटी वसूलने के बावजूद देशवासियों द्वारा बेहद गरीबी में संचित पब्लिक सेक्टर को बेच-बेचकर किसका भला कर रही है? नौकरियां तो गायब हैं। सरकारी अस्पताल तो बंद किये जा रहे हैं। शिक्षण संस्थानों और अध्यापकों को या तो बंद किया जा रहा है या ठेके पर ही पढ़ाई हो रही है। विश्वविद्यालय में फीस कई गुना करने के साथ उन्हें अपने लिए खुद बजट का इंतजाम करने के आदेश दिए गए हैं।

और अब देश के मजदूरों और श्रमिकों द्वारा अंग्रेजों और आजाद भारत में किये गए संघर्षों की बदौलत हासिल अधिकारों को झटपट खत्म कर देशी और विदेशी पूंजी के लिए मनमाफिक बनाकर कौन से ‘मेक इन इण्डिया’ का परचम लहराया जा रहा है? वो भी किसकी खातिर? इन्हीं अंबानी अडानी जैसों और गोरों के लिए ही न? फिर गुलाम भारत और आजाद भारत में क्या अंतर रह गया? क्या हम एक बार फिर से अपरोक्ष ही सही उन्हीं अंग्रेजों के दलालों के वंशजों के हाथ में ही तो ये देश नहीं सौंप चुके हैं?

आइये अब जरा किसानों पर भी बात को रखकर इसे खत्म करते हैं।

अंदाजा ये था कि भले ही मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, महिलाओं और मजदूरों के खिलाफ यह राज्य व्यवस्था अपने राजनीतिक, आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर काम करती रहेगी और इसको लेकर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, लेकिन क्या किसानों, वो भी मध्यम धनी किसानों के हितों के खिलाफ भी इस निर्मम और निर्लज्ज तरीके से सरकार की तरफ से कदम उठाये जा सकते हैं। हममें से कईयों को यह काम असंभव लगा होगा।

भारतीय आबादी में आज भी 55% संख्या किसानों या कहें कि ग्रामीण हैं। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की सिफारिशें लगातार इसे कम से कम करने की रही हैं, जिसका आश्वासन हमारे सरकारी हरकारों में ऋण लेते वक्त दिया जाता रहा है। वह चाहे कांग्रेस सरकार हो या भाजपा की बुलंद सरकार। लेकिन आज मोदी जी बड़ी शान से कहते नहीं थकते कि यह सब तो कांग्रेस की ही नीतियां हैं, जिन्हें हम लागू का रहे हैं। अर्थात जिस काम को करने की कांग्रेस को हिम्मत नहीं पड़ी, उसे हम 56 इंची वाले सीना ठोक कर कर रहे हैं, वह भी उन्हीं मूर्खों के खिलाफ जिन्होंने ‘अबकी बार-मोदी सरकार’ ‘हर हर मोदी-घर घर मोदी’ का नारा लगाया था। ये वही किसान हैं जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहली बार मुजफ्फरनगर में दंगाई बने थे, जिन्हें बड़े जतन से दंगाई बनाया गया था। एक समय 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में सैकड़ों आहुतियाँ देने वालों को दंगाई इसी लिए बनाया गया ताकि आज वे अपनी रही सही मिल्कियत, लाभकारी मूल्य और जमीनों को पूंजीपतियों के लिए ठेके पर खेती कर खुद को शहरी मजदूर बना दें।

आज किसान जो कि खुद कई मायनों में किसान नहीं रहा, बल्कि जो वास्तव में किसान हैं वे काश्तकार हैं, खेतिहर मजदूर हैं। उनके पास न तो कृषि भूमि का मालिकाना हक है, और न ही उसके लिए लड़ने का अपेक्षित बल। यह देश के बड़े हिस्से का हाल है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यदि किसान आज भी खेती करता था, तो उसके पीछे 60 के दशक में भारत सरकार द्वारा हरित क्रांति के लिए उनसे किया गया वादा था, जिसके कारण उन्हें गेहूं और धान की खेती के बदले में एमएसपी का वायदा किया गया था। वे फसलें उगाते हैं और लाभकारी मूल्य से भले ही वह काफी कम हैं, लेकिन अपनी आजीविका चला रहे थे। आज उसे खत्म किया गया, जिसके लिये वे आज इस सरकार के विरोध में खड़े हुए हैं। क्योंकि उनके सामने साफ़-साफ़ बिहार के किसानों का उदाहरण है जो उनके बराबर ही भूमि के स्वामित्व के बावजूद पंजाब-हरियाणा में मजूरी करने को विवश हैं।

इसलिए बहुसंख्यक आबादी को यदि लड़ाई लड़नी है तो वह अब मुकम्मल लड़ाई के बगैर नहीं जीती जा सकती। आज भले ही सरकार फौरी तौर पर कदम पीछे हटा ले, लेकिन उसके पास बड़ी पूंजी और विदेशी निवेशकों का जो दबाव है वह उसे फिर से दुगुनी रफ्तार से उन्हीं राहों को अपनाने के लिए मजबूर करेगा जिस पर चलकर उन्होंने पिछले 20 सालों में एक टूटे और विखंडित भारत को बना दिया है। भारत की विशाल जनसंख्या के वास्तविक गुलामी और पूंजीवादी शोषण का वक्त तो अब आया है, कल तक तो इसकी सिर्फ तैयारी चल रही थी। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ आजाद प्रेस भी पूंजी की गति से ही संचालित होते हैं, और संविधान कानून की व्याख्या करते आये हैं।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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