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Categories: बीच बहस

गांधीवादियों के दामन पर भी है गांधी की हत्या के दाग

सवाल आसान लगता है लेकिन गम्भीरता से सोचा जाए तो पेंचीदा भी है। साधारण तौर पर देखा जाये तो महात्मा गांधी की मौत का सीधा जिम्मेदार नाथूराम गोड़से था। जिसने गांधी जी को 3 गोलियां मारी और उनकी हत्या कर दी। नाथूराम गोडसे जो उग्र हिन्दुत्व की राजनीति का ध्वज उठाये हुए था। जिसके पीछे हिन्दुत्व की राजनीति करने वाला खेमा खड़ा था। गांधी की हत्या स्वतन्त्र भारत की पहली आतंकवादी कार्रवाई थी जिसको हिंदुत्ववादी खेमे ने अंजाम दिया था। गांधी की हत्या के बाद हिंदुत्ववादी संगठनों ने गांधी की हत्या पर खुशी मनाते हुए पूरे देश मे लड्डू बांटे। आज 70 साल बाद भी ये धार्मिक आतंकवादी प्रत्येक हत्या के बाद ऐसे ही खुशी मनाते हैं।

गांधी की हत्या 1948 में हो गयी उसके बाद उनके कातिलों को फांसी भी हो गयी। लड्डू बांटने वाले संगठनों पर उस समय की सरकार में गृहमंत्री रहे सरदार पटेल ने प्रतिबंध भी लगा दिया। लेकिन क्या गांधी को मारने से गांधी मर गए?

Medgar Evers ने कहा है कि –

“आप इंसान को तो मार सकते हो,

लेकिन उसके विचार को नहीं मार सकते हो”

हत्यारी सोच ये जानती थी इसलिए उन्होंने सबसे पहले गांधी को मारा, गांधी की सोच को मारने के लिए वो पिछले 70 सालों से लगे हुए हैं। बहुत हद तक वो कामयाब भी हुए हैं। ऐसी आपराधिक सोच कामयाब कैसे हुई ये सोचना आज जरूरी है।

सबसे पहले तो उस समय की जो महान शख्सियतें थी उनको जान लें।

  1. जवाहर लाल नेहरू
  2. डॉ. बीआर अम्बेडकर
  3. सरदार पटेल

ये तीनों उस समय कांग्रेस के पदाधिकारी व  भारत सरकार और भारत की बहुमत जनता का नेतृत्व कर रहे थे। ये सब गांधी जी के अनुयायी थे। उनको पूजनीय मानते थे। इन सबकी बहुत से मुद्दों पर गांधी जी से असहमतियां थीं लेकिन फिर भी ये महात्मा जी के साथ खड़े थे।

अवाम का एक बड़ा तबका जिसका नेतृत्व क्रांतिकारी विचारधारा का नेतृत्व करने वाले भगतसिंह और उनके साथी कर रहे थे।

जब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथियों ने अपनी पार्टी लाइन के अनुसार 23 दिसंबर, 1929 को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ वायसराय की गाड़ी को उड़ाने का प्रयास किया और वह असफल रहा। तब गांधी जी ने इस घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख “बम की पूजा” लिखा, जिसमें उन्होनें वायसराय को देश का शुभचिंतक और नवयुवकों को आजादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाला करार दिया। गांधी जी के इस लेख के जवाब में भगवती चरण वोहरा ने “बम का दर्शन” नाम से लेख लिखा जिसे भगत सिंह ने जेल में अंतिम रूप दिया। 

लेख में हिंसा और अहिंसा पर विस्तार से लिखा गया है। इसके साथ ही क्रांतिकारी मंसूबे जाहिर किये गए जिसमें देश ही नहीं बल्कि मानवता की आजादी का रास्ता क्या हो उसको स्पष्ट किया गया। लेख में गांधी जी के विचार की तार्किक आलोचना बड़ी ही मजबूती से की गई है इससे पहले शायद ही किसी ने गांधी जी के विचार की ऐसी तार्किक आलोचना खुले मंच से की हो।

लेकिन पूरे लेख में व्यक्तिगत तौर पर एक भी शब्द महात्मा गांधी के खिलाफ नहीं लिखा गया। इसके विपरीत महात्मा गांधी को जनता का नेतृत्व करने वाला इंसान बताया। क्रांतिकारी तबका महात्मा गांधी के बजाए साम्प्रदायिक व सामंती ताकतों को क्रांति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा मानता था जिसका नेतृत्व हिंदुत्ववादी ताकतें कर रही थीं।

अब हम 2019 पर आते हैं। आज वर्तमान में हम भगत सिंह को आदर्श मानने वाले किसी से भी जब महात्मा गांधी के बारे में पूछते हैं तो वो गांधी से नफरत करता मिलेगा।

हम डॉ. अम्बेडकर को आदर्श मानने वाले से बात करेंगे तो वो गांधी को गालियां देता मिलेगा। कांग्रेसियों से बात करो वो भी दबी जुबान से बोलते मिलेंगे कि गांधी ने ही सारा नाश किया है।

हिन्दुत्ववादी टोली तो गांधी विरोध करेगी ही क्योंकि वो तो उसकी हत्या में सीधे-सीधे शामिल  थी। गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सबको मालूम था कि महात्मा की हत्या किसने और क्यों की।

साम्प्रदायिक ताकतों ने बड़ी ही चतुराई और झूठ का सहारा लेते हुए भगत सिंह, डॉ. अम्बेडकर को मानने वाले और यहां तक कि गांधीवाद के सहारे सत्ता हासिल करने वाले कांग्रेस कार्यकर्ताओं को गांधी के विरोध में खड़ा कर दिया।

हिंदुत्ववादी ताकतें जिनका देश की आजादी की लड़ाई में योगदान शून्य था। इसके विपरीत वो अंग्रेजों के साथ ही खड़े रहे, अंग्रेजों के मुखबिर का काम करते रहे।

देश आजाद होते ही सत्ता हासिल कैसे हो। इसके लिए उन्होंने धर्म के नाम पर दंगे करवाए। गांधी जी जहां भी जाते लोगों से दंगे न करने की अपील करते और वहीं दंगे बन्द हो जाते। हिंदुत्ववादी ताकतों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा महात्मा ही बन गए थे। इसके चलते उन ताकतों ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। लेकिन हत्या के बाद भी गांधी का विचार हिंदुत्ववादी ताकतों की राह में रोड़ा बना हुआ था। इसके लिए उन्होंने गांधी के विचार को मारने के लिए 2 रास्ते अपनाये एक रास्ता गांधी के नाम जपने और कांग्रेसियों की चापलूसी करने का और दूसरा रास्ता गांधी के खिलाफ झूठा दुष्प्रचार करने का। इन दोनों रास्तों में वो कामयाब होते गए। वर्तमान में अगर फासीवादी और साम्प्रदायिक टोली सत्ता में बैठी है तो ये उसी मेहनत का फल है।

गांधी की हत्या के बाद यह हत्यारी टोली गांधी के विचार को मारने की कवायद में जुट गयी। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि भगत सिंह, डॉ. अंबेडकर, नेहरू को आदर्श मानने वाले आज गांधी को गालियां दे रहे हैं। ठीक इसके विपरीत वो नाथूराम गोडसे और उसकी हत्यारी टोली को सपोर्ट करते मिलते हैं। लेकिन गांधी के विचार की असलियत में हत्या किसने की इसका गम्भीर और पेचीदा सवाल ये भी है कि गांधी खेमे के नेताओं ने जो लंबे समय तक सरकार में भी रहे उनकी नाकामियों ने भी गांधी के विचार को मारने का काम किया है। जिसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदारी नेहरू और उसके बाद आने वाले कांग्रेस नेतृत्व की है।

देश की आजादी के दौर में चला तेलंगाना, तेभागा का हथियार बन्द क्रांतिकारी आंदोलन जो “जमीन जोतने वाले की” के नारे के साथ सामन्तवादी ताकतों के खिलाफ केंद्रित था। देश की आजादी के बाद इस आंदोलन को सत्ता द्वारा हिंसा के बल पर निर्ममता से कुचलना गांधी जी के विचार की हत्या की शुरुआत  थी। 1962 के चीन युद्ध के बाद नेहरू ने अपने राजनीतिक  स्वार्थ में गांधी की हत्या करने वाली हिंदुत्ववादी गैंग को सम्मानित किया। नेहरू का ये कृत्य महात्मा गांधी की पीठ में छुरा घोंपने सरीखा था।

उसके बाद जितनी भी सरकारें आयीं उन सभी ने राजनीतिक स्वार्थ का वशीभूत होकर गांधी जी की हर बार हत्या करते रहे। चाहे वो नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलने का मामला हो या सिख दंगें हो या आदिवासियों का कत्लेआम। ये सभी कार्रवाइयां गांधी जी की विचारधारा अहिंसा के खिलाफ सत्ता की हिंसा थीं। जो पार्टी गांधी का मूल मंत्र अहिंसा को सर्वोपरि मानने का दम भरती रही हो उसी पार्टी ने समय-समय पर सत्ता और संगठन की हिंसा का सहारा लिया।

यही हाल डॉ. अम्बेडकर के नाम पर स्वार्थ की राजनीति करने वाली बसपा का था जिसने गांधी को डॉ. अम्बेडकर के दुश्मन के रूप में पेश किया। बसपा ने अपने कार्यकर्ताओं को साम्प्रदायिक संघ और उसकी टोली के खिलाफ कम व गांधी के खिलाफ ज्यादा जागरूक किया।

प्रगतिशील ताकतें भी अवाम को ये समझाने में नाकाम रहीं कि भगत सिंह के विचार की सबसे बड़ी दुश्मन साम्प्रदायिक व फासीवादी विचारधारा थी। जिसका नेतृत्व संघ, हिन्दू महासभा एवं मुस्लिम लीग कर रहे थे न कि गांधी।

आज जब साम्प्रदायिक ताकतें सत्ता में बैठ कर नंगा नाच कर रही हैं। बुद्धिजीवियों, कलाकारों, नाटककारों, दलितों, मुसलमानों को मारा जा रहा है।  गांधी को गोली मारने का एक बार फिर खुला मंचन किया जा रहा है। गांधी की फेक अश्लील तस्वीरें बनाकर सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही हैं। गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने की कोशिशें हों या हत्या के मास्टरमाइंड की संसद में फोटो लगी हो। लेकिन सवाल यह है कि जो खुद को गांधी के पक्ष में बताते नहीं थकते उन्होंने इन सब चीजों का ईमानदारी से विरोध क्यों नहीं किया?

क्या इसका जवाब ये है कि गांधी की विचारधारा साम्प्रदायिकता के खिलाफ थी। लेकिन गांधी की हत्या के बाद से आज तक खुद कांग्रेस साम्प्रदायिकता का कार्ड खेलती रही है। भारत मे हुए सिख विरोधी दंगे क्या कांग्रेस पर एक काला दाग नहीं हैं।

कांग्रेस नेतृत्व अगर ईमानदारी से गांधी की विचारधारा पर चलने का दम भरता है तो –

  • क्या माफी मांगने का काम करेगा उन लाखों तेभागा, तेलगांना, नक्सलबाड़ी के किसानों से जिनको अपना हक मांगने के कारण सत्ता ने हिंसा से कुचल दिया।
  • क्या कभी उन लाखों सिखों से माफी मांगी जाएगी जिनके हजारों हजार लोग उन दंगों की भेंट चढ़ गए।
  • क्या राहुल गांधी कभी उन हजारों आदिवासी परिवारों से माफी मांगने का कष्ट करेंगे जिनको 2004 से 2014 के बीच केंद्र में कांग्रेस सरकार के नेतृत्व में उजाड़ दिया गया या मार दिया गया।
  • क्या कांग्रेस में उस सोनी सोरी से माफी मांगने का माद्दा है जिसकी योनि में पत्थर भरने का काम इनकी केंद्र सरकार में हुआ। फिर उनको जेल में असहनीय यातनाएं दी गयी। ये सब जुल्म करने वालों को इनकी सरकार ने वीरता पुरष्कार दिए।
  • क्या राहुल गांधी माओवादी विचारक कामरेड आजाद जिसको गांधी जी के अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले बुद्धिजीवियों के आग्रह पर सरकार ने बातचीत के लिए बुलाया और फिर सरकार ने आजाद का फेक एनकाउंटर में हत्या कर दी। एक क्रांतिकारी और शांतिवार्ता के लिए आये दूत की हत्या पर सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने का कष्ट करेगें?

गांधी जी तो खुद ये मानते थे कि कभी भी अपनी गलतियों को स्वीकार करके सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सकता है। क्या राहुल गांधी में है सच्चाई के रास्ते पर चलने का माद्दा।

अगर ये सब राहुल गांधी नहीं कर सकते तो वो खुद कांग्रेस अध्यक्ष होते हुए उतने ही दोषी हैं जितनी महात्मा के विचार को मारने में हिंदुत्ववादी गैंग।

आज महात्मा गांधी की विचारधारा से भिन्नता होते हुए भी गांधी को बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भारत के उन असंख्य बुद्धिजीवियों, कलाकारों, नाटककारों, क्रान्तिकारी जमातों के कंधे पर है। जो गैर बराबरी, शोषण, अन्याय के खिलाफ देश में मानवीय गरिमा को स्थापित करने के लिए लड़ रहे हैं। इसलिए उन सभी को मजबूती से इस पक्ष पर बात करनी चाहिए।

(लेखक उदय राम स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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