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Categories: बीच बहस

गंगा आंदोलन का किसान आंदोलन से सीधा रिश्ता

जिस तरह किसान आंदोलन में अब तक तीन सौ से ऊपर किसानों और हमें नहीं भूलना चाहिए कि तीन घोड़ों ने भी शहादत दी है ठीक उसी तरह गंगा को बचाने को लेकर अभी तक चार साधुओं का बलिदान हो चुका है। हरिद्वार के मातृ सदन के साधु अब तक गंगा के संरक्षण की मांग को लेकर, जिसमें प्रमुख रूप से गंगा में अवैध खनन रोकना, हिमालय पर गंगा और उसकी सहायक नदियों में बांध न बनाना, गंगा में गंदे नालों का पानी न डालना व गंगा के किनारे पेड़ न काटना, आदि, मुद्दे शामिल रहे हैं, अब तक 65 के करीब अनशन कर चुके हैं। पहला अनशन मार्च 1998 में स्वामी गोकुलानंद सरस्वती व स्वामी निगमानंद ने किया था। आखिरी अनशन वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन के दौरान फरवरी से अप्रैल 2021 में ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद व मातृ सदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद सरस्वती ने किया।

13 जून, 2011 को देहरादून में जब 35 वर्षीय स्वामी निगमानंद ने गंगा में अवैध खनन को रोकने की मांग को लेकर अपने अनशन के 115 वें दिन हिमालयन अस्पताल में दम तोड़ा तो उस समय उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्तारूढ़ थी। शक यह है कि संघ परिवार के नजदीक माने जाने वाले एक खनन माफिया ज्ञानेश अग्रवाल की मिलीभगत से स्वामी निगमानंद को हरिद्वार जिला अस्पताल में अनशन के दौरान ऑरगैनोफॉस्फेट जहर का इंजेक्शन लगवा दिया गया। अन्यथा इतने लम्बे अनशन के दौरान सरकार की ओर से उनसे कोई वार्ता के लिए क्यों नहीं गया?

स्वामी गोकुलानंद, जिन्होंने स्वामी निगमानंद के साथ 4 से 16 मार्च, 1998, में मातृ सदन की स्थापना के एक वर्ष के बाद ही पहला अनशन किया था, की 2003 में बामनेश्वर मंदिर, नैनीताल में जब वे अज्ञातवास में रह रहे थे तो खनन माफिया ने हत्या करवा दी।

बाबा नागनाथ वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर गंगा को अविरल व निर्मल बहने देने की मांग को लेकर अनशन करते हुए 2014 में शहीद हो गए।

गंगा के लिए बलिदान देने वाले सबसे विख्यात साधु 86 वर्षीय स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद रहे, जो पहले गुरु दास अग्रवाल के नाम से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के प्रोफेसर व केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड के पहले सदस्य-सचिव रह चुके थे। उन्होंने 22 जून, 2018 से गंगा के संरक्षण हेतु कानून बनाने की मांग को लेकर हरिद्वार में अनशन किया। 112 दिनों तक अनशन करने के बाद 11 अक्टूबर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश में उनका निधन हो गया। स्वामी सानंद ने 13 से 30 जून 2008, 14 जनवरी से 20 फरवरी, 2009 व 20 जुलाई से 23 अगस्त 2010 के दौरान क्रमशः तीन पनबिजली परियोजनाओं भैरों घाटी, लोहारी नागपाला व पाला मनेरी को रूकवाने के लिए अनशन किए और रूकवा भी दिया जबकि लोहारी नागपाला पर काफी काम हो चुका था और भागीरथी नदी के शुरू के 125 किलोमीटर को परिस्थितिकीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करवाया। उनका चौथा अनशन 14 जनवरी से 16 अप्रैल 2012 में कुछ चरणों में हुआ।

पहले इलाहाबाद में फल पर, फिर हरिद्वार में नींबू पानी पर और अंत में वाराणसी में बिना पानी के जिसके बाद उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में भर्ती कराया गया। 2013 में 13 जून से 13 अक्टूबर तक उन्होंने अनशन किया जिसमें 15 दिन जेल में भी गुजारने पड़े। उस समय गंगा महासभा के अध्यक्ष जितेन्द्रानंद उनके पास भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह का पत्र लेकर आए कि यदि अगले चुनाव में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनेगी तो स्वामी सानंद की गंगा सम्बंधित सारी मांगें मान ली जाएंगी। किंतु मोदी सरकार ने स्वामी सानंद को काफी निराश किया। कांग्रेस की सरकार में स्वामी सांनद ने पांच बार अनशन किया किंतु एक बार भी जान जाने की नौबत नहीं आई किंतु भाजपा सरकार के कार्यकाल में एक बार ही अनशन पर बैठने से उनकी जान चली गई। यह दिखाता है कि भाजपा सरकार कितनी संवेदनहीन है, जैसा अनुभव किसान आंदोलन में भी हो रहा है।

स्वामी सानंद ने नरेन्द्र मोदी को 24 फरवरी, 13 जून, 23 जून, 5 अगस्त व 30 सितम्बर, 2018 को पत्र लिखे जिनके कोई जवाब नहीं आए। अतः उन्होंने अपना जीवन दांव पर लगा दिया है। उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश के अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने एक माह बाद भी अनशन जारी रखा। उच्च न्यायालय के आदेश के वे दोबारा मातृ सदन पहुंचे जहां से दूसरी बाद उन्हें पुनः अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। इस बार उनकी यहां मौत हो गई। केन्द्र सरकार की ओर से उनका अनशन समाप्त कराने की कोई कोशिश नहीं हुई जिससे सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने जानबूझ कर स्वामी सानंद के अनशन को नजरअंदाज करने का फैसला लिया हुआ था। उनके मरने के तुरंत बाद वही नरेन्द्र मोदी जो उनके पत्रों का जवाब नहीं दे रहे थे ट्वीट कर श्रद्धांजलि संदेश भेजते हैं जैसे मानो वे उनके मरने का इंतजार ही कर रहे हों।

23 फरवरी, 2021 से ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद स्वामी सानंद के संकल्प को पूरा करने की दृष्टि से अनशन पर बैठे। बीस दिन बाद पुलिस उन्हें उठा ले गई तो 13 मार्च से स्वामी शिवानंद सरस्वती ने अनशन शुरू किया। पहले वे चार ग्लास पानी पर थे और 2 अप्रैल, 2021 को मात्र एक ग्लास पानी पर आ गए थे। जब सभी को लग रहा था कि शायद स्वामी शिवानंद जी को अपना देह त्याग करना पड़ेगा तभी केन्द्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय से एक पत्र आया जिसमें पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से गंगा में खनन हेतु दी गई स्वीकृतियों को वापस लेने की संस्तुति की गई है। वहीं राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्र ने स्वामी शिवानंद सरस्वती को लिखे व्यक्तिगत पत्र में गंगा पर कोई नई जल विद्युत परियोजना को अनुमति नहीं देने की बात कही और उनसे अपना अनशन समाप्त करने का आग्रह किया। इसके बाद 2 अप्रैल की आधी रात के बाद दोनों साधुओं ने अपना अनशन समाप्त किया। किंतु यह कोई अंतिम समाधान नहीं है। गंगा को बचाने के आंदोलन में ऐसा कई बार हो चुका है कि सरकार कभी बात मान जाती है तो साधु अनशन रोक देते हैं किंतु फिर सरकार खनन को अनुमति दे देती है और साधु पुनः अनशन पर बैठ जाते हैं।

गंगा को बचाने का संबंध सीधे किसान आंदोलन से इसलिए बनता है क्योंकि गंगा के पानी पर भारत की 41 प्रतिशत आबादी निर्भर है। जाहिर है कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल के गंगा घाटी में रहने वाले किसान गंगा के पानी से ही सिंचाई करते हैं। अतः इन दोनों आंदोलनों को एक दूसरे को मजबूत करना चाहिए।

(संदीप पाण्डेय सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के उपाध्यक्ष हैं।)

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This post was last modified on April 14, 2021 10:24 am

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