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लैंगिक असमानता एवं सांस्कृतिक परवरिश

हाँ! मुझे शिकायत है और मुझे लगता है कि आप में से कई लोगों को भी यह शिकायत होगी। मुझे समाज के हर उस शख़्स से शिकायत है जिसने अपनी बेटी पर बंदिशें लगाई हैं, मगर अपने बेटे पर नहीं। अधिकांश लड़कियां जिन्हें मैं जानती हूँ उनके जीवन में रोज़मर्रा की गतिविधियों से लेकर जीवन के अहम फ़ैसलों को लेने तक तमाम तरह की बंदिशे हैं। तो क्यूँ न आज हम अपनी संस्कृति और सभ्यता के विषय में बात करें क्योंकि अगर हम अब नहीं बात करेंगे तो शायद फिर और देर हो जाएगी।

जब कभी मैं लड़कियों के रात 7:00 या 9:00 बजे के बाद घर से बाहर न निकालने की बंदिशों की बात करती हूं तो लोग मुझसे अक्सर कहते हैं कि लड़कियों के साथ घटनाएं घटती हैं, इसलिए ज़रूरी है उनका अपनी सीमाओं में महफ़ूज रहना। मगर जो बात कोई नहीं बोलता और जिस बात पर ज़ोर होना चाहिए वो यह है कि ये असामाजिक घटनाएं पुरूषों के द्वारा ही घटित की जा रही हैं।

मुझे यह कहते हुए खेद हो रहा है कि अगर आपके घर में लड़कों को जो काम करने की इजाज़त है वह लड़कियों के पास नहीं है और आपकी परवरिश लड़कियों और लड़कों के बीच अंतर करना सिखाती है तो कहीं ना कहीं आप माता-पिता के रूप में गलत कर रहे हैं।

भारतीय समाज में मैंने लोगों को अधिकतर यह कहते हुए सुना है कि क्यों उस लड़की के मां-बाप ने रात के वक्त उसे घर से बाहर रहने की अनुमति दी। मेरा प्रश्न आपसे यह है कि क्यों आपका बेटा रात के उस वक्त घर से बाहर था? क्या हम लड़कियों को इसलिए ही जन्म देते हैं कि उन्हें रात 7:00 या 9:00 बजते ही चार दिवारी में कैद कर देंगे और लड़के जब चाहें घर आ-जा सकते हैं। लड़के हमेशा ही घर से बाहर होते हैं मगर उनके माता-पिता इस बात की चिंता नहीं करते कि हमारा बेटा कहीं किसी के साथ कोई अपराध या गैरज़िम्मेदारना हरकत तो नहीं कर रहा।

यह एक कड़वा सच है कि हमारे समाज के पुरुष को स्त्रियों के प्रति संवेदनशील नहीं बनाया जाता और शायद निम्न कारणों में से एक यह कारण भी है कि पुरुष स्त्रियों के ऊपर अपना अधिकार समझते हैं। हम इसके बारे में बात नहीं करना चाहते। सिर्फ हम ही नहीं बल्कि अमीर से अमीर रसूखदारों से लेकर गरीब तबके तक कोई भी इस बारे में बात करना पसंद नहीं करता कि किस प्रकार हमारी सभ्यता और संस्कृति एक स्त्री की पहचान का गला घोट देती है और पुरुषों को स्त्रियों के विषय में, उनके अस्तित्व के विषय में, उनकी पहचान के विषय में, उनके शरीर, महावारी, गर्भावस्था के विषय में शिक्षित करने में असफल सिद्ध होती नज़र आती है।

गौरतलब है कि स्त्री को सुरक्षा के नाम पर क़ैद किया जाता रहा है। अगर हम चाहते हैं कि वह सुरक्षित रहे तो हमें इस बात की ज़िम्मेदारी लेनी होगी कि समाज को कैसा स्वरूप देना है? बच्चे के जन्म से ही लड़के और लड़की का भेद होने लगता है, अब चाहे वो सारे रंगों को भुला नीले और गुलाबी कपड़ो के चयन के बीच का भेद हो या फिर खिलौनों के बीच का भेद। पिछले तीन दशकों से विकास और प्रगति करने के बावजूद भी लैंगिक समानता के मामले में भारत पीछे है। आज UN विकास कार्यक्रम के लिंग असमानता सूचकांक पर भारत 188 देशों में से 131 रैंक पर आता है। आपके बच्चे का जेंडर उसकी स्वतंत्रता, उसकी परवरिश, उसके विकास का मानक नहीं होना चाहिए, हमें यह बात बच्चों के दिमाग में भी डालना बंद करनी होगी और हमारे व्यवहार से भी इस असमानता का खात्मा करना होगा तभी शायद अनेक परिश्रमों के बाद हम 131वी रैंक से ऊपर उठ सकेंगे।

हम प्रतीक्षा करते हैं निर्भया, हाथरस, उन्नाव और बदायूं जैसे क्रूर अपराधों के होने का। शांति मार्च और कैंडल मार्च में शामिल होने का कोई औचित्य नहीं है अगर आप घर जाकर फिर अपने बच्चों से उनके जेंडर के मुताबिक अलग-अलग बर्ताव से पेश आते हैं। मार्च 2020 में कोरोना संक्रमण जैसी भीषण बीमारी आने के बाद पूरे देश में लॉकडाउन की स्थिती बनी रही। अब कोरोना की दूसरी लहर देश में आ चुकी है, परंतु बलात्कार जैसे क्रूर अपराधों की ख़बरे बराबर बनी हुयी हैं। प्रत्येक रेपिस्ट को मार देना समस्या का समाधान नहीं। आप कितनों को मारेंगे, कितनों को जेल में डालेंगे और कितनों की हत्या करवाएंगे? ऐसे अनेक अपराधी समाज में तब भी ज़िंदा रहेंगे और हमारी आत्मा को झकझोड़ते रहेंगे। अतः हमें आवश्यकता है ऐसे समाधानों कि जो समाज में एक लंबे समयावधि तक जीवित रहे अथवा असरदार हो। इसके लिए आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है जेंडर के आधार पर विभेदीकरण करना बंद किया जाए। स्त्रियां इस देश की, स्त्रियां पूरे विश्व की एक बेहतर बर्ताव और समाज के योग्य हैं।

पुरानी पीढ़ियां अपने बच्चों के ज़ख्मी हो जाने से बहुत डरती थी। यही कारण है कि उन्होंने अपने चारों ओर नकारात्मक दीवारों का निर्माण किया और अपने बच्चों को उन में कैद रखा। मगर क्या हम अपनी गलतियों से सीखते नहीं है? मैं पैदा हुई और बड़ी की गई ताकि मैं पुराने लोगों द्वारा दिए गए ज्ञान का अनुपालन कर सकूं। लेकिन प्रश्न यहाँ ये उठता है कि क्या बुद्धि और विवेक के बिना उस ज्ञान के व्यवहार में आँख मूँद कर यक़ीन कर लिया जाय? तो मेरा चयन यहाँ उन नकारात्मक दीवारों को तोड़कर उस जिंदगी को जीना है जिसके लिए एल्विन टॉफलर भी सहमत हैं, “The illiterate of the future are not those who cannot read or write but those who cannot learn, unlearn, and relearn”.

यहाँ एल्विन का साफ़-साफ़ कहना है कि पुरानी धारणाओं को तोड़कर नई अवधारणाएं नहीं बनाई गई तो यह मनुष्य के अशिक्षित होने के समान ही है। इसी प्रकार बच्चे खाली कैनवास की तरह होते हैं जिनमें आप मनचाहा रंग भर सकते हैं। जब वे आपको सड़कों पर खेलते हुए दिखते हैं, तब आप उनके अंदर कोई राक्षस नहीं देखते। हां, मगर यह हो सकता है कि वापस लौट कर वे ऐसे घर में जाते हों जहां एक अपमानजनक शराबी पिता हो, या उस घर में स्त्रियों को बराबर न माना जाता हो और ना ही बराबर इज्ज़त दी जाती हो। बच्चों को घर में हमेशा एक स्वस्थ वातावरण मिले यह जरूरी नहीं। अक्सर शिक्षित बच्चों को भी एक स्वस्थ पारिवारिक वातावरण नहीं मिल पाता। मगर एक बेहतर समाज के स्वरूप में यह सुनिश्चित करना हमारी अनिवार्य जिम्मेदारी बनती है कि हमारे बच्चे बड़े होकर कहीं राक्षस ना बन जाए।

एक बेहतर समाज की निर्माण में हम अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते, अथवा भाग नहीं सकते। हमें एक ऐसी भावी पीढ़ी को बड़ा करना है जो न सिर्फ़ हर व्यक्ति को बराबर का सम्मान देती हो, बल्कि सभी के प्रति समान व्यवहार भी करती हो। हमें एक बच्चे के दिमाग में पितृसत्ता को सक्षम होने से रोकने की आवश्यकता है। हमें उन्हें ये सिखाना बंद करना होगा कि महिलाएं पुरुषों से भिन्न है। भारतीय समाज एक ओर आधुनिकता के लिबास में जल रहा है वही दूसरी ओर यह समाज इस प्रवाह में है जहां पुराने तरीके और परिवार प्रणाली अब नहीं चल सकती इसलिए नयी पीढ़ी की परवरिश के लिए नए सकारात्मक मार्गदर्शन और दिशा की आवश्यकता है।

हमारे समाज में लड़कियां जींस पहन सकती हैं, बाल छोटे रख सकती हैं, शर्ट, पैंट और शॉर्ट्स भी पहन सकती हैं क्योंकि यह सब निशानियां लड़को की हैं और हम लड़कों को हर बात की स्वीकृति देते हैं। लेकिन जब कोई लड़का किसी लड़की की तरह थोड़ा भी दिखता है तो यह आपको ठीक नहीं लगता है। क्योंकि यह अपमानजनक है क्योंकि शायद आपको लगता है कि लड़की होना अपमानजनक है। सभी पुरुष प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं की तुलना में अधिक मजबूत, होशियार, नैतिक रूप से श्रेष्ठ और समग्र रूप से देखे जाने से लाभान्वित होते हैं। वे सक्रिय रूप से स्त्री जाति से द्वेष ना भी रखते हो तब भी वे इससे लाभान्वित होते हैं। दूसरी ओर सभी महिलाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषों के मुकाबले कम बुद्धिमान, नैतिक रुप से कमजोर और हीन भावना से ग्रसित होने का शिकार होती हैं। इन मानदंडों को तोड़ना महत्वपूर्ण है।

महिलाओं के अधिकारों और महिलाओं के उत्थान की बात करना केवल नारीवादियों का काम नहीं है। अतः समाज के प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह अपने जीवन में मौजूद और अपने आसपास की महिलाओं के जीवन में बदलाव लाए। मैंने अक्सर लोगों को यह कहते सुना है कि मैं हमेशा लड़कियों को शिक्षित करने, उन्हें स्वतंत्र बनाने, इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक या खिलाड़ी बनाने और पुरुषों के बराबर होने की बात करती हूं क्योंकि मैं नारीवादी हूं। नारीवाद महिलाओं को विकल्प (choices) देने की बात करता है। नारीवाद वह छड़ी नहीं है जिससे अन्य महिलाओं को शर्मिंदा किया जा सके या पुरुषों का अनादर किया जा सके। महिलाओं का उत्थान पुरुषों पर आने वाले अनावश्यक दबाव को भी दूर कर देता है क्योंकि हमारा समाज निसंदेह पुरुषों पर भी जिम्मेदारियों का अत्यधिक भार डालता है। महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता हमें पुरुषों, उनकी अभिव्यक्तिओं और भावनाओं के प्रति भी संवेदनशील बनाती है। हमें समाज में इसे भी सामान्य करने की आवश्यकता है।

समाज का कोई भी सदस्य जो अपने भविष्य को देख रहा है, खुश और सुरक्षित रहना चाहता है। यह हमारी नयी पीढ़ी ही है जो दुनिया को अधिक नैतिक बनाने में सक्षम होगी। आप अपनी बेटियों को शिक्षित करें, उनके पास स्वतंत्रता होगी। स्वतंत्रता के साथ-साथ अभिव्यक्ति की, विकल्प (choices) की, निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी आती है। उनके पास अपने मन की आवाज़ होगी, अपनी पहचान और महत्वकांक्षाएं होंगी, जो होनी भी चाहिए। मुझे लगता है कि लड़कियों के लिए अपनी आवाज ढूंढना महत्वपूर्ण है। वे जो चाहती हैं उसे ढूंढ सके और उसे पा सके। आज महिलाएं समाज की सीमाओं और प्रतिबंधों के खिलाफ विद्रोह करना शुरू कर चुकी हैं। वे सभी प्रकार के रचनात्मक तरीकों से पितृसत्ता को तोड़ती है क्योंकि पुराने लोगों के ज्ञान का पालन करने से वे सहमत नहीं हैं। यह उचित समय है जब हम महिलाओं के शरीर, उनकी इच्छाओं, उनके संघर्षों के बारे में समाज में बात करें और समाज को शिक्षित करें। इसके साथ-साथ जिस एक बात को मैं और महत्वपूर्ण मानती हूँ वो यह है कि माएँ अपने बेटों से प्रश्न पूछें। अपनी बेटियों के व्यवहार पर अंकुश लगाने के बजाए अपने बेटों की अंधी स्वतंत्रता पर अंकुश लगायें और उन्हें संवेदनशील बनायें।

(लेखिका कनुप्रिया माली महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र की पी.एच.डी शोधार्थी हैं।)

This post was last modified on May 31, 2021 3:27 pm

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