Saturday, October 1, 2022

जनता पर भारी पड़ रही है सरकार के दिखावे की देशभक्ति

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आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने नया फरमान जारी किया है। 15 अगस्त को हर घर पर तिरंगा फहराया जाएगा। झण्डे उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी सरकार ले रही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने रुपए 40 करोड़ खर्च कर 2 करोड़ झण्डों की व्यवस्था करने का फैसला किया है। इसके अलावा 2.5 करोड़ झण्डे स्वयं सहायता समूहों, सामाजिक संस्थाओं व निजी संस्थाओं से खरीदे जाएंगे। सरकार द्वारा, अपनी आत्मनिर्भर भारत की नीति और मेक इन इण्डिया की नीति को दरकिनार कर, कहा जा रहा है कि चूंकि इतनी जल्दी इतनी बड़ी संख्या में झण्डे उपलब्ध नहीं खरीदे जा सकते तो सरकार इनका आयात करेगी। जाहिर है बाहर से कोई बड़ी कम्पनी ही इतनी बड़ी संख्या में झण्डे दे पाएगी। वह भी चीन में चूंकि सबसे सस्ते में मिल जाएगा तो भारत अपना तिरंगा झण्डा अपने दुश्मन, जिसने भारत की जमीन पर कब्जा किया हुआ है, से खरीदेगा। ये झण्डे अपने घर पर लगा कर भला कौन सी देशभक्ति हम प्रदर्शित करना चाहते हैं मालूम नहीं?

असल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो भाजपा की प्रेरणा स्रोत है, तो तिरंगे को मानता ही नहीं था। उसका मानना था कि तीन रंग वाला झण्डा भारत के लिए अशुभ होगा। जब 19 दिसम्बर 1929 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया और 26 जनवरी 1930 को तिरंगा फहरा कर स्वतंत्रता दिवस मनाने का आह्वान किया तो संघ प्रमुख हेडगेवार ने अपने कार्यकर्ताओं से भगवा ध्वज फहराने को कहा। रा.स्वं.सं. एक देश, एक संविधान, एक झण्डा, आदि की बात करता है। यह तो उसे तय करना है कि उसका झण्डा भगवा है अथवा तिरंगा? शायद भाजपा का तिरंगा फहराने का फरमान रा.स्वं.सं. के कार्यकर्ताओं के लिए ही है जिन्हें अपनी देशभक्ति साबित करने की जरूरत है। भाजपा का तिरंगे के प्रति प्रेम शायद इसलिए भी है कि स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी विचारधारा वालों की नगण्य भागीदारी का कलंक वह धोना चाह रही है।

क्या तिरंगे को फहरा देने से किसी की देशभक्ति साबित हो जाएगी? बहुत से लोग गलत काम करते हैं और मंदिर जाकर कुछ चढ़ावा चढ़ा देते हैं। क्या उन्हें धार्मिक माना जाएगा? देशभक्त तो वह कहलाएगा जो देश के लिए कुछ काम करे। हमारे समाज बहुत सारे जरूरतमंद लोग हैं। कोरोना काल के बाद माता-पिता बच्चों की पढ़ाई नहीं करवा पा रहे, बीमार अपना इलाज नहीं करवा पा रहे, लोगों के रोजगार छिन गए हैं अथवा उनकी आय घट गई है, आदि।

अच्छा तो यह होता कि झण्डा फहराने के बजाए जरूरतमंदों की मदद की जाती। इससे देश की सही सेवा होती। झण्डा फहराना तो महज एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम है और लोग ऐसा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेंगे तो देश-समाज कैसे मजबूत होगा? इसलिए झण्डा फहराने वाली देशभक्ति तो ज्यादा खतरनाक है क्योंकि वह बहुत सतही है। जाति, लिंग, धर्म, वर्ग के आधार पर भेदभाव बना रहे, अत्याचार-शोषण होता रहे, भ्रष्टाचार होता रहे और हम सोचें कि हमने झण्डा फहरा कर अपनी देशभक्ति साबित कर दी तो यह तो अपने को मुगालते में रखने वाली बात है।

जरा बताइए देशभक्ति वाली सरकार विदेशी कम्पनियों को फायदा पहुंचाने में लगी हुई है। एक तरफ हम चीन को दुश्मन मानते हैं लेकिन चीन के साथ व्यापार बढ़ाते चले जा रहे हैं जिससे ज्यादा फायदा चीन को हो रहा है हमें नहीं। उत्तर प्रदेश की सरकार, जिसका मुखिया एक मंदिर का महंत है, धड़ल्ले से शराब बेच रही है, वह भी विदेशी शराब की दुकान ज्यादा चमकदार दिखाई देती है और शायद बिक्री भी वहीं ज्यादा हो रही होगी। पूर्व की सरकारों, जिन्हें मोदी सरकार अपनी हर असफलता के लिए कोसती है, ने जो परिसम्पत्तियों का निर्माण किया उसे भाजपा सरकार अपने उद्योगपति मित्रों को बेच रही है। देश में एक जाने माने व्यापारी हैं सुब्रत राय। लखनऊ में उनके मुख्यालय के बाहर भारत माता की बड़ी मूर्ति लगी है। उनके कर्मचारियों ने सबसे बड़ी संख्या में साथ खड़े होकर राष्ट्र गान गाने का एक समय विश्व रिकार्ड बनाया था।

सबको मालूम है उन्होंने अपने यहां जमा आम लोगों की पूंजी का क्या किया? मोदी दावा कर सकते हैं कि उनके पूंजीपति मित्र देशभक्त हैं लेकिन क्या गारंटी है कि वे सरकारी बैंकों से कर्ज लेकर, जो जनता का पैसा है, विजय माल्या या नीरव मोदी की तरह देश छोड़ कर चले नहीं जाएंगे? यह कैसी देशभक्त सरकार है जो जनता की गाढ़ी कमाई को पूंजीपतियों के हाथ लुटवा रही है और देश के प्राकृतिक संसाधनों जैसे पानी को लूटने के लिए विदेशी कम्पनियों को खुली छूट दे रखी है। मोदी सरकार देश के किसान को उसकी लागत का डेढ़ गुणा न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में कानूनी अधिकार देने को तैयार नहीं लेकिन बाजार में कोका कोला व पेप्सी मुफ्त का पानी 15-20 गुणा मुनाफे पर बेचकर फायदा अमरीका ले जा रही हैं।

यदि झण्डा फहरवाना ही था तो खादी के कपड़े से बनने की अनिवार्यता क्यों समाप्त की गई? कम से कम देश के लोगों को रोजगार मिलता। खादी ग्रामोद्योग क्षेत्र मजबूत होता। अब तो खादी की जगह कृत्रिम कपड़े वाला झण्डा आएगा। विदेश से आयात करने के बजाए झण्डे विद्यालय के विद्यार्थियों से क्यों नहीं बनवा लिए गए? बहुत सारे बच्चे अपने झण्डे खुद रंग कर बनाते ही हैं। हरेक विद्यार्थी, व्यक्तिगत या समूह में, अपने मोहल्ले की जिम्मेदारी ले लेता। तब सही अर्थ में लोगों की भागीदारी होती। 

यह एक खुला सच है कि जब सरकारी व्यवस्था में बड़े पैमाने पर कोई खरीद होती है तो उसमें घूस खाई जाती है। क्या उ.प्र. सरकार गारंटी दे सकती है कि रुपए 40 करोड़ में कोई अधिकारी, नेता या दलाल घूस नहीं लेगा? आम लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वह देशभक्ति दिखाएं व देश के प्रति बलिदान हो जाने का जज्बा रखें लेकिन पैसे वाला वर्ग देश को लूटने का कोई अवसर नहीं छोड़ता।

भाजपा सरकार का हर घर तिरंगा एक दिखावे वाला कार्यक्रम है। जो पैसे जरूरी चीजों में लग सकते थे उसे बरबाद किया जा रहा है। दो वर्षों से उ.प्र. सरकार शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले 25 प्रतिशत बच्चों की रुपए 450 प्रति विद्यार्थी की दर से विद्यालयों को शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान नहीं कर रही और न ही पूर्व में मिलने वाला रुपए 5,000 प्रति विद्यार्थी की पुस्तकों व पोशाक का भुगतान अभिभावकों को कर रही है।

चार वर्ष पहले जिला उन्नाव के सिद्धनाथ नई बस्ती गांव की निवासी रामदेवी का घर गिर गया था। वह अभी तक पंचायत भवन में अपने परिवार के साथ रह रही हैं। उन्हें आवास का आवंटन नहीं हो रहा। खुले में शौच मुक्त के बड़े बड़े दावे हो गए लेकिन हकीकत यह है कि कितने घरों में शौचालय अभी तक बने नहीं अथवा इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में नहीं हैं। स्वास्थ्य केन्द्रों पर चिकित्सकों की व विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है फिर भी बेरोजगारी बढ़ रही है। सरकारी महकमा अब अपने सारे जरूरी काम छोड़ हर घर पर झण्डा फहराने के कार्यक्रम में लग गया है। यह देश ठोस काम करने के बजाए दिखावा करने वाला देश बनता जा रहा है।

(संदीप पांडेय सोशलिस्ट पार्टी के उपाध्यक्ष और मेगैसेसे पुरस्कार विजेता हैं।)

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