Saturday, October 1, 2022

गैंगरेप के दोषियों की रिहाई व स्वागत का गुजरात मॉडल

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देश की आज़ादी की 75वीं सालगिरह के दिन नरेंद्र दामोदर दास मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप और उसके परिवार के 7 लोगों की हत्या करने वालों को उनके ‘हिंदू’ होने की बुनियाद पर जेल से रिहाई की घोषणा की। जबकि इसके ठीक कुछ घंटे पहले लाल क़िले के ऐतिहासिक प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी महिलाओं के सम्मान में लंबा-चौड़ा फेंक चुके थे। हालांकि उन्होंने यह (टर्म एंड कंडीशन्स) स्पष्ट नहीं किया था कि जिन महिलाओं के सम्मान की बात उन्होंने की है उसमें मुस्लिम और कांग्रेसी महिलायें शामिल नहीं हैं। यहां एक बात यह भी स्पष्ट कर दें कि बिलकिस बानो से बलात्कार की घटना को नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री काल में गुजरात मॉडल के तहत अंजाम दिया गया था।  

मज़े की बात यह है कि इंस्पेक्टर सुबोध कांत सहाय के हत्यारों की रिहाई पर किये गए स्वागत सत्कार की तर्ज़ पर बिलकिस बानो गैंगरेप और 7 परिजनों की हत्या के दोषियों का स्वागत सत्कार आरती, माला मिठाई से किया गया। उन संगीन अपराधियों में ‘हिंदू नायक’ का प्रतिरोपण करके मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं के प्रति रेप गैंगरेप जैसे संज्ञेय अपराध के लिये उकसाया जा रहा है। उनके सामने एक नज़ीर पेश की जा रही है कि आप भी ऐसा कर्म करके आओगे तो समाज आपका ऐसे ही स्वागत-सत्कार करेगा।   

सोशल मीडिया पर जन समाज के लोग बलात्कारियों के स्वागत सत्कार का फोटो वीडियो साझा करके इस बर्बर अमानवीय कृत्य की निंदा कर रहे हैं। गांव समाज की महिलायें जो सोशल मीडिया पर नहीं हैं वो क्या सोचती हैं इस बारे में पूछने पर खेत में निराई करती एक निरक्षर किसान महिला अपना सिर पीटते हुए कहती हैं- “अजोग है भइया। ऐसे लोगों को तो चौक पर फांसी पर लटका देना चाहिए। अरे ऐसा कौन सा बहादुरी का काम करके लोग जेल से लौटे हैं जो उनको माला, फूल मिठाई से स्वागत किया जा रहा है।”    

इलाहाबाद में रहकर सिविल सेवा की तैयारी कर रही एक छात्रा इस पूरे घटनाक्रम पर अपने ग़ुस्से का इज़हार करते हुए कहती है “बतौर नेतृत्वकर्ता नरेंद्र मोदी महिला वर्ग के लिये एक डिजास्टर हैं। एक ओर वो लाल किले से महिलाओं के सम्मान की बात करते हैं और दूसरी ओर अपने निर्णयों से बलात्कारियों में हिंदुत्व की शिनाख़्त करते हैं और उनके साथ खड़े नज़र आते हैं।

जैसे साल 2015 में दादरी में अख़लाक की हत्या सिर्फ़ एक घटना भर नहीं थी बल्कि आने वाले समय में तमाम मुस्लिमों की मॉब लिंचिग की ट्रिगर प्वाइंट थी वैसे ही आने वाले समय में बिलकिस बानो जैसे तमाम मुस्लिम महिलाओं के साथ गैंगरेप के लिये ये ट्रिगर प्वाइंट हो सकती है। जिसका न थाने में केस लिखा जाएगा, न मीडिया में रिपोर्टिंग होगी। बल्कि जिस तरह मॉब लिंचिंग में मारे गये लोगों को ही गौतस्कर और चोर साबित करके मॉब लिंचिंग की घटनाओं को ‘जनता का त्वरित न्याय’ कहकर सामान्यीकरण कर दिया गया वैसे ही गैंगरेप की शिकार लड़कियों, स्त्रियों के चरित्र का हनन कर उन्हें वैश्या बताकर हिंदुत्व का झंडा बुलंद किया जाये तो कोई अचरज़ नहीं होगा”।  

इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करने वाली अर्चना मिश्रा कहती हैं कि योगी सरकार ने स्वामी चिन्मयानंद पर से शिष्या संग बलात्कार का केस वापस ले लिया था। जम्मू-कश्मीर में नाबालिग लड़की के साथ हुए बलात्कार के मामले में भाजपा के दो मंत्रियों द्वारा बलात्कारियों के पक्ष में तिरंगा यात्रा निकाला गया था। और किसी और की बात क्या करें खुद प्रधानमंत्री संसद में कांग्रेस की महिला सांसद की हंसी पर उन्हें अपमानित करते हैं और उनके मंत्री ठहाके लगाते हुए मेज थपथपाते हैं वो दृश्य किसी बलात्कार से कम है क्या?

जब वो किसी एक कांग्रेस नेता की जीवन संगिनी का वैलुएशन रुपये में (50 करोड़ की गर्लफ्रैंड) करते हैं तब वो उनकी यौनिकता पर ही हमला कर रहे होते हैं। क्योंकि अतीत में स्त्रियों की मंडी लगने और उनके ख़रीद फ़रोख्त का कार्य व्यापार होता रहा है। जब वो कांग्रेस अध्यक्ष को जर्सी गाय बुलाते हैं तब भी वो उनकी योनि को ही टारगेट कर रहे होते हैं। और तो और बिलकिस बानो का गैंगरेप मोदी जी के ही शासनकाल में हुआ था। जिसमें ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ बयान के साथ वो भी सहभागी थे।  

ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन्स एसोसिएशन की सदस्य कविता कृष्णन ने भी दोषियों की रिहाई पर सवाल उठाते हुये जनचौक से कहा है कि स्वतंत्रता दिवस पर जब प्रधानमंत्री हमें महिलाओं का सम्मान करने और नारी शक्ति का समर्थन करने के लिए भाषण दे रहे थे तब गुजरात सरकार अपनी क्षमा नीति के तहत बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार मामले के 11 दोषियों को रिहा कर रही थी। महिलाओं के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी की नीयत पर सवाल खड़ा करते हुये वो आरोप लगाती हैं कि बिलकिस बानो उनकी ‘नारी शक्ति’ का हिस्सा नहीं हैं, क्योंकि वह एक मुस्लिम हैं।

हिंदू बलात्कारियों के स्वागत में तत्पर सरकार के इरादे का पर्दाफाश करते हुये कविता कृष्णन आगे कहती हैं कि नरेंद्र मोदी जी कल जब आपने ‘महिलाओं का सम्मान’ कहा था तो क्या आपका मतलब उन बलात्कारियों और हत्यारों को बधाई के लड्डू देना था, जिन्हें गुजरात में आपकी पार्टी की सरकार द्वारा मुक्त किया गया है? क्या बलात्कारी ‘चाचा’ और ‘भाइयों’ को ये लड्डू मिल रहे हैं, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम बिलकिस बानो का बलात्कार किया?

फौरी तौर पर बता दें कि आज से 20 साल पहले 27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में 59 कारसेवकों की जलकर मौत होने की घटना के बाद पूरे गुजरात में प्रायोजित सांप्रदायिक जनसंहार शुरू किया गया था। ग्राउंड पर जिसका नेतृत्व तत्कालीन मोदी सरकार में बाल एवं महिला विकास मंत्री माया कोडनानी और बजरंग दल के बाबू बजरंगी जैसे लोग कर रहे थे। जान बचाने के लिए बिलकिस बानो, जो उस समय पांच महीने की गर्भवती थीं, अपनी बच्ची और परिवार के 15 लोगों के साथ अपना गांव छोड़कर सुरक्षित ठिकाने की चाह में दाहोद जिले की लिमखेड़ा तालुका में छिप गये। 3 मार्च 2002 को 20-30 हैवानों की भीड़ ने बिलकिस बानो के परिवार पर हमला किया।

उन्होंने बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया, और उसके बाद बिलकिस बानो की तीन साल की बच्ची समेत परिवार के सात सदस्यों की हत्या कर दी। बिलकिस बानो के साथ हुए इस जघन्य अपराध की सूचना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पहुंचने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए तब जाकर इस मामले के आरोपियों को साल 2004 में गिरफ्तार किया गया। मामले की सुनवाई पहले अहमदाबाद में शुरू हुई थी, लेकिन बिलकिस बानो द्वारा यह आशंका जताने के बाद कि मोदी सरकार में गवाहों को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, साथ ही सीबीआई द्वारा एकत्र सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती है, सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2004 में मामले को मुंबई स्थानांतरित कर दिया। 

जहां 21 जनवरी 2008 को सीबीआई की विशेष अदालत ने बिलकिस बानो से सामूहिक बलात्कार और उनके सात परिजनों की हत्या का दोषी पाते हुए 11 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। सीबीआई की विशेष अदालत ने सात अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था जबकि एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी। इसके बाद मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा। जहाँ साल 2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपियों की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए अन्य सात लोगों को बरी करने के निर्णय को पलट दिया। इसके बाद अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को बिलकिस बानो को 50 लाख रुपये का मुआवजा, सरकारी नौकरी और आवास देने का आदेश दिया।

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