Saturday, November 27, 2021

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क्या आरएसएस के दखल के बाद नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के बीच संघर्ष विराम हो गया है?

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संघ ने एलान कर दिया है कि आगामी यूपी चुनाव में योगी आदित्यनाथ ही चेहरा होंगे। जबकि राजनीतिक परिस्थितियाँ योगी के विपरीत हैं। भाजपा के अधिकांश विधायक योगी की कार्यशैली से नाराज हैं। माना जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी योगी आदित्यनाथ को पहले से ही पसंद नहीं करते। मोदी की मर्जी के विपरीत संघ के दबाव में योगी को यूपी का सीएम बनाया गया था। तब से योगी और मोदी के बीच अंदरूनी टकराव पनप रहा है।

योगी पर नजर रखने के लिए दिल्ली दरबार से भेजे गए अरविन्द शर्मा के आते ही यह टकराव खुलकर सामने आ गया। अरविंद शर्मा के मार्फत मोदी द्वारा की गई योगी की घेराबंदी की कोशिश को नाकाम हो गई। योगी आदित्यनाथ ने संघ के मार्फत मोदी की बाजी को उलट दिया। यूपी में योगी की बादशाहत बरकरार है। इतना ही नहीं, आरएसएस ने तय किया है कि आगामी तमाम विधानसभा चुनाव मोदी के चेहरे पर नहीं लड़े जाएंगे।

दलील यह है कि विधानसभा चुनावों में विरोधियों के हमले से मोदी की इमेज को नुकसान हो सकता है। क्या वास्तव में आरएसएस मोदी की इमेज को लेकर चिंतित है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि संघ योगी को आगे करके मोदी पर अंकुश लगाना चाहता है? लेकिन एक सवाल यह भी है कि आरएसएस और भाजपा की पृष्ठभूमि ना होते हुए भी संघ योगी आदित्यनाथ को क्यों आगे करना चाहता है? आखिर मोदी द्वारा बिछाई गई बिसात पर योगी के कामयाब होने का रहस्य क्या है?

क्या योगी के बगावती इतिहास के कारण संघ को भाजपा के टूटने का डर है? लेकिन क्या योगी को इल्म नहीं कि भाजपा छोड़कर गए कल्याण सिंह, उमा भारती और वी. एस. येदुरप्पा जैसे नेताओं का क्या हश्र हुआ? अपना अस्तित्व को बचाने के लिए इन नेताओं को वापस भाजपा में लौटना पड़ा।

योगी इन नेताओं के इतिहास से बखूबी वाबस्ता हैं। योगी जानते हैं कि भाजपा छोड़कर बाहर जाने से उनका राजनीतिक करियर भी खत्म हो सकता है। बावजूद इसके योगी के तेवर नरम नहीं हैं। बल्कि इस बीच प्रदेश भाजपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडिल से मोदी की तस्वीर हटा दी गई। लगता है, योगी आदित्यनाथ मोदी से सीधे टकराने के मूड में आ चुके हैं।

नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर की खासियत रही है कि उन्होंने अपने विरोधियों और प्रतिद्वंद्वियों को बड़ी कुशलतापूर्वक किनारे लगाया है। क्या मोदी योगी की चुनौती से निपटने के लिए तैयार हैं ? तब क्या योगी इतिहास बन जाएंगे? कहीं ऐसा तो नहीं है कि भाजपा में नरेंद्र मोदी के रहते हुए कोई दूसरा मोदी योगी के रूप में खड़ा हो गया है, उसी तेवर और चुनौती के साथ। लेकिन यह भी सच है कि योगी में उस राजनीतिक कौशल की कमी है, जिससे मोदी ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को हाशिए पर पहुँचाया है।

नरेंद्र मोदी के राजनीतिक दांव पेच को समझने वाले योगी अगर सीधे तौर पर उन्हें चुनौती दे रहे हैं तो योगी के पास कोई ताकत जरूर होगी। योगी यह बता देना चाहते हैं कि वे कल्याण सिंह और उमा भारती नहीं हैं। आखिर क्या है, योगी की ताकत? पहली बात तो यह है कि योगी दलित या पिछड़े नेता नहीं हैं। योगी उस क्षत्रिय वर्ण से आते हैं जो हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में शासक है। इस नाते नागपुर यानी परामर्शदाता ब्राह्मणवर्चस्व वाला संघ उनके साथ खड़ा रहेगा।

दरअसल, भाजपा और आरएसएस सवर्ण वर्चस्ववादी संगठन हैं। राममंदिर आंदोलन के समय भाजपा-आरएसएस ने पिछड़े, दलित तबके को हिंदुत्व की धारा से जोड़ा। इस आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में ज्यादातर पिछड़े समाज के नेता थे; कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार, साक्षी महाराज आदि। कारसेवकों में मरने वाले सबसे ज्यादा पिछड़ी जातियों के थे। लेकिन संघ और भाजपा में दलित, पिछड़े केवल आज्ञाकारी ‘हनुमान’ बनकर रह सकते हैं। जब किसी ने बगावत की तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

लेकिन क्षत्रिय होने के नाते योगी की बगावत को लक्ष्मण के गुस्से की तरह देखा जाएगा। दूसरा, नरेंद्र मोदी के सर्वाधिकारवादी रवैये के कारण पार्टी में उनके विरोधियों की भी कमी नहीं है। राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी तक इन परिस्थितियों में योगी के साथ खड़े होने में संकोच नहीं करेंगे। माना तो यह जाता है कि योगी को उत्साहित करने वाले राजनाथ सिंह हैं। लगता है कि उनके मन में कोई टीस रह- रहकर दर्द देती है!

योगी की तीसरी ताकत उनकी पृष्ठभूमि है। योगी 2017 से पहले ना कभी भाजपा के सदस्य थे और ना आरएसएस के स्वयंसेवक। उनकी पृष्ठभूमि हिंदू महासभा की है। उनके दादा गुरु दिग्विजयनाथ 1937 में वी.डी. सावरकर की हिंदू महासभा से जुड़े। सावरकर ने उन्हें संयुक्त प्रांत का अध्यक्ष बनाया। दिग्विजय नाथ पहले नेता हैं जिन्होंने 1949 में राम जन्मभूमि मंदिर को मुद्दा बनाया था। विवादित स्थल पर 9 दिन तक चले रामचरितमानस के पाठ और  रात के अंधेरे में मस्जिद में मूर्ति रखे जाने के पीछे दिग्विजय नाथ का ही हाथ माना जाता है।

दिग्विजय नाथ के शिष्य अवेद्यनाथ 1984 में गठित राम जन्म भूमि यज्ञ समिति के अध्यक्ष बनाए गए। इसके बाद सितंबर 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में कारसेवा से आंदोलन परवान चढ़ा। इसलिए बुनियादी तौर पर राममंदिर आंदोलन हिन्दू महासभा और गोरखनाथ पीठ की देन है। इस पर सवार होकर ही भाजपा दिल्ली तक पहुँची है।

योगी की चौथी ताकत उनका मठाधीश होना है। वह गोरखनाथ मठ के पीठाधीश्वर हैं, गेरुआ वस्त्र धारी हैं। इसलिए उन्हें स्वाभाविक तौर पर हिंदुत्व का ब्रांड एंबेसडर माना जाता है। यही कारण है कि खासतौर पर 2017 के बाद भाजपा ने उन्हें स्टार प्रचारक बनाकर देश के विभिन्न हिस्सों में इस्तेमाल किया। चुनावों में नरेंद्र मोदी के बाद योगी ही सबसे बड़े स्टार प्रचारक माने जाते हैं। हालांकि सांप्रदायिक मुद्दों पर योगी ज्यादा आक्रामक रहे हैं।

हैदराबाद के नगर पालिका चुनाव से लेकर बंगाल विधान सभा चुनाव तक, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए योगी के चेहरे और उनकी भाषा का इस्तेमाल किया गया। देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम नाथपंथी समुदाय रहते हैं। इन हिस्सों में विशेष रुप से नाथपंथ के सबसे बड़े महंत योगी आदित्यनाथ को चुनाव में प्रचारक बनाकर भेजा गया। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेंद्र मोदी और आरएसएस ने योगी को अखिल भारतीय नेता के रूप में स्थापित किया। जाहिर तौर पर उनके मन में भी प्रधानमंत्री बनने की चाहत होगी।

आरएसएस और भाजपा विश्व हिंदू परिषद के माध्यम से तमाम मठों-मंदिरों के साधू-सन्यासियों से जुड़ा रहा है। राम मंदिर आंदोलन से लेकर भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में साधु सन्यासियों की भी भूमिका रही है। योगी के सीएम बनने के बाद  तमाम मठाधीश उनके इर्द-गिर्द जमा हुए हैं। मठाधीशों पर मोदी की अपेक्षा योगी का प्रभाव अब ज्यादा है। यह भी योगी की एक ताकत है। दरअसल, राम मंदिर आंदोलन के बाद बहुत से बाबाओं ने बड़ी राजनीतिक ताकत हासिल कर ली है। भाजपा, कांग्रेस सहित कई दूसरे दल साधु-बाबाओं की धार्मिक और सामाजिक साख का इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन योगी स्वयं पीठाधीश्वर हैं, इसलिए उनके इर्द-गिर्द इस समुदाय का जुड़ना आसान ही नहीं स्वाभाविक भी है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मोदी के प्रति दूसरे नेताओं की नाराजगी योगी की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। राजस्थान में वसुंधरा राजे, कर्नाटक में येदुरप्पा या केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी जैसे नेताओं और अन्य असंतुष्टों की फौज योगी के इर्द गिर्द खड़ी हो सकती है। योगी भले ही मोदी के सामने कमजोर लगते हों, लेकिन भाजपा और सरकार ठहरे हुए पानी की तरह शांत हैं। अगर कंकड़ पड़ेगा तो हलचल तेज होगी।

(रविकांत लखनऊ विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

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