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जेपी ने इधर ‘सिंहासन खाली करो’ का नारा दिया उधर आपातकाल लगा

दिल्ली के रामलीला मैदान में 25 जून की शाम को रैली में जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता का अंश ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ को अपना नारा बनाया। रैली का आयोजन इलाहाबाद हाईकोर्ट और उच्चतम न्यायालय के फैसलों के बाद किया गया था। जेपी ने कहा कि अब समय आ गया है कि देश की सेना और पुलिस अपनी ड्यूटी निभाते हुए सरकार से असहयोग करे। उन्होंने कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए जवानों से आह्वान किया कि वे सरकार के उन आदेशों की अवहेलना करें जो उनकी आत्मा को कबूल न हों। इसी को आधार बनाकर इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात को देश में आपातकाल लगाने का फैसला लिया और राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की ओर से हस्ताक्षर किए जाने के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया।

देश में 25 जून, 1975 को आपातकाल घोषित किए जाने से पहले कई घटनाओं ने इसकी रुप रेखा तैयार कर दी थी। इसकी शुरुआत 12 जून 1975 से हो गई, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इस दिन अपने बड़े और साहसिक फैसले में रायबरेली से सांसद के रूप में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया। साथ ही हाईकोर्ट ने अगले 6 साल तक उनके किसी भी तरह के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 11 दिन बाद 23 जून को इंदिरा गांधी ने उच्चतम न्यायालय में इसे चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए। अगले दिन 24 जून को सुप्रीम कोर्ट की ग्रीष्मकालीन अवकाश पीठ के जज जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वे हाईकोर्ट के फैसले पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएंगे। लेकिन उन्होंने इंदिरा को प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की इजाजत दे दी। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि वो अंतिम फैसला आने तक बतौर सांसद किसी भी तरह का मतदान नहीं कर सकेंगी। उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के बाद इंदिरा गांधी के पास राज्यसभा में जाने का रास्ता भी नहीं बचा था। इसके एक दिन बाद 25 जून, 1975 को इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल लगा दिया।

दरअसल देश में इस समय इंदिरा गांधी के लिहाज से राजनीतिक हालात बहुत अच्छे नहीं चल रहे थे। कांग्रेस पार्टी के अंदर और बाहर हर ओर उनके खिलाफ विरोध के सुर सुनाई पड़ रहे थे। 1971 के चुनाव में जीत हासिल करने के लिए इंदिरा को खासी मेहनत करनी पड़ी। इसी चुनाव में उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ का चर्चित नारा दिया और इसी नारे के दम पर वह पूर्ण बहुमत के साथ फिर से सत्ता में लौट आईं थीं। कांग्रेस को इस चुनाव में 518 सीटों में 352 सीटें हासिल हुईं और इंदिरा फिर से प्रधानमंत्री बन गईं थीं।

इंदिरा गाँधी ने रायबरेली संसदीय सीट से चुनाव लड़ा था और एक लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव जीतने में कामयाब रही थीं। लेकिन उनके प्रतिद्वंदी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण ने फैसले को स्वीकार नहीं किया और इंदिरा की इस जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दे दी। यह केस उस समय बेहद चर्चित रहा, ‘इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण’ के नाम से जाना गया, लेकिन इस चुनाव पर फैसला 4 साल बाद 1975 में आया।

राज नारायण ने अपने केस में इंदिरा गांधी पर भ्रष्टाचार, सरकारी मशीनरी और संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप लगाया। राज नारायण की ओर से शांति भूषण ने जबकि इंदिरा की ओर से नाना भाई पालकीवाला ने केस लड़ा। शांति भूषण और रमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने राज नारायण का पक्ष रखते हुए कहा कि इंदिरा ने चुनाव प्रचार में सरकारी कर्मचारियों और संसाधनों तक का इस्तेमाल किया। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री के सचिव यशपाल कपूर का उदाहरण दिया जिन्होंने राष्ट्रपति की ओर से इस्तीफा मंजूर होने से पहले ही इंदिरा के लिए काम करना शुरू कर दिया था। और यही दलील इंदिरा के खिलाफ गई और कोर्ट ने जन प्रतिनिधित्व कानून के आधार पर उनके चुनाव को खारिज कर दिया।.

दरअसल पहले से ही गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलनों के कारण विपक्ष एकजुट होता जा रहा था और आन्दोलन और राज्यों में फैलता जा रहा था।लोकनायक’ जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में विपक्ष एकजुट हो चुका था और केंद्र सरकार पर लगातार हमलावर था।हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष और हमलावर हो गया।

दिल्ली के रामलीला मैदान में 25 जून की शाम को जयप्रकाश नारायण (जेपी) की रैली थी। जेपी ने इस रैली में बड़ी संख्या में आए लोगों के बीच इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग की। 25 जून की शाम को कोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा चौतरफा घिरती जा रही थीं और कहा जाता है कि वह किसी भी सूरत में प्रधानमंत्री पद नहीं छोड़ना चाहती थीं। उनको लगता था की जस्टिस सिन्हा के फैसले में षड्यंत्र है।

राज नारायण बनाम इंदिरा गाँधी नामक इस मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली का दोषी पाया था। 12 जून 1975 को सख्त जज माने जाने वाले जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने निर्णय में उनके रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध करार दे दिया। साथ ही अगले छह साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने फैसले में माना कि इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग किया इसलिए जन प्रतिनिधित्व कानून के अनुसार उनका सांसद चुना जाना अवैध है। हालांकि अदालत ने कांग्रेस पार्टी को थोड़ी राहत देते हुए नई व्यवस्था बनाने के लिए तीन हफ्तों का वक्त दे दिया।

साथ ही जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को भ्रष्टाचार के आरोप से भी मुक्त कर दिया था और कांग्रेस के चुनाव चिन्ह गाय और बछड़े को धार्मिक नहीं माना था। कोर्ट में दोनों पक्षों के प्रकांड विद्वानों की गवाही हुई लेकिन जस्टिस सिन्हा ने अपने फैसले में कई उदाहरण देकर यह निर्णय दिया कि गाय धार्मिक चुनाव चिन्ह नहीं है। यह इसलिए और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जस्टिस सिन्हा बहुत ही धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे और साधु संतों से बहुत प्रभावित थे। इसके अलावा उन पर  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रभावित होने के आरोप भी लगे थे। इसके बावजूद उन्होंने गाय और बछड़े को धार्मिक नहीं माना। 

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा राज नारायण की याचिका को 2 आधार पर अनुमति दी गई। पहला यह कि प्रधानमंत्री ने, प्रधानमंत्री सचिवालय में विशेष ड्यूटी पर एक अधिकारी, यशपाल कपूर का इस्तेमाल किया था, ताकि उनकी चुनावी संभावनाओं को आगे बढ़ाया जा सके। निर्णय में यह कहा गया कि यद्यपि कपूर ने 7 जनवरी 1971 को इंदिरा गांधी के लिए चुनावी कार्य शुरू कर दिया था और 13 जनवरी को अपना इस्तीफा दे दिया था, लेकिन वह 25 जनवरी तक सरकारी सेवा में जारी रहे थे। इंदिरा गांधी, निर्णय के अनुसार, 29 दिसंबर, 1970 से खुद को उम्मीदवार के रूप में प्रकट कर रही थीं, जिस दिन उन्होंने नई दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया और चुनाव के लिए खड़े होने के अपने फैसले की घोषणा की थी। दूसरा आधार यह था कि, उन्होंने उत्तर प्रदेश में सरकारी अधिकारियों से सहायता प्राप्त की ताकि वे चुनावी रैलियों को संबोधित कर सकें। अधिकारियों ने लाउडस्पीकर और बिजली की भी व्यवस्था की थी।

इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लागू करने का फैसला किया और इसके लिए उन्होंने जयप्रकाश नारायण के बयान का हवाला दिया। 26 जून, 1975 की सुबह राष्ट्र के नाम अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा कि आपातकाल जरूरी हो गया था। एक नेता सेना और पुलिस को विद्रोह के लिए भड़का रहा है। इसलिए देश की एकता और अखंडता के लिए यह फैसला जरूरी हो गया था।

इंदिरा गांधी ने जून 1975 में आपातकाल लगाया था। आपातकाल के बाद जब देश में लोकसभा चुनाव हुआ, तो कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा था। इंदिरा गांधी के साथ-साथ उनके बेटे संजय गांधी भी चुनाव हार गये थे। यह चुनाव इतिहास की बड़ी घटना थी। दरअसल इंदिरा गांधी जनता की नाराजगी को नहीं भांप पायीं। 1977 में शायद इंदिरा गांधी चुनाव कराने के लिए तैयार नहीं होतीं, अगर उन्हें जनता की नाराजगी का सही फीड बैक मिल गया होता।

उन्हें उनके निजी सचिव पीएन धर ने खुफिया हवाले से जानकारी दी थी कि अगर चुनाव कराया जाये तो कांग्रेस 340 सीट जीत सकती है। हुआ इसका उलटा। आपातकाल से जनता नाराज थी, जेपी के प्रयासों से संगठन कांग्रेस, संसोपा, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी का विलय करके जनता पार्टी के रूप में विपक्ष एकजुट हो गया था। लेकिन राजनीति में खोटे सिक्के की छवि वाले मोरार जी देसाई को प्रधानमन्त्री बनाना महंगा पड़ा। वे पार्टी को एकजुट नहीं रख पाए। फिर संघ की कार्यशैली से दोहरी सदस्यता का मामला तूल पकड़ गया और जनता पार्टी की सरकार गिर गयी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)   .

This post was last modified on June 25, 2020 5:44 pm

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