Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा के फैसले से हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट को लेनी चाहिए प्रेरणाः मुकुल रोहतगी

दिल्ली की एक अदालत द्वारा दिशा रवि को जमानत मामले में दिए गए 18 पन्नों के फैसले से जलजला आ गया है। अभी तक उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के फैसले नज़ीर बनते रहे हैं और अधीनस्थ न्यायालय पर बाध्यकारी होते हैं। पर पहली बार मुकुल रोहतगी जैसे चोटी के वकील ने कहा है कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को दिशा रवि के आदेश से सीखना चाहिए। यदि किसी और वकील, मसलन प्रशांत भूषण या कोई और, या सामाजिक कार्यकर्ता या बुद्धिजीवियों ने ऐसा कहा होता तो अब तक उच्चतम न्यायालय की मर्यादा भंग करने के आरोप में उस पर अदालती अवमान अधिनियम का शिकंजा कस गया होता।

पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने टीवी चर्चा में एंकर राजदीप सरदेसाई को बताया कि उच्च न्यायालयों और उच्च्तम न्यायालय  को स्वतंत्रता और जमानत के मामलों से निपटते हुए, न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा के उस आदेश से प्रेरणा लेना चाहिए चाहिए, जो  उन्होंने टूलकिट एफआईआर आरोपी दिशा रवि को जमानत देते हुए दिया है। रोहतगी ने कहा कि मैं न्यायपालिका के लिए बहुत सम्मान के साथ कह सकता हूं, तो उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय इस मोर्चे पर पिछड़ रहे हैं।

रोहतगी ने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में अदालतों, विशेष रूप से उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय ने जमानत देने में अनिच्छा दिखाई है। रोहतगी ने कहा कि जमानत न देकर वे एक प्रकार से दंड दे रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हालांकि दोषी सिद्ध होने के पहले आरोपी की निर्दोषता का अनुमान हमारे संविधान के मूल सिद्धांतों में से एक है, इस नियम को पिछले दस वर्षों में पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे 1980, 90 और 2000 के दशक के बाद से निर्दोषता के अनुमान के इस नियम को बदल दिया गया। सबसे पहले, इसे आतंकवादी मामलों में बदल दिया गया। इसे उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार कर लिया क्योंकि राष्ट्र की सुरक्षा दांव पर है, लेकिन पिछले 10 वर्षों में, मासूमियत के अनुमान के इस नियम को अपराध के रूप में जीएसटी अधिनियम के उल्लंघन के रूप में पूर्ण रूप से अपराध माना गया है।

रोहतगी ने कहा कि मामूली या छोटे  अपराधों के लिए भी गंभीर आरोपों को शामिल करने का दोष पुलिस पर होगा। मुझे पता चला है कि एक ऐसी पुलिस है, जो एक एफआईआर में देशद्रोह या हत्या के आरोप जैसे गंभीर अपराध डालती है। जिस पर  न्यायाधीश आमतौर पर बैकसीट लेता है और जैसे ही उसे जमानत देनी चाहिए, नहीं देता है।

रोहतगी ने कहा कि यह पुलिस है जो एफआईआर गढ़ती है, सरकार नहीं। साधारण मामलों में जो पांच साल तक की सजा के साथ दंडनीय हैं, राष्ट्रद्रोह या हत्या के प्रयास जैसे आरोप लगते ही मामले को 10 साल तक ले जाएगा और फिर न्यायाधीश यह सोचेंगे कि यह बहुत गंभीर अपराध है। उदाहरण के लिए जैसे कि कार दुर्घटना का मामला है, उनमें हत्या के प्रयास के आरोप लगाने से मामला गंभीर हो जाता है। क्या आप इस पर विश्वास कर सकते हैं?

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में अब एक मानसिकता है, जिसमें जमानत देने के लिए एक लंबा समय लगता है, जिस समय तक आरोपी पहले ही 30 से 90 दिन या उससे अधिक हिरासत में बिता चुके होते हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका ने इस तरह जमानत न देकर एक तरह की सजा देने की अनुमति दी है। ‘अरे चलता है, किसी को 30 दिन, 60 दिन, 90 दिन जेल में रहने दो। उसे जेल की कडवी दावा का स्वाद लेने दें, क्योंकि 50 प्रतिशत संभावना है कि वह व्यक्ति बरी हो जाएगा। उन्होंने कहा कि कल मैंने सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी पर एक रिपोर्ट पढ़ी, जिसमें मुझे लगा कि यह अब नियम है। आपको एक अंडरट्रायल के रूप में सजा का कुछ स्वाद मिलना चाहिए जो कि मेरी नजर में पूरी तरह से अवैध है।

रोहतगी ने कहा कि हम नौकरशाही पर सिर्फ फाइलों को लालफीताशाही में दबाने का आरोप लगाते हैं। अब यही बात न्यायपालिका में भी हो रही है। पहली अदालत कहती है, आप जिला अदालत जाइए। जिला अदालत कहती है, आप उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय जाएं, मैं जमानत नहीं दूंगा। आपको जेल में कुछ समय बिताना होगा। यह अब मानसिकता है- कुछ समय बिताओ।

रोहतगी ने कहा कि न्यायपालिका को जस्टिस कृष्ण अय्यर द्वारा निर्धारित 1978 की स्थिति में वापस आना होगा, जिसमें कहा गया है कि जमानत का नियम होना चाहिए, अपवाद नहीं। उन्होंने कहा, न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने झंडा फहराया है, उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालयों को इससे सीख लेनी चाहिए और 1978 में जस्टिस कृष्ण अय्यर ने जो कहा, वह अभी भी कानून है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से इसका पालन नहीं किया गया है।

गौरतलब है कि दिल्ली के एक सत्र न्यायालय के न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने दिशा रवि को ज़मानत दे दी है, लेकिन जमानत देते हुए अदालत ने जिन सवालों को खड़ा किया है, उसने मौजूदा केंद्र सरकार, भाजपा, उसके सहयोगी संगठनों और मीडिया के एक तबके को सीधे कठघरे में खड़ा कर दिया है। पिछले कुछ सालों में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कड़े अंकुश लगाने की कोशिश सरकारें कर रही है। सरकारों को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं है और आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए राजद्रोह जैसे मुक़दमे धड़ल्ले से लगाए जा रहे हैं।

न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिक सरकार की अंतरात्मा की आवाज़ के रक्षक होते हैं। उन्हें जेल में सिर्फ इस आधार पर नहीं डाला जा सकता है कि वे सरकार की नीतियों से इत्तेफाक़ नहीं रखते… राजद्रोह सरकारों की घायल दर्प की तुष्टि के लिए नहीं लगाया जा सकता है। एक जागृत और मज़बूती से अपनी बातों को रखने वाला नागरिक समाज एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।

न्यायाधीश ने निहारेन्दु दत्त मजुमदार बनाम एम्परर एआईआर मामले के फ़ैसले के हवाले से कहा कि विचारों की भिन्नता, अलग-अलग राय, असहमति यहां तक अनुपात से अधिक असहमति भी सरकार की नीतियों में वैचारिकता बढ़ाती है। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत असहमति का अधिकार दृढ़ता से निहित है।

न्यायाधीश राणा ने कहा कि अभियोग झूठा, बढ़ा-चढ़ा कर लगाया गया या ग़लत नीयत से भी लगाया हुआ हो सकता है, पर उसे तब तक राजद्रोह कह कर कलंकित नहीं किया जा सकता जब तक उसका चरित्र सचमुच में हिंसा पैदा नहीं कर रहा हो। राजद्रोह के मामले में न्यायाधीश राणा ने 1962 के केदार नाथ मामले का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ शब्दों से ही नहीं, बल्कि उन शब्दों के कारण वास्तव में हिंसा या उसके लिए उकसावा देने का मामला साबित होना चाहिए।

न्यायाधीश राणा ने कहा कि दिशा रवि और प्रतिबंधित संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ के बीच प्रत्यक्ष तौर पर कोई संबंध स्थापित नजर नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि एक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाना या एक हानिरहित टूलकिट को एडिट करने वाला होना कोई अपराध नहीं है। प्रत्यक्ष तौर पर ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता जो इस बारे में संकेत दे कि दिशा रवि ने किसी अलगाववादी विचार का समर्थन किया है। जांच एजेंसी को अनुकूल पूर्वानुमानों के आधार पर नागरिक की स्वतंत्रता को और प्रतिबंधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

दिल्ली पुलिस ने दिशा रवि के मामले में अदालत से कहा था कि हालांकि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर अभियुक्त का हिंसा से सीधा संबंध जोड़ा जा सके, पर जो स्थितियां हुई थीं, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अलगाववादी ताक़तों ने हिंसा फैलाई थी और किसान आंदोलन सिर्फ इसके लिए एक मुखौटा था।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on February 26, 2021 10:40 pm

Share