दिल्ली में हिंदू खतरे से बाहर, बिहार में अब धर्म को संकट में ले आने की तैयारी

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दिल्ली में धर्म पर मंडरा रहा खतरा अब टल गया है! सुनने में आ रहा है कि खतरा अब बिहार की तरफ कूच की तैयारी में है! हो सकता हो कि 11 तारीख को खतरे के बादल छंट भी जाएं, क्योंकि बादल हमेशा घनघोर ही नहीं रहते! वैसे भी ये तूफानी बादल होते हैं और इनकी लंबी आयु नहीं होती। फिर भी मैं बिहार के लोगों से निवेदन कर रहा हूं कि खतरे के हिसाब से तैयारी शुरू कर दीजिए!

जब चुनावों के हिसाब से धर्म का खतरा बढ़ता-घटता हो तो जनता को ज्यादा संजीदा, संवेदनशील और सतर्क हो जाना चाहिए। देश में बेरोजगारी ने 45 साल का रिकॉर्ड ही नहीं तोड़ा है, बल्कि किसान आत्महत्या से भी बेरोजगार आत्महत्या ने प्रतियोगिता जीत ली है! डेमोक्रेसी इंडेक्स से लेकर हंगर इंडेक्स तक में भारत ने रिकॉर्ड कायम कर दिए हैं!

आज मुझे दुःख इस बात का है कि 11 राज्यों और देश पर शासन करने वाली पार्टी ने अपनी पूरी ताकत दिल्ली के चुनाव को नाक समझकर झोंकी और विरोधी लोग पूरी तरह सक्रिय नजर आ रहे थे, मगर दिल्ली वोट देने उम्मीद के हिसाब से मतदान केंद्र तक नहीं पहुंची!

जागरूकता के हिसाब से देखा जाए तो दिल्ली को देश के सामने उदाहरण पेश करना था, मगर दिल्ली यहां चूक गई! लगता है ज्यादा राजनीतिक सक्रियता लोगों के मन में भय पैदा कर रही है! हर वोटर के पीछे कार्यकर्ताओं का लगना मतदान की गोपनीयता को तिलांजलि देता है।

मतदान केंद्र के पास जो टेबल कुर्सियां लगाए बैठे थे, वो ज्यादातर खाली बैठे रहे! लोगों में ख़ौफ़ इस कदर नजर आया कि घर पर जो पर्चियां आईं उनको जेब में डाला और चुपचाप मतदान करके आ गए! एक की टेबल पर से पर्ची ले ली बाकी नाराज! शहरी परिवेश में कोई समाजिक सहारा नहीं होता है, इसलिए लोग डरे-सहमे रहे!

शहरों में जाति नहीं सिर्फ धर्म चलता है और धर्म का बखेड़ा सियासत ने ऐसा खड़ा किया कि बहुसंख्यक इलाकों तक में लोग ख़ौफ़ के साये में बेफिक्र होकर मतदान नहीं कर पाएं! दिल्ली में चाहे कोई पार्टी जीते मगर जनतंत्र हारा है!

दिल्ली देश की राजधानी है और सारे मीडिया का जमघट यहां रहा! मीडिया को बाइट देने के लिए धक्का-मुक्की करने वाली जनता मुंह खोलने को आज कतराती नजर आई! मीडिया अब एग्जिट पोल के माध्यम से कितने ही दावे कर ले मगर सच्चाई 11 फरवरी को ही नजर आएगी!

एक बात तय है कि जनता भले ही धर्मसंकट में फंसकर बोलने से कतराती रही हो मगर दिलो-दिमाग में सिर्फ विकास था। कम मत प्रतिशत में भी पलड़ा केजरीवाल का ही भारी है और सत्ता परिवर्तन नहीं होना है, मगर सियासत ने जो जहर बोया है उसको सिर्फ हार-जीत से खत्म नहीं किया जा सकता! वक्त लगेगा!

इतना जरूर है कि इस चुनाव के बाद फर्जी राष्ट्रवाद का मुद्दा दम तोड़ देगा। लोग बुनियादी जरूरतों को लेकर सवाल-जवाब करेंगे। दिल्ली में केजरीवाल की जीत पूरे देश में उन राजनेताओं को हौसला देगी जो काम करना चाहते हैं, जनता को प्रेरणा देगी काम करने वाले के पीछे खड़े होने की! अगर केजरीवाल हारते हैं, जिसकी संभावना न्यूनतम है, तो ये खतरे के बादल और घनघोर होंगे और तेज गर्जना के साथ बाकी राज्यों में कोहराम मचाएंगे!

प्रेमाराम सियाग/मदन कोथुनियां

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