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गांधी स्मृति श्रृंखला (भाग-5): हिंदुत्ववादियों को सताता है गांधी का ‘जिंदा भूत’!

गांधी के बरअक्स उसके हत्यारे गोडसे के बढ़ते महिमामण्डन के आखिर क्या मायने निकलते हैं।

2014 में – जब भाजपा की अगुआई वाली सरकार केन्द्र में पहुंची – तब ग्लोबल हिन्दू फाउण्डेशन की तरफ से केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को एक पत्र लिखा गया था कि वह इस बात को सुनिश्चित करे कि नाथूराम गोडसे एक ‘‘राष्ट्रीय हीरो’’ था और उसके मुताबिक भारतीय स्कूलों के पाठ्यपुस्तकों में बदलाव करे। इस पत्र में इतिहास को बाकायदा तोड़-मरोड़ कर लिखा गया था कि गोडसे ने ‘‘ब्रिटिशरों के खिलाफ संघर्ष में भूमिका अदा की थी।’’

उन्हें इस बात की कोई चिन्ता नहीं है कि गोडसे का महिमामंडन देश में बदले की ऐसी सियासत को बढ़ावा देना है जो देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सकती है। हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादकीय / 29 दिसम्बर 2014/ में इसी बात को रेखांकित किया गया था:

गोडसे का उत्सव मनाना एक तरह से ऐसी झुंड की सियासत को महिमामंडित करना है जो अगर आगे बढ़ती है तो निश्चित ही भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है। हमने समझौता एक्सप्रेस बम धमाकों में गोडसे की पद्धतियों की प्रतिध्वनि सुनी थी जबकि अभियुक्त, जो भारत की सैन्य परम्पराओं की अपनी ही समझदारी से प्रेरित होकर ट्रेन से यात्रा कर रहे पाकिस्तानी नागरिकों को बम विस्फोट से मारने के उद्यम में जुटे।

इनकी ही तरह गोडसे भी कोई कम भटका हुआ अतिवादी नहीं था ; जिसकी खुल्लमखुल्ला हिमायत एक तरह से आने वाले दिनों में दक्षिणपंथी राजनीति किस किस्म की शक्ल ग्रहण करने जा रही है उसका संकेत अवश्य देती है। अगर सरल तरीके से देखें तो गोडसे ने एक बूढ़े आदमी की दिनदहाड़े हत्या की और इस मुल्क को उसका किसी भी तरह महिमामंडन नहीं करना चाहिए।

मी नाथूराम गोडसे बोलताय का एक दृश्य।

निश्चित ही वह इतना जानते हैं कि वह इस हक़ीकत को बदल नहीं सकते हैं कि महात्मा गांधी की हत्या आजाद भारत की सबसे पहली आतंकी कार्रवाई थी।

अब चूंकि वह इस इतिहास को मिटा नहीं सकते तो इसके लिए वह तरह-तरह की हरकतों में जुटे रहते हैं। प्रदीप दलवी नामक लेखक ने ‘मी नथूराम बोलतोय’ / मैं नथूराम बोल रहा हूं/ लिखा नाटक भी शातिराना ढंग से गोडसे के मानवद्रोही कारनामे को वैधता प्रदान करता दिखता है। बेहद चालाकी के साथ नाटक में सवर्ण हिन्दू मिथकों का प्रयोग किया गया है: अगर राम रावण को मार सकता था और कृष्ण कंस की हत्या कर सकता था तो फिर क्यों गोडसे को गांधी को नहीं मारना चाहिए था। मराठी के विद्वान फडके ने इस नाटक का विश्लेषण करते हुए बाकायदा एक लेखमाला लिखी थी जिसका शीर्षक था ‘नथूरामायण’ जिसमें इन तमाम बातों को विस्तार से लिखा गया था। इसे आप हिन्दुत्ववादी विचारों की गहरी पैठ कह सकते हैं। मगर मराठी में गांधी हत्या को ‘गांधी वध’ कहने वालों की तादाद काफी अधिक है। / मालूम हो कि वध गलत व्यक्ति का किया जाता है, कंस की हत्या नहीं बल्कि कंस का वध अधिक प्रचलित है।/

इसमें एक अन्य तरीका है अपने लिए अनुकूल एक सैनिटाइज्ड/साफसुथराकृत गांधी गढ़ना जिसे वह अपने एजेण्डे का वाहक दिखा सकें। दरअसल गांधीजी के नाम की इस कदर लोकप्रियता रही है कि इन जमातों के लिए आधिकारिक तौर पर उससे दूरी बनाए रखना लम्बे समय तक मुमकिन नहीं रहा है, लिहाजा उन्होंने उनके नाम को अपने प्रातःस्मरणीयों में शामिल किया, अलबत्ता वह इस नाम से तौबा करने या उसके न्यूनीकरण करने की कोशिश में लगातार मुब्तिला रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल की दो घटनाओं पर रौशनी डालना इस सन्दर्भ में समीचीन होगा। उदाहरण के तौर पर उन दिनों गांधी जयंति पर सरकार की तरफ से एक विज्ञापन छपा था, जिसमें गांधी के नाम से एक वक्तव्य उदृधत किया गया था, जो तथ्यतः गलत था अर्थात गांधीजी द्वारा दिया नहीं गया था और दूसरे वह हिन्दुत्व की असमावेशी विचारधारा एवं नफरत पर टिकी कार्रवाइयों को औचित्य प्रदान करता दिखता था। जब उस वक्तव्य पर हंगामा मचा तब सरकार की तरफ से एक कमजोर सी सफाई दी गयी थी।

गांधीजी की रचनाओं के ‘पुनर्सम्पादन’ की उनकी कोशिश भी उन्हीं दिनों उजागर हुई थी, जिसके बेपर्दा होने पर तत्कालीन सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे। इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली जैसी स्थापित पत्रिका में गांधी विचारों के जानकार विद्वान त्रिदिप सुहरूद ने इसे लेकर एक लम्बा लेख भी लिखा था। जिसमें उन्होंने तथ्यों के साथ यह बात प्रमाणित की थी कि ‘महात्मा गांधी की संकलित रचनाओं के पुनर्सम्पादन की यह कवायद अपारदर्शी और दोषपूर्ण है और एक ऐसी अकार्यक्षमता और बेरूखी का प्रदर्शन करती है जिसके चलते संशोधित प्रकाशन को स्टैंडर्ड सन्दर्भ ग्रंथ नहीं माना जा सकेगा। इस नए संस्करण को खारिज किया जाना चाहिए और मूल संकलित रचनाओं को गांधी की रचनाओं एवं वक्तव्यों के एकमात्र और सबसे आधिकारिक संस्करण के तौर पर बहाल किया जाना चाहिए।’

गांधी से नफरत या गांधी से डर

..जो शख्स तुम से पहले यहां तख़्त नशीं था….

उसको भी खुदा होने पे इतना ही यकीं था

– हबीब जालिब

30 जनवरी 2019 को हिन्दू महासभा से जुड़ी पूजा शुक्ला एवं उसके सहयोगियों ने गांधी के पुतले पर गोलियां दाग कर उनकी उस ‘मौत को नए सिरे से अभिनीत किया।’ वह प्रसंग हम सभी के सामने रहा है जिसमें ‘महात्मा’ गोडसे के नाम से नारे भी लगे थे और उसकी मूर्ति पर माला भी चढ़ायी गयी थी। हिंसा के इस महिमामंडन को अधिक ‘लाइव’ बनाने के लिए इन लोगों ने बाकायदा स्याही के गुब्बारे भी पुतले के पीछे लगाए थे ताकि नकली गोलियां चलने पर पुतले से खून भी बहता दिखे। इसका वीडियो बना कर उसे काफी शेयर भी किया गया।

गांधी के पुतले को गोली मारती पूजा शुक्ला।

इस घटना की व्यापक भर्त्सना हुई, तेरह लोगों के खिलाफ मुकदमे भी दर्ज हुए। कुछ गिरफ्तार भी हुए। कुछ स्वास्थ्य का हवाला देकर जमानत पर छूट भी गए, जिन्होंने अपने ‘‘क्रांतिकारी’’ काम का बखान करते हुए पत्रकारों को साक्षात्कार भी दिए। तमाम लोगों ने इस घटना पर लिखा है। गांधी की इस ‘नकली’ हत्या को एक तरह से ‘न्यू इंडिया’ की झलक के तौर पर देखा गया, जहां आधुनिक भारत के निर्माताओं में शुमार की जाती रही शख्सियतों – गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद या अम्बेडकर आदि – के स्थान पर तरह-तरह की विवादास्पद शख्सियतों को प्रोजेक्ट करने की कवायद तेज हो चली दिखती है। अगर यही सिलसिला चलता रहा तो विश्लेषकों का यह भी कहना था कि वह दिन दूर नहीं जब गोडसे को राष्ट्रीय हीरो के तौर पर पेश किया जाए।

इस पूरे घटनाक्रम पर रोहित कुमार -जो शिक्षाविद हैं और जो पोजिटिव साइकोलोजी तथा साइकोमेटरिक्स में दखल रखते हैं – के आलेख में कुछ नए ढंग से सोचा गया था। उनका प्रश्न था कि उन्होंने गांधी के पुतले पर इसलिए तो गोलियां नहीं चलायीं कि ‘उन्हें लग रहा हो कि गांधी अभी जिन्दा हैं?’

उनका कहना था:

‘यह हिन्दुत्व के चरमोत्कर्ष का वक्त़ है…गांधी को आधिकारिक तौर पर समाहित किया गया है और एक चश्मे तथा झाड़ू तक न्यूनीकृत किया गया है, इसके बावजूद इस व्यक्ति के बारे में जो बहुत पहले मर चुका है, उसके प्रति इस कदर नफरत क्यों?’ ..मुमकिन है वह नफरत के तौर पर दिखती है, मगर वह वास्तव में डर हो?’

फिर बिहेविरियल साइकोलोजिस्ट अर्थात स्वभावसंबंधी मनोविज्ञानियों के हवाले से वह बताते हैं कि नफरत और डर एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। एक दूसरे का अनुगमन करता है, पीछे-पीछे आता है, जैसे दिन के बाद रात आती है।

‘सत्य और अहिंसा, जैसा कि हम जानते हैं, वह ‘हथियार’ थे जिसके बलबूते महात्मा ने अपने ‘युद्ध’ को लड़ा था। क्या यह मुमकिन है कि विगत पांच वर्षों मे, हर बार जब हिन्दुत्ववादी संगठनों ने इन दो ताकतवर ‘हथियारों’ को प्रयोग में देखा हो, उन्हें गांधी का भूत नज़र आया हो?’

फिर लेखक पूछता है कि जब 55,000 किसान अपनी मांगों के लिए पैदल मार्च करके मुंबई पहुंचे, हजारों लोग देश के तमाम शहरों में जुनैद नामक एक छोटे बच्चे की हत्या के खिलाफ – जिसे वह जानते तक नहीं थे – इकट्ठा हुए थे, ऐसी तमाम घटनाओं पर उन्हें क्या गांधी की मौजूदगी नज़र आयी थी? या जब यशपाल सक्सेना ने उनकी एकमात्र संतान अंकित सक्सेना की उसकी मुस्लिम प्रेमिका के परिवार द्वारा की गयी हत्या के बाद घटना को साम्प्रदायिक रंग देने से इन्कार किया था, तब क्या उन्हें वहां गांधी नज़र आया था।

‘क्या हर बार जब उनकी साम्प्रदायिक कारगुजारियां नाकामयाब होती हैं, तब हिन्दुत्ववादियों की गांधी के भूत से मुलाकात होती है ? हिन्दू महासभा गांधी की प्रतिमा पर जितनी भी गोलियां चलवा दे, मगर वह उनके शब्दों के सत्य से जूझ नहीं सकती।

‘‘जब भी मैं निराश होता हूं, मुझे याद आता है कि समूचा इतिहास यही बताता है कि हमेशा सत्य और प्रेम का तरीका ही जीता है। तानाशाह और हत्यारे रहे हैं, और कुछ वक्त़ तक, वह अजेय भी दिखते रहे हैं, मगर अन्त में वह शिकस्त पाए हैं। इसके बारे में हमें सोचना चाहिए – हमेशा।’’

….समाप्त

(“गांधी स्मृति श्रृंखला” के तहत दी जा रही यह दूसरी कड़ी लेखक सुभाष गाताडे की किताब “गांधी स्मृति-कितनी दूर, कितनी पास” से ली गयी है।)

This post was last modified on October 7, 2019 9:48 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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