Tuesday, February 7, 2023

यूपी में बीजेपी की जीत के धार्मिक समीकरण का क्या है काउंटर

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उत्तर प्रदेश के 2022 के विधान सभा चुनावों में भाजपा को 255 सीटें और 41.3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। 2017 की तुलना में सीटों की संख्या की दृष्टि से देखें तो भाजपा को 57 सीटों का नुकसान हुआ है। मत प्रतिशत की दृष्टि से देखें तो तो उसे 1.63 प्रतिशत का फायदा हुआ है, 2017 के विधान सभा चुनाव में उसे 39.67 प्रतिशत प्राप्त हुए थे। 1.63 प्रतिशत अधिक मत प्राप्त करने के बाद भी 57 सीटों का नुकसान सहज में समझ में आता है। 2017 के विधान सभा चुनाव में भाजपा विरोधी मत करीब सपा और बसपा के बीच आधे-आधे बंट गए थे। बसपा को 22.23 प्रतिशत और सपा को 21.82 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे।

इस बार भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण सपा की तरफ हुआ और उसे कुल 32.1 प्रतिशत मत प्राप्त हुए यानि उसके मतों में करीब 10.28 प्रतिशत का इजाफा हुआ और बसपा का मत प्रतिशत घटकर 12.9 प्रतिशत हो गया यानि करीब 9.33 प्रतिशत की गिरावट। मत प्रतिशत में 10.28 प्रतिशत की वृद्धि के चलते सपा को 64 सीटों का फायदा हुआ और बसपा के मतों में 9.33 प्रतिशत गिरावट के चलते उसे 18 सीटों का नुकसान हुआ। 2017 में बसपा को 19 सीटें मिली थीं। इस बार 1 सीट मिली है। जबकि सपा को 47 सीटें मिली थीं और उसे 111 सीटें मिली हैं। हम सभी जानते हैं कि वोट प्रतिशत सीटों की संख्या में रूपांतरित होता है, लेकिन इसका रूपान्तरण का गणित सीधा नहीं होता।

उत्तर प्रदेश हिंदू धर्म के धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्रों, वर्ण-जाति व्यवस्था के मुकम्मल रूप की उपस्थिति के चलते और अपने इतिहास के चलते हिंदू आर्यावर्त, हिंदी पट्टी और गाय पट्टी का हृदय स्थल है। सहज ही वर्तमान और भावी हिंदू राष्ट्र का भी यही हृदय स्थल हो जाता है। इतिहास का संयोग है कि हिंदू और हिंदू राष्ट्र के प्रत्यक्ष तौर पर घोषित ‘दुश्मन’ (मुसलमान) भी यहां बड़ी संख्या में हैं। उनका उत्तर प्रदेश की आबादी में अनुपात 20.26 प्रतिशत है। यह अकारण नहीं है कि भाजपा की जीत का पहला बुनियादी आधार रामजन्मभूमि आंदोलन का भी यह केंद्र था।

प्रश्न यह है कि 2022 के विधान सभा चुनावों में भाजपा की जीत धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक समीकरण क्या है? उत्तर प्रदेश में भाजपा जीत की इस बार भी रीढ़ मुसलमानों के प्रति हिंदुओं के बीच बोयी और पल्लवित-पुष्पित की गई घृणा ही रही है। दुख:द है, लेकिन यह तथ्य है कि इस घृणा का विस्तार बहुसंख्यक हिंदुओं तक हो गया है। इस घृणा ने हिंदू कहे जाने वाले  सामाजिक समूहों अपरकॉस्ट, पिछड़ों और दलितों तीनों को अपने आगोश में लिया है। यह सच है कि यह घृणा सबसे अधिक अपरकॉस्ट में और वही इसकी अगुवाई करता है, लेकिन पिछड़ों में भी यह गहरे तक धंसा हुआ है और दलित भी इससे अछूते नहीं रह गए हैं। आंकड़ों का सरलीकरण करते हुए कोई कह सकता है कि भाजपा को सिर्फ 41.3 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया, सिर्फ वही लोग मुसलमानों के प्रति घृणा से प्रेरित हैं, जिन लोगों ने सपा (32.1 प्रतिशत) को वोट दिया और बसपा (12.9) को वोट दिया है, वे लोग आरएसएस-भाजपा द्वारा मुसलमानों के खिलाफ फैलाई गई घृणा के शिकार नहीं, काश ऐसा सच होता। लेकिन ऐसा कहना सच से मुंह मोड़ना होगा।

सपा और बसपा को वोट देने वालों में भी एक बड़ा हिस्सा (मुसलमानों को छोड़कर) आरएसएस-भाजपा की सांप्रदायिक घृणा के प्रचार का शिकार है, भले विभिन्न कारणों से उसने सपा-बसपा या कांग्रेस को वोट दिया हो। अकारण नहीं है कि आज उत्तर प्रदेश में कोई भी पार्टी (सपा, बसपा या कांग्रेस) खुले तौर पर मुसलमानों के पक्ष में खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पा रही है और इन पार्टियों ने नरम हिंदुत्व का रास्ता अख्तियार कर लिया है। इसी नरम हिंदुत्व का एक रूप आम आदमी पार्टी ने पिछले विधान सभा चुनाव में दिल्ली में प्रस्ततु किया था। इस बार के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में योगी मार्का और मोदी मार्का हिंदुत्व के घृणा की राजनीति के योग का भाजपा की जीत में निर्णायक भूमिका रही है।

भाजपा की इस हिंदुत्ववादी राजनीति के काट के संदर्भ में मुख्यत: तीन राय सामने आती है। पहली तो यह कि अधिकांश विपक्षी पार्टियों की तरह नरम हिंदुत्व को अपना लिया जाए और इस आधार पर भाजपा को पराजित किया जाए। दूसरा भाजपा के हिंदुत्व के मुद्दे पर कुछ बोलने की जगह पर अन्य मुद्दों के आधार पर चुनाव लड़ा जाए और उसे पराजित किया जाए। तीसरा भाजपा के हिंदुत्व की विचारधारा का सीधा मुकाबला किया जाए और उसे पूरी तरह खारिज किया जाए।

लेकिन आरएसएस-भाजपा की हिंदुत्व की विचारधारा को तभी निर्णायक चुनौती दी जा सकती है जब डॉ. आंबेडकर के इस सूत्र को स्वीकार किया जाए कि हिंदूवादी विचारधारा का प्राण तत्व वर्ण-जाति व्यवस्था है और जो सजातीय विवाह यानि जातिवादी पितृसत्ता पर टिका हुआ है। सच यह है कि मुस्लिम विरोध हिंदुत्व का बाहरी आवरण है, जिसके आधार पर हिंदुओं के बीच वर्ण-जातिवादी, पितृसत्तात्मक और वर्गीय विभाजन को ढका जाता है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आरएसएस-कार्पोरेट गठजोड़ के बाद अब हिंदूवादी विचारधारा वर्गीय विभाजन को ढकने का भी सबसे बड़ा आधार बन गई है। यानी आरएसएस-भाजपा के हिंदुत्ववादी विचाधारा को चुनौती देने का मतलब है, उसके वर्ण-जातिवादी, पितृसत्तात्मक और वर्गीय  रूप को उजागर करना और उसे चुनौती देना।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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