Sunday, May 22, 2022

हिंदी पट्टी कैसे हुई गोबर पट्टी में तब्दील?

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5 दिन पहले फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित बाथ विश्वविद्यालय के संतोष मेहरोत्रा का यह लेख, अंग्रेजी हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सभी प्रमुख टेलीविजन चैनलों ने कहीं न कहीं इस विषय पर प्रोफेसर मेहरोत्रा के गहन आर्थिक विश्लेषण को स्थान दिया है। सवाल उठता है कि हिंदी भाषी समाज में उसके ही बारे में इतनी महत्वपूर्ण जानकारी का सर्वथा अभाव बना हुआ है। हिंदी के अख़बार और समाचार चैनल ‘अँधेरा कायम रहे’ की तर्ज पर बदस्तूर अपना काम किये जा रहे हैं।

जनचौक की यह टीम पिछले 4 वर्षों से इस मिथक को तोड़ने में लगी हुई है। उसका विश्वास है कि देश दुनिया में जो सबसे बेहतर सूचना है उसे हिंदी भाषी प्रदेश की जनता को सबसे प्रमुखता से सामने लाना सर्वाधिक महत्व का विषय है। देश के सामने जो अँधेरा घना है, उसमें रौशनी के लिए सबसे जरूरी है कि हिंदी पट्टी को वे सारी जानकारियाँ उपलब्ध हों, जो अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं में सहज उपलब्ध हैं।

पेश है उत्तर प्रदेश पर एक बेहद सारगर्भित आर्थिक लेख का हिंदी अनुवाद:

विकास और नौकरियों पर कुठाराघात

राज्य को जल्द से जल्द श्रम-प्रधान विनिर्माण क्षेत्र के लिए एक रणनीति की सख्त जरूरत है; मवेशियों के व्यापार पर हुए हमलों ने कभी फलते-फूलते चमड़ा उद्योग को पूरी तरह से चौपट कर दिया है।

चार दशकों के बाद 1993-94 में, जबकि भारत की गरीबी दर 45.3% थी, यूपी में यह दर 48.4%, तमिलनाडु में 44.6%, और पश्चिम बंगाल में 39.4% थी।

1955 में, (एनएसएस 1955)  के मुताबिक उत्तर प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे रह रही आबादी का हिस्सा 64% था, जो कि तब के मद्रास स्टेट (आज के तमिलनाडु) के 73.6%, या पश्चिम बंगाल के 53.6% से बहुत अलग नहीं था। इसके चार दशक बाद 1993-94 में, भारत की गरीबी दर जहाँ 45.3% थी, यूपी में यह दर 48.4%, तमिलनाडु में 44.6%, और पश्चिम बंगाल में 39.4% थी।

लेकिन इन राज्यों के आर्थिक भाग्य में असली फर्क सुधारों की शुरुआत के बाद दिखना शुरू हुआ। उत्तरी/पूर्वी राज्यों की तुलना में दक्षिणी/पश्चिमी राज्यों के बीच सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में काफी अंतर होता चला गया।

1993 से लेकर 2000 के बीच में, भारत में 5.6% प्रति वर्ष की रफ्तार से वृद्धि हुई, लेकिन यूपी में यह वृद्धि महज 3.7% प्रति वर्ष के रफ्तार से हो रही थी; वहीं इस बात को ध्यान में रखना होगा कि तमिलनाडु 6.5%, गुजरात 9.4% की रफ्तार से बढ़ रहा था (नरेंद्र मोदी के राज्य में मुख्यमंत्री बनने से काफी पहले की बात है)। वहीं 2001-2010 के बीच में भारत 7.2% प्रतिवर्ष की रफ्तार से वृद्धि कर रहा था, लेकिन यूपी में यह बढ़ोत्तरी 5.2% की दर से हो रही थी। तमिलनाडु 7.4% और गुजरात 8.6% प्रतिवर्ष की रफ्तार से आगे बढ़ रह थे। वहीँ यदि 2010-18 के आंकड़ों को देखें तो भारत में वृद्धि दर 7.1% थी, जबकि यूपी (6.7%) की तुलना में अन्य राज्यों की वृद्धि दर कहीं अधिक बनी हुई थी: तमिलनाडु में यह 7.3% और गुजरात में 7.8% थी। वास्तव में देखें तो दक्षिणी/पश्चिमी राज्यों ने उत्तरी राज्यों से प्रति व्यक्ति आय के मामले में अच्छी खासी बढ़त हासिल कर ली है।

आज के दिन यूपी की प्रति व्यक्ति आय भारत के औसत आय से आधी हो चुकी है। इसका अपरिहार्य प्रभाव गरीबी पर पड़ना था। 1993 में जहाँ देश भर में 45.2% से गिरकर 2012 में 21.9% रह गई थी, यूपी में यह 48.4% से घटकर 29.4% हो गई थी। किंतु तमिलनाडु में यह 45% से गिरकर 29% से 11% रह गया। भारत में ओडिशा और पश्चिम बंगाल के साथ हिंदी पट्टी राज्य ही वे स्थान हैं जहाँ सबसे अधिक गरीबी केंद्रित है। हमारे अपने अनुमान के मुताबिक 2019-20 में भारत में गरीबी की दर अभी भी 2012 के 21% वाले स्तर पर बनी हुई है, व्यावहारिक तौर पर इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है, हालाँकि गरीबों की कुल संख्या में वृद्धि हुई है।

 अखिलेश यादव सरकार (2012-2017)  के कार्यकाल में 6.92% प्रति वर्ष की वृद्धि दर देखने को मिली थी, जबकि योगी आदित्यनाथ के तहत यदि कोविड वर्ष 2020-21 को निकाल दें तो वृद्धि दर 4.88% थी —जो कि दो प्रतिशत अंकों से भी कम थी। इसका अर्थ यह हुआ कि मौजूदा शासन में विकास का रिकॉर्ड पिछले तीन दशकों में सबसे खराब रहा है। 

यदि हम वित्तीय वर्ष 2020-21 को छोड़ दें, तो वर्तमान सरकार के शासनकाल में प्रति व्यक्ति आय में महज 9.23% की वृद्धि हुई है। इसकी तुलना में पिछली सरकार के दौरान यह आंकड़ा 27.6% था।

भारत में संरचनात्मक बदलाव रुक गया है। 2012 से 2019 के बीच में विनिर्माण क्षेत्र में 30 लाख रोजगार कम हुए हैं। यूपी में मौजूदा शासन के तहत विनिर्माण क्षेत्र में 3.34% की नकारात्मक वृद्धि देखने को मिली है, जबकि पिछले शासन के दौरान यह वृद्धि 14.64 % थी। इस विकास में मंदी की अभिव्यक्ति बेरोजगारी में दिखाई देती है।

विमुद्रीकरण के बाद पूरे भारत में वृद्धि में मंदी और बेहद खराब तरीके से नियोजित जीएसटी के चलते, यूपी की अर्थव्यवस्था और रोजगार को भी भारी नुकसान हुआ है। जिस तरह से देश भर में और यूपी में नौजवान बेहतर शिक्षित हो रहे थे, उसी रफ्तार में विकास और रोजगार सृजन धीमा होता चला गया। 2017-18 में भारत में बेरोजगारी की दर 45 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई थी। इसके चलते यूपी का प्रदर्शन और भी बदतर होता चला गया।

यूपी में युवा बेरोजगारी का स्तर भयावह स्तर पर पहुँच गया है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि माध्यमिक स्तर की शिक्षा पाने वाले लोगों के लिए बेरोजागारी तीन गुना हो चुकी है; उच्च माध्यमिक शिक्षित के लिए यह चौगुना हो गया है। स्नातकों के लिए यह 21% से बढ़कर 51% हो चुकी है। जबकि तकनीकी डिप्लोमा/सर्टिफिकेट वालों के मामले में यह 13% से बढ़कर 66% और टेक्निकल ग्रेजुएट के लिए बेरोजगारी दर 19% से बढ़कर 46% हो चुकी है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने सालाना 2 करोड़ नई नौकरियों का वादा किया था। जब इस वायदे के बारे में 2019 की शुरुआत में सवाल किया गया (जब सरकार ने 2017-18 में बेरोजगारी पर एनएसओ के आंकड़ों को जारी करने से रोक दिया था)- जब बेरोजगारी की दर पहले से ही 45 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुँच चुकी थी- पीएम के जवाब विलंबित करने वाले और दिशा को मोड़ देने वाले थे। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि ईपीएफओ में नामांकन बढ़ा है। ईपीएफओ आधारित पेरोल आंकड़े में एक बड़ी बाधा यह है कि इसमें मौजूदा ग्राहकों (या योगदानकर्ताओं) के आंकड़े अनुपस्थित रहते हैं। कर्मचारी नौकरी ज्वाइन करते हैं, फिर छोड़ देते हैं, फिर से ज्वाइन कर लेते हैं या किसी अन्य नौकरी में चले जाते हैं। यह प्राथमिक कारक है जिसके चलते इसमें बड़ी संख्या में लगातार संशोधन होते रहते हैं। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे सरकार यह दावा कर सके कि ये पिछली नौकरियों से अतिरिक्त हैं; यहाँ तक कि यह औपचारिक क्षेत्र में नौकरियों में बढ़ोत्तरी तक का दावा नहीं कर सकती है, क्योंकि शुद्ध वार्षिक वृद्धि को अनुमानित करना असंभव हो गया है।

प्रधानमंत्री ने रोजगार पैदा करने वाले व्यक्तियों के लिए मुद्रा लोन दिए जाने की बात भी कही है। छोटे कर्जदारों को कर्ज दिए जाने के लिए सरकार ने बैंकों के मुद्रा लोन दिए जाने पर भरोसा किया है। 2018 में, जब अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया तो मुद्रा को रोजगार-सृजन योजना के तौर पर प्रचारित किया गया। प्रधानमंत्री ने संसद में कहा, “हमने मुद्रा के जरिये 13 करोड़ नौजवानों को ऋण दिए।” हालाँकि, इनमें से 90% ऋण शिशु श्रेणी (50,000 रूपये से कम राशि) के तहत जारी किये गये थे, इसलिए वे शायद ही कई नौकरियां सृजित कर पाए।

सच्चाई का खुलासा पीएलऍफ़एस के आंकड़े से चलता है। इन ऋणों को स्पष्ट रूप से स्वरोजगार करने वाले लोगों को दिया गया है, वैसे भी स्वरोजगार अनौपचारिक रोजगार का एक कमजोर स्वरुप है। 2012 से 2019 के बीच में यूपी में श्रमिक-भागीदारी की दर 54% से गिरकर 46.4% हो गई थी। इसमें स्वरोजगार से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं की हिस्सेदारी में मुश्किल से ही कोई फर्क आया, जो स्वरोजगार में थीं जिनकी हिस्सेदारी 80.5% से 81% हो गई थी; जबकि शहरी स्वरोजगार से सम्बद्ध महिलाओं की हिस्सेदारी 66.7% से घटकर 41% रह गई थी। दूसरे शब्दों में कहें तो कुल मिलाकर, स्वरोजगार की संख्या में गिरावट देखने को मिली है। इसलिए, कहा जा सकता है कि मुद्रा योजना नए रोजगार के सृजन में उपयोगी साबित नहीं हो पाई।

2016-17 में मुद्रा ऋण के लिए एडवांस में 4.35% से, वित्तीय वर्ष 2019 में डूब ऋण बढ़कर 9.3% हो गया था, क्योंकि राजनीतिक दलों ने अपने समर्थकों के लिए मुद्रा ऋणों को मुहैय्या कराने के लिए शिविर आयोजित करने शुरू कर दिए थे। 2019-20 में यूपी अनुमोदनों के मामले में दूसरा सबसे बड़ा राज्य था, जबकि गुजरात की तुलना में बिहार काफी आगे था और महाराष्ट्र के साथ कड़ी टक्कर में था!

2021 से 2026 के बीच में 15-59 आयु वर्ग के लोगों की संख्या में प्रति वर्ष 20 लाख का इजाफा होने की उम्मीद है; जबकि यूपी के पास सभी राज्यों में सबसे अधिक युवा आबादी है। राज्य को आज जिस चीज की सबसे सख्त जरूरत है वह है श्रम-प्रधान विनिर्माण की रणनीति की। इसके लिए सिर्फ दो उदहारण ही काफी हैं।

पहला है, यूपी कुल मांस निर्यात राजस्व में 64% से अधिक का योगदान करता है और भैंस के मांस का प्रमुख निर्यातक राज्य है, जिसके बाद पंजाब और महाराष्ट्र का स्थान है, जहाँ से 70 देशों को निर्यात किया जाता है। यूपी में भारत के लगभग आधे बूचड़ खाने-सह-मांस प्रसंस्करण निर्यात ईकाइयाँ भी हैं। इसलिए यूपी के लिए मांस निर्यात के क्षेत्र में अग्रणी बने रहना स्वाभाविक है। 2016-2017 में, भैंस के मांस का निर्यात 26,161.49 करोड़ रूपये आँका गया था, लेकिन 2018-2019 में यह घटकर 25,168.31 करोड़ रूपये और 2019-20 में 22,668.47 करोड़ रूपये रह गया था।

दूसरा, यूपी के लिए विशेषकर आगरा और कानपुर के लिए चमड़ा एक प्रमुख उद्योग था; लेकिन गाय के व्यापार और परिवहन पर हमलों ने दोनों शहरों में उद्योगों का खात्मा कर दिया है, जिसके कारण राज्य के दो सबसे गरीब समूहों- अनुसूचित जातियों और मुसलमानों के बीच से लाखों नौकरियां चली गई हैं। इसने एक संपन्न पशु अर्थव्यवस्था को भी नष्ट कर दिया है और सारे उत्तर प्रदेश में किसानों को आवारा मवेशियों की समस्या के साथ उनके हाल पर छोड़ दिया है।

(लेखक बाथ विश्वविद्यालय, यूके में सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। लेख का हिंदी अनुवाद टिप्पणीकार और अनुवादक रविंद्र सिंह पटवाल ने किया है।)

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