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Categories: बीच बहस

आत्मनियमन के ढोंगियों ने ऐसे रोका मीडिया में बदलाव

बात पुरानी हो चुकी है, मगर अभी भी प्रासंगिक है और इस पर चर्चा करना बहुत ज़रूरी है। ज़रूरी इसलिए है कि बहुत से लोग या तो खुशफ़हमी में हैं या फिर वे जान-बूझकर यथास्थिति को बरक़रार रखना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि टीआरपी के प्रकोप को आत्म नियमन से रोका जा सकता है, नियंत्रित किया जा सकता है। अब ये लोग कुछ नए उपायों की बात करने लगे हैं। इससे भ्रम फैल रहा है कि किसी नियामक की ज़रूरत नहीं है और मीडिया, ख़ास तौर पर न्यूज़ चैनल खुद को सुधारने में सक्षम हैं, बस कुछ छोटे-मोटे उपाय कर दिए जाएं।

ये वही लोग हैं जो पहले दावे करते थे कि न्यूज़ चैनलों में कोई बहुत ज़्यादा समस्या नहीं है और जैसे-जैसे वे शैशव से वयस्क अवस्था में पहुँचेंगे, ज़िम्मेदार होते जाएंगे। या तो उन्हें पता नहीं था कि ये बच्चे कुपोषण और ग़लत पैरेंटिंग के शिकार हो रहे हैं और बड़े होकर वे अपराधी बनेंगे या फिर जान-बूझकर अनजान बने हुए थे।

इनमें से एक बड़ी तादाद उन लोगों की थी जो चैनलों में शीर्ष पदों पर थे और वही सब कर रहे थे जिसको रोकने की माँग चारों तरफ से उठ रही थी। कोई बिना ड्राइवर की कार चला रहा था, कोई कुंजीलाल को दिखा रहा था, किसी चैनल को स्वर्ग की सीढ़ियाँ मिल गई थीं, कोई नाग-नागिन की शादी करवा रहा था, कोई दूसरे ग्रह के वासियों को खोज ला रहा था तो किसी चैनल पर कोई पानी पर चलने का चमत्कार दिखा रहा था। किसी ने अपराधों की ड्रामाई प्रस्तुति का फार्मूला खोज लिया था तो कोई ज्योतिषियों से दर्शकों को भरमा रहा था। और निर्मल बाबा तो सभी चैनलों पर कृपा बरसा रहे थे। अगर ‘न्यूज़ एक्सप्रेस’ ने मोर्चा न खोला होता तो उनकी कृपा से चैनलों को टीआरपी और धन दोनों मिलते रहते।

यानी वे एक तरह का पाखंड कर रहे थे। संभव है कि ये पाखंड बेबसी के कारण पैदा हुआ हो, क्योंकि वे भले ही कंटेंट में सुधार चाहते हों, मगर उनकी मार्केटिंग टीम और मालिक टीआरपी चाहते थे, इसलिए फार्मूलेबाज़ी पर टिका रहना उनके अपने वजूद के लिए ज़रूरी बन चुका था। उन्हें मोटी तनख्वाह वाली अपनी नौकरी प्यारी थी इसलिए वे बाहर कुछ और बोलते थे और न्यूज़रूम में उनका व्यवहार कुछ और होता था।

ये सच्चाई है कि जब न्यूज़ चैनलों के बीच गला काट प्रतिस्पर्धा शुरू हुई और टीआरपी ने अपना जलवा दिखाना शुरू किया तो मीडिया में हाहाकार मच गया। इस हाहाकार को सब सुन रहे थे और सबको दिख रहा था कि टीवी न्यूज़ कहाँ जा रही है। मगर सब लीपा-पोती में लगे रहे। वे सरकारी हस्तक्षेप का हौआ तो खड़ा करते थे मगर खुद कोई कारगर पहल नहीं करते थे।

वास्तव में आत्म नियमन भी एक तरह से बदलाव की माँग को दबाने या उससे ध्यान बँटाने का अस्त्र बन गया था। उस समय न्यूज़ चैनलों के शीर्ष पदों पर बैठे लोग हर शुक्रवार को आने वाली टीआरपी से आतंकित तो रहते थे और उनमें से कुछ को ये ग्लानि भी होती होगी कि पत्रकारिता छोड़कर भाँडगीरी करनी पड़ रही है, मगर प्रभावी संपादक की छद्म छवि को बचाए रखने के लिए और ये भी दिखाने के लिए वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सच्चे प्रहरी हैं, आत्म नियमन का मोर्चा खोल रखा था। वे भली-भाँति समझ रहे थे कि कोई चैनल आत्म नियमन को मानने के लिए तैयार नहीं है और कंटेंट दिनोंदिन गटर में जा रहा है मगर कोई जोखिम भरी पहल करने से घबराते थे।

आत्म नियमन के भ्रम को बनाए रखने में पत्रकारों और न्यूज़ चैनलों के संपादकों के संगठनों की बड़ी भूमिका रही है। ख़ास तौर पर ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन और नेशनल ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन की। बीच-बीच में कुछेक एडवाइज़री करके और उनकी आंशिक सफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर ये बताया गया कि बस सब कुछ ठीक होने वाला है। लेकिन इन्हीं के सदस्य विपरीत व्यवहार करने में लगे थे। इनमें वे भ्रष्ट संपादक और प्रसारक भी शामिल थे, जो अपने धत कर्मों की वज़ह से तिहाड़ जेल भी गए।

ऐसा नहीं है कि इन्हें बाज़ार की भूमिका और ताक़त का अनुमान नहीं था। वे सब बखूबी जानते थे, मगर खुद बाज़ारवाद के हिमायती थे। उन्हें पता था कि अगर चैनलों को विज्ञापनदाताओं की ज़रूरत है तो विज्ञापनदाताओं को टीआरपी की। इसलिए टीआरपी तो बंद नहीं होगी। मगर जब भाषण देते थे तो कहते थे टीआरपी बंद हो जानी चाहिए या तीन अथवा छह महीने में आनी चाहिए क्योंकि हर हफ़्ते आने से पत्रकारों पर प्रेशर पड़ता है। ये लोग कभी स्वामित्व के दोषपूर्ण ढाँचे की बात नही करते थे, उसके निहित स्वार्थों और उसके लिए डाले जाने वाले दबावों की बात नहीं करते थे। करते भी कैसे? जल में रहकर मगरमच्छ से बैर कौन लेता है।

आत्म नियमन के पैरोकार कुछ नए सुझाव देने लगे हैं। इनमें से एक है कि संपादक का कार्यकाल तय हो जाना चाहिए। यानी उसे तीन या पाँच साल के लिए निश्चिंत कर दिया जाना चाहिए ताकि वह किसी दबाव में न आए। ये ऐसा बचकाना सुझाव है कि इस पर हँसने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता। मालिक ऐसे किसी मैनेजर को ही संपादक बना देगा, तब क्या होगा? प्रबंधन के पास ऐसी समस्याओं से निपटने के सौ तरीक़े होते हैं, ये कौन नहीं जानता।

एक स्वतंत्र नियामक की चर्चा बहुत अरसे से चल रही है। मौजूदा परिस्थितियों में अब वही एक रास्ता बचा हुआ है। एक अधिकार संपन्न, समझदार नियामक स्थितियों को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर सकता है, मगर ये कोई निदान नहीं है, क्योंकि वह टीआरपी नामक बीमारी को रोक नहीं सकता। जब तक बाज़ार टीआरपी के ज़रिए कंटेंट को तय करता रहेगा, गुणात्मक बदलाव असंभव है।

फिर दूसरे पक्ष पर तो बात ही नहीं की जा रही है। वह पक्ष है सरकार की ओर से पड़ने वाले दबाव का। न्यूज़ चैनलों की स्थिति केवल टीआरपी ने ही नहीं खराब की है। इसके लिए सरकार भी ज़िम्मेदार है, बल्कि उससे भी ज़्यादा ज़िम्मेदार है। एक निरंकुश सरकार को नाथने वाला कोई नियामक इस देश में फिलहाल बन पाएगा, ऐसा असंभव दिखता है।

(मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं। आप कई न्यूज़ चैनलों के संस्थापक हेड रह चुके हैं।)

This post was last modified on October 12, 2020 1:19 pm

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