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Wednesday, August 4, 2021

विपन्नता के समुद्र में जाहिलियत की नदी बह रही है!

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जाहिलियत और विपन्नता ही अब इस देश की पहचान बन गयी है। और अफगानिस्तान का तालीबानी निजाम हमारा आदर्श है। मौजूदा ‘विश्व गुरू’ की सच्चाई यह है कि अलीगढ़ में एक परिवार को पिछले 10 दिनों से अन्न का एक दाना तक नसीब नहीं हुआ और उसे पानी पी-पी कर रातें गुजारनी पड़ी। और जब एक महिला समेत उसके पांच बच्चे बेहोशी की हालत में पहुंच गए तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। जहां तीन की हालत गंभीर बनी हुई है। यह तो एक संकेत भर है। या फिर कह सकते हैं कि हांड़ी में रखे गए चावल में एक दाना भर है। इससे समझा जा सकता है कि देश में गरीबों को किन हालात से गुजरना पड़ रहा है। गरीबी के ताजा आंकड़े तो और भी भयावह हैं।

बताया जा रहा है कि अभी तक 26 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीवन गुजार रही थी। इस बीच पिछले 20 सालों में इस रेखा से उबर कर आने वाले 28 फीसदी लोग फिर से उसी जमात के हिस्से बन गए हैं। यानी देश की तकरीबन 54 फीसदी से भी ऊपर आबादी गरीबी की रेखा के नीचे चली गयी है। इसका जीवन कैसे चल रहा होगा। क्या इन्हें दो जून की रोटी मिल रही होगी? या फिर इन्हें भी भूखे पेट सोना पड़ रहा है? ये कई सवाल हैं जो किसी भी समझदार और संवेदनशील इंसान के मन-मस्तिष्क में उमड़-घुमड़ रहे हैं। 

पिछले लॉकडाउन के दौरान तो समाज आगे बढ़कर लोगों को थाम लिया था इस बार तो वह भी नहीं हो सका। मध्य वर्ग से लेकर गांव में रहने वालों को अपनी ही जान बचाने के लाले पड़ गए थे। ऐसे में चाहकर भी कोई कुछ नहीं कर सका। ऐसे में देश के अलग-अलग हिस्सों में कितने अलीगढ़ अपने तरीके से पैदा हो गए होंगे इसका अंदाजा भी लगा पाना मुश्किल है। एक सभ्य और लोकतांत्रिक देश के लिए यह तस्वीर न केवल भयावह है बल्कि उतनी ही क्रूर है। एक आधुनिक समाज भला इसको कैसे बर्दाश्त कर सकता है? देश के हजारों बच्चों के भूख से बिलबिलाते हुए मरते देखकर क्या सभ्य समाज का कोई नागरिक भोजन का नेवाला अपने पेट में डाल सकता है?

लेकिन इन हालातों को ठीक करने और उसकी दिशा में व्यवस्था और अपनी नीतियों को ले जाने के बजाए सरकार ने बिल्कुल उल्टा रास्ता अख्तियार कर लिया है। पिछले सत्तर सालों में यह पहली बार हो रहा है जब लोगों से उनका सब कुछ छीना जा रहा है। अभी तक क्या होता था कि आप जहां खड़े हैं उससे आगे जाते थे। आपके पास अगर साइकिल है तो आगे स्कूटर की तमन्ना रखते थे। और वह पूरा भी होता था। फिर आप कार के बारे में सोचना शुरू कर देते थे। उसके बाद मकान और फिर एक-एक कर जीवन की सारी सुविधाएं हासिल करते थे। लेकिन पिछले सात सालों की कहानी लोगों से छीने जाने की कहानी है। पहले नोटबंदी के जरिये इस काम को किया गया। और फिर कभी पेट्रोल के दाम बढ़ा कर तो कभी खाने के तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के जरिए।

रही सही कसर इस कोरोना ने पूरी कर दी। जिसने लोगों को कंगाल बना दिया। और सालों-साल की जमा पूंजी को लोगों ने अपने परिजनों के इलाज में अस्पतालों के हवाले कर दिया। इस दौरान जनता की जो लूट चली है उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी। आंकड़े बताते हैं कि कोरोना काल में 2 करोड़ लोग बेरोजगार हुए हैं। काम धंधा छोड़कर उन्हें अपने घरों को लौटना पड़ा है। ऐसे में उनके सहारे चलने वाले परिवारों की माली हालत की सिर्फ कल्पना की जा सकती है।

कहां तो हम विश्व गुरू बनने चले थे। लेकिन हकीकत यह है कि हमें कीनिया, भूटान, बांग्लादेश और नेपाल से सहायता लेनी पड़ रही है। वह देश जिसकी गणना दुनिया के चंद विकसित देशों के साथ होने लगी थी। उसको पूरी दुनिया ने भिखमंगे के तौर पर देखना शुरू कर दिया है। पिछले 70 सालों में विरासत के तौर पर मिले स्वाभिमान पर जो धक्का लगा है क्या उसकी कोई भरपाई है? हम जब आजाद हुए तो भी 100 से ज्यादा देशों के नेता थे। गुटनिरपेक्ष संगठन इसकी जिंदा नजीर है। और फिर आर्थिक ताकत के लिहाज से दुनिया के शीर्ष 20 देशों में गिनती शुरू हो गयी थी। लेकिन पिछले सात सालों की नीतियों के चलते हम अब पातालवासी हो गए हैं।

विडंबना देखिए जब देश की जनता एक-एक दाने को मोहताज है तब देश के पूंजीपतियों की आय में दिन दूनी और रात चौगुनी के हिसाब से वृद्धि हो रही है। अडानी और अंबानी की संपत्ति में अकूत बढ़ोत्तरी हुई है। अंबानी एशिया के नंबर वन तो अडानी नंबर दो पूंजीपति बन गए हैं। अब कोई बताएगा कि उस दौरान जबकि कोरोना काल में फैक्टरियां बंद थीं और तमाम कामकाज ठप पड़े थे तो यह चमत्कार कैसे हुआ? इसकी तरफ न तो कोई अर्थशास्त्री का ध्यान जा रहा है और न ही मीडिया उसकी छानबीन करने के लिए तैयार है। ऐसा नहीं है कि चीजें दिखती नहीं हैं। या सब कुछ सात पर्दे के पीछे छुपा हुआ है। चार दिन पहले शेयर मार्केट में आयी गिरावट और खासकर अडानी के शेयरों में उतार ने एक इशारा किया है। जिसमें यह बात खुलकर सामने आयी है कि मारीशस के रास्ते विदेशी निवेश वाली तीन कंपनियों ने अडानी की कंपनियों में निवेश किया है।

दिलचस्प बात यह है कि इन कंपनियों का जो पता है वह मारीशस में एक ही है। और हजारों करोड़ रुपये के मालिकाना वाली इन कंपनियों की अपनी एक वेबसाइट तक नहीं है। सेबी ने इनकी संपत्ति को सीज कर दिया है। और वह एक दो हजार करोड़ नहीं बल्कि तकरीबन 44 हजार करोड़ रुपये है। अब समझा जा सकता है कि अभी जबकि सेबी थोड़ी चौकस हुई तो उसे इस कारोबार का एक धागा मिल गया। पूरी रस्सी जो इससे बुनी गयी होगी और जिसके अडानी समेत दूसरे मालिकान हैं वह कितनी बड़ी और कितनी मोटी होगी। इस मामले में भी कुछ हो पाएगा इसको लेकर संदेह है। क्योंकि सत्ता अडानी के साथ है। और दोनों का हित एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। लिहाजा मामले को रफा कर दिया जाएगा। अगर ईमानदार तरीके से जांच हो तो यह मनीलांडरिंग का बहुत बड़ा केस है। और इसमें दोषी लोगों को सालों साल तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ सकता है। लेकिन कहते हैं न कि  सैंइया भये कोतवाल तो कुछ ऐसे ही हालात हैं।

लेकिन जनता की भूख, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वाास्थ्य सरकार के एजेंडे में नहीं है। उसके एजेंडे में है कैसे समाज में सांप्रदायिकता का जहर फैलाया जाए। इसके लिए आरएसएस ने अपने तमाम हाइड्रा रूपी संगठनों को सड़क पर उतार दिया है। शायद ही कोई दिन जाता हो जब कहीं किसी गाय के नाम पर किसी पर हमले न होते हों। या फिर कहीं किसी मुस्लिम को निशाना न बनाया जाता हो। यहां तक कि बुजुर्गों तक को नहीं बख्शा जा रहा है। गाजियाबाद के लोनी में 80 साल के एक बुजुर्ग पर तीन लड़कों ने अपनी मर्दानगी दिखायी और पीटते हुए उसे जयश्रीराम का नारा लगाने के लिए मजबूर किया। संघ संरक्षित गुंडों की करतूतों का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता की दुहाई देने वाली यह जमात कितनी जाहिल हो गयी है यह उसकी जिंदा तस्वीर है। भारतीय समाज में कोई भी बुजुर्ग सभी का बुजुर्ग माना जाता रहा है। और वह दूसरों के बीच भी उतने ही सम्मान का हकदार होता है जिसे वह अपने परिवार के बीच पाता है।

लेकिन यहां संघ पोषित ये गुंडे बुजुर्ग की दाढ़ी नोच रहे हैं। और उसी को अपनी ताकत के तौर पर पेश कर रहे हैं। और विडंबना देखिए कि सत्ता कितनी मजबूती से इन अपराधियों के साथ खड़ी है। बजाय इनको दंडित करने और ऐसी सजा देने के कि किसी दूसरे को ऐसी हरकत करने की हिम्मत न हो। वह खुल कर हमलावरों के साथ खड़ी है। उसका कहना है कि यह मामला किसी भी रूप में सांप्रदायिक नहीं है। दोनों पक्षों के बीच किसी ताबीज को लेकर झगड़ा हुआ था। जो कि निहायत ही निजी था। जबकि बुजुर्ग का कहना है कि किसी ताबीज के धंधे से उनका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन यह तो यूपी की पुलिस है वह कुछ भी साबित कर सकती है। और अब उसने अपनी तोप का मुंह अपराधियों के खिलाफ नहीं बल्कि उन लोगों पर मोड़ दिया है जिन्होंने उसके मुताबिक इसे सांप्रदायिकता के तौर पर पेश किया है। और अब उनके खिलाफ वह कार्रवाई में जुट गयी है।

जिसमें उसने ट्विटर से लेकर अल्ट न्यूज और वायर के साथ कुछ कांग्रेस के अल्पसंख्यक नेताओं और मुस्लिम पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है। उसका कहना है कि जब उसने नई जानकारी दी तो फिर उन्होंने अपने पुराने ट्वीट डिलीट क्यों नहीं किए। अब कोई इनसे पूछे कि पुलिस कब से अदालत हो गयी? और लोग कब से उसके सुनाए निर्णय को मानने के लिए बाध्य हो गए? वह पुलिस जो कट्टा रखकर राह चलते किसी को भी धारा-25 के तहत आरोपी बनाने के लिए जानी जाती है क्या वह मोदी-योगी के रेजीम में हरिश्चंद हो गयी है? सच्चाई यह है कि इस दौरान उसकी वर्दी में दागों की संख्या और बढ़ गयी है। और पुलिस कम संघ के गुर्गे के तौर पर ज्यादा काम करती है।

कुछ मूर्ख इसे धर्मयुद्ध का नाम देते हैं। किसी बुजुर्ग को बेवजह मारना, राह चलते किसी निर्दोष की लिंचिंग और फिर इसका नतीजा अगर विपन्नता और भूख हो तो भला ऐसे धर्म को कौन मानना चाहेगा। ऐसा धर्मयुद्ध जिसमें न्याय-अन्याय का फर्क मिट गया हो। घृणा और नफरत जिसकी जेहनियत हो और वह इंसान से इंसान के बीच की दूरी बढ़ा दे ऐसे धर्म से तो कोई भी तौबा कर लेगा। इन्हें इस बात की समझ नहीं है कि धर्म कोई देश नहीं होता है। न ही धर्म राष्ट्र होता है। बल्कि धर्म का वजूद राष्ट्र के भीतर होता है। और नागरिकों में उसको व्यक्तिगत स्तर पर ही मान्यता प्राप्त है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि जैसे ही उसे सामूहिक रूप दिया जाएगा और देश के ऊपर रख दिया जाएगा इसका मतलब है कि देश में एक स्थाई गृहयुद्ध। और इसमें जो तबाही आएगी वह न केवल धर्म को खत्म कर देगी बल्कि उसके मानने वालों का भी विनाश हो जाएगा।

ऐसे में अगर आप रहेंगे ही नहीं तो किस बात का युद्ध करेंगे। इन्हें नहीं पता कि इस दौर में दुनिया का शायद ही कोई ऐसा मुल्क हो जहां लोकतंत्र हो और वहां कोई धार्मिक सत्ता हो। क्योंकि दोनों एक साथ चल ही नहीं सकते हैं। अगर आप धार्मिक सत्ता चाहते हैं तो लोकतंत्र को खोना होगा और अगर लोकतंत्र चाहते हैं तो धर्म को गौण रखना होगा। संघ इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट है। उसे लोकतंत्र नहीं चाहिए वह एक फासिस्ट थियोक्रेटिक स्टेट चाहता है। देश की पुरानी ब्राह्मणवादी व्यवस्था उसका आदर्श है। और वह एन-केन प्रकारेण उसे लागू करना चाहेगा। जिसमें कोई बराबरी नहीं बल्कि समाज के सीढ़ीदार पदानुक्रम वाली गैरबराबरी की व्यवस्था को फिर से वापस लाना उसका लक्ष्य है। अनायास नहीं वह मनु को अपना आदर्श मानता है। इसलिए यह किसी मुस्लिम से ज्यादा हिंदू तबकों के भीतर की बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ है। लेकिन धर्म की अफीम के नशे में झूम रही देश की बहुसंख्यक जनता इसको समझने के लिए तैयार है भी या नहीं यह सबसे बड़ा सवाल है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

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