Sunday, October 17, 2021

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पंजाब में भूख के वायरस का शिकार मजदूर

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पंजाब सरकार का यह दावा जगह-जगह हांफ रहा है और निहायत झूठा साबित हो रहा है कि कोरोना वायरस के चलते दरपेश हुए गंभीर आर्थिक संकट में किसी भी शख्स को एक पहर भी भूखा नहीं रहने दिया जाएगा। जैसे ही लॉकडाउन और कर्फ्यू लगा, श्री अकाल तख्त साहिब से लेकर राधा स्वामी सत्संग ब्यास तक बेशुमार धार्मिक संस्थाएं और एनजीओ अन्न के भरे-पूरे भंडारों के साथ आगे आए और लंगर की सदियों पुरानी परंपरा कायम रखते हुए हर भूखे तक खाना पहुंचाया। लेकिन पखवाड़े भर पहले राज्य सरकार ने तमाम संस्थाओं द्वारा स्वतंत्र रूप से लंगर वितरण करने पर सख्ती से रोक लगा दी। वजह वाजिब थी।

लंगर वितरित करने वाले कुछ सेवक कोरोना से संक्रमित पाए गए। तथ्य मिले कि उनके जरिए वायरस आगे फैला। लॉकडाउन और कर्फ्यू के बाद जो काम विभिन्न छोटी-बड़ी संस्थाएं कर रही थीं, उसे सरकारी अमले ने अपने हाथों में ले लिया। लेकिन इस मोर्चे पर सरकार सरासर नाकाम साबित हो रही है। सूबे में कोरोना वायरस के साथ-साथ अब भूख का दानव भी बेतहाशा बढ़ रहा है और सरकार के पास इसे रोकने के लिए हाल-फिलहाल कोई ठोस कार्यनीति नहीं है। नतीजतन अभावग्रस्त लोग भूख से बिलबिला रहे हैं। कर्फ्यू और लॉकडाउन की सख्ती के बावजूद सड़कों पर आकर रोष-प्रदर्शन करते हुए रोटी मांग रहे हैं। जो प्रवासी हैं यानी बाहर के प्रदेशों से यहां आए थे, वे इस जिद पर अडिग हैं कि पुलिस-प्रशासन उन्हें पैदल ही सुदूर अपने-अपने प्रदेशों में जाने की इजाजत दे दे।

इसलिए भी कि अब पंजाब में न रोजगार है, न रोटी और न ही कोई उम्मीद! हकीकत है कि स्थानीय और प्रवासी मजदूर तबका पंजाब में भी अब यह मानने लगा है कि कोरोना वायरस से मरें या नहीं लेकिन आलम यही रहा तो भूख से ज़रूर मर जाएंगे। दफन-कफन के लिए पैसे भी नहीं होंगे। सरकारी दावों का खोखलापन कदम-कदम पर उन्हें धोखा दे रहा है। कमजोर श्रमिक अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने डेरों, ठियों-ठिकानों अथवा घरों के बाहर आकर जिस तरह और जिन तेवरों के साथ रोष जाहिर कर रहे हैं, वह एक तरह से समूची व्यवस्था के खिलाफ उनकी असंगठित ‘बगावत’ है। यह इस राज्य में पहली बार हो रहा है। ऐसा पंजाब के एक से दूसरे कोने तक बदस्तूर हो रहा है। हुकूमत को दिखता हो या ना दिखता हो।               

23 अप्रैल, सोमवार की दोपहर जालंधर का मंजर: गदाईपुर के राजा गार्डन में भूख से आजिज लगभग 500 मजदूर सपरिवार सड़कों पर आ गए। महिलाएं हाथों में खाली थालियां लेकर सड़कों पर बैठ गईं और पुरुष ऊंची आवाज में लगातार दोहराते रहे-हमें राशन दो या गांव वापस भेज दो। हम भूखे नहीं मरना चाहते। इनमें से कुछ रो रहे थे। दरअसल राजा गार्डन और गदाईपुर इलाके में 15 हजार से ज्यादा प्रवासी श्रमिक रहते हैं। इनके पास राशन कई दिनों से खत्म है।

इन इलाकों में पहले लंगर चलता था लेकिन प्रशासन ने बंद करवा दिया है। 5 सदस्यों के परिवार का मुखिया मजदूर नीरज महतो कहता है, “अगर यही हालात रहे तो लोग बच्चों के साथ खुदकुशी कर लेंगे क्योंकि कोई भी अपने बच्चों को भूख से तड़पकर मरते हुए नहीं देख सकता।” मौके पर मौजूद कई मजदूरों ने बताया कि कहने को प्रशासन ने जरूरतमंदों के लिए फोन नंबर जारी किए हुए हैं। लेकिन बार-बार के तकाजे के बावजूद कोई सुध नहीं ले रहा।                        

इस इलाके के लगभग एक लाख मजदूर (अब) बंद पड़ी 15 हजार फैक्ट्रियों में काम करते थे। तालाबंदी के बाद ये मजदूर घर बैठे हैं। जमा-पूंजी सारी खत्म हो गई और कर्फ्यू की सख्ती के चलते पलायन भी नहीं कर पा रहे। पंजाब सरकार के जटिल नियमों के कारण निकट भविष्य में फैक्ट्रियों के खुलने के दूर-दूर तक आसार नहीं हैं। फैक्ट्रियों से वेतन मिलने का सवाल ही नहीं और सरकार किसी किस्म की कोई आर्थिक मदद दे नहीं रही। देना तो दूर हुकमरान शायद इस बाबत सोच भी नहीं रहे। 

पहले गैर सरकारी संगठन दिन में दो बार इन बदहाल मजदूरों को पका-पकाया भोजन दे जाते थे, सरकारी आदेशों के बाद यह सिलसिला भी बंद हुआ। सरकारी अधिकारी खुद मानते हैं कि तमाम जरूरतमंदों तक राशन पहुंचाना बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। दावा है कि पुलिस और स्वयंसेवकों के जरिए फिलहाल प्रतिदिन 60 हजार लोगों तक राशन पहुंचाया जा रहा है लेकिन औसत संख्या के हिसाब से देखें तो यह नाकाफी है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि जालंधर में अढ़ाई लाख के करीब-गरीब परिवार हैं जिन्हें नीले कार्ड पर आधारित आटा दाल स्कीम के तहत अनाज पहुंचाया गया है लेकिन इनके अलावा जो फैक्ट्रियों के मजदूर, रेहड़ी वाले और दुकानों इत्यादि पर काम करने वाले श्रमिक आकस्मिक बेरोजगार हुए हैं उनकी मदद सरकारी तौर पर नहीं हो पा रही।

विभिन्न प्रकार के पैकेट बनाकर जो राशन मजदूरों तक पहुंचाया जाता है वह अधिकतम एक हफ्ता चलता है। फौरी स्थिति यह है कि एक पैकेट से पांच-पांच भूखे परिवार गुजारा कर रहे हैं। यानी सरकार की राशन को लेकर सीधी मदद की योजना दम तोड़ रही है। इस इलाके का हर तीसरा मजदूर परिवार स्वैच्छिक पलायन की जिद पकड़े हुए है या फिर खुदकुशी की मानसिकता का शिकार है। अवसादग्रस्त तो खैर हर कोई है ही।

एक छानबीन के मुताबिक गैरप्रवासी यानी स्थानीय पंजाबी मजदूर भी बड़े पैमाने पर इन्हीं हालात से गुजर रहे हैं। भवन निर्माण के काम में दिहाड़ी पर मजदूरी करने वाले बस्ती बावा खेल के नछत्तर सिंह के मुताबिक कर्फ्यू और लॉकडाउन के बाद उसके परिवार को 3 दिन में एक बार खाना नसीब होता है। पहले गुरुद्वारे से आता था लेकिन अब नहीं। नछत्तर का कहना है कि कोरोना वायरस की बजाए भूख से ज्यादा लोग मरेंगे!                                             

लुधियाना के ताजपुर रोड की महावीर कॉलोनी: यहां के विभिन्न क्वार्टरों में बिहार और यूपी के सैकड़ों मजदूरों का बसेरा है जो इनके लिए अब जेल बन गया है, जहां कर्फ्यू और लॉकडाउन के बाद इन्हें नियति अथवा हालात भूख से मरने की सजा दे रहे हैं। कोई इनकी सुध नहीं ले रहा। एक बड़े डेरे में पास की (बंद हो गई) धागा मिल में काम करने वाले 45 मजदूर परिवार रहते हैं। 35 बिहार के हैं और 10 यूपी के। चार दिन पहले तक बेरोजगार ये मजदूर बीते 20 दिन से खीरे और मूली खा कर जैसे-तैसे अपनी भूख-अग्नि बुझा रहे थे।

इनमें से एक मजदूर सोनू ने दिल्ली के एक माध्यम के जरिए इस पत्रकार से मदद की उम्मीद में संपर्क किया। लुधियाना से लेकर चंडीगढ़ तक सरकारी-गैरसरकारी कवायद तथा दबाव के बाद किसी तरह इन्हें एक हफ्ते का सूखा राशन नसीब हुआ। बेशक वह नाकाफी है। सोनू अब भी बार-बार कह रहा है किसी तरह उन्हें यहां से अपने गांव-घर भेजने का बंदोबस्त कर दिया जाए। सोनू और उसके साथियों सरीखे प्रवासी मजदूरों की तादाद लाखों में है। लुधियाना में भी रोज हजारों मजदूर दो जून की रोटी के लिए सड़कों पर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। रोटी मिले या नहीं, पुलिसिया फजीहत जरूर खाने को मिल रही है!     

गौरतलब है कि एशिया का मैनचेस्टर कहलाने वाला महानगर लुधियाना लॉकडाउन और कर्फ्यू से पहले लगभग आठ लाख प्रवासी श्रमिकों को रोजी-रोटी देता था। तालाबंदी ने इन्हें पलों में भूख की भट्टी में झोंक दिया। इनमें से लगभग 2 लाख मजदूर पैदल सफर करते हुए पलायन कर गए। शेष को उम्मीद ने रोक लिया या सख्ती ने। उम्मीद की लौ तो बुझ गई है अलबत्ता सख्ती कायम है जो अब किसी बड़ी यातना से कम नहीं। पहले-पहल लुधियाना और आस-पास के बेरोजगार हुए श्रमिकों को भी ‘लंगर’ का आसरा था। लेकिन अब पूछने वाला कोई नहीं। इसलिए भी कि ये असंगठित हैं और यहां इनके वोट भी नहीं हैं। पंजाब में हर जगह उन प्रवासी श्रमिकों की थोड़ी- बहुत परवाह जरूर की जा रही है जिनके यहां वोट हैं। वजह साफ है। बाकी लावारिस हैं।                              

पंजाब में बेरोजगार हुए लाखों प्रवासी मजदूर इस दिक्कत से भी जूझ रहे हैं कि मालिक उनसे उनके किराए के घर, डेरे तथा ठिकाने जबरन खाली करवा रहे हैं। सरकारी रैन बसेरों में जगह नहीं है। गुरुद्वारे, मंदिर, आश्रम और धर्मशालाएं फौरी पनाहगाह हो सकती थीं लेकिन उनके कपाट अब बंद हैं। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों तथा मैदानों-पार्कों से पुलिस खदेड़ देती है। ऐसे में कहां जाएं? कोई बता सकता है?             

पंजाब से कुछ प्रवासी देर रात साइकिलों से निकलने की कोशिश अब भी करते हैं तो कुछ पैदल। ऐसे पलायन 1947 में होते थे। त्रासदी के उन दिनों में यह भी  होता था कि लालची वाहन मालिक मनमर्जी से कीमत वसूल कर, पलायन करने वालों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें गंतव्य तक पहुंचाते थे। विभाजन पर लिखे गए साहित्य में कई जगह पढ़ने वालों ने ऐसे प्रसंग पढ़े होंगे। प्रवासी मजदूरों के साथ इन दिनों पंजाब में ठीक ऐसा हो रहा है। 23 अप्रैल की रात पुलिस ने मंडी गोबिंदगढ़ में एक मुखबिर की सूचना पर एक ऐसा ट्रक पकड़ लिया जिसमें 40 मजदूर सवार होकर अपने मूल राज्य उत्तर प्रदेश जा रहे थे। ट्रक चालक ने प्रति मजदूर 1500 वसूले थे। मजदूरों से भरे ट्रक की वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुई।                                       

खैर, ताजा सूचना यह है कि साइकिल या पैदल जाने वाले प्रवासी मजदूरों को पंजााब-हरियाणा सीमा से वापस लौटाया जा रहा है। वे सैकड़ों मील पैदल चलने के बाद वापस लुधियाना, जालंधर और अमृतसर लौटने की यातना-सजा भी सह रहे हैं। भूख-प्यास की डायन को देह और दिलो-दिमाग पर ढोकर। तो यह हैं कोरोना वायरस की काल-कथा की कुछ खौफनाक बानगियां!

(अमरीक सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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