Sun. May 31st, 2020

अमेरिका अर्थव्यवस्था का अगर दिवाला निकल गया है तो भारत की क्या बिसात!

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प्रतीकात्मक ग्राफ।

कोरोना संकट के दौर में जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था दस साल के सबसे बुरे दौर में पहुंच गयी है तो उधार यानि कर्ज़ पर आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था की बदहाली स्वयं समझी जा सकती है। इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार पर एक बार फिर निशाना साधा है। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्ति कांत दास की तरफ से मौजूदा वित्त वर्ष में ग्रोथ रेट निगेटिव रहने की आशंका जताए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा है कि शक्ति कांत दास को सरकार से अपना फर्ज निभाने और राजकोषीय उपाय करने के लिए कहना चाहिए।

पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने 23 मई को ट्वीट कर कहा है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास का कहना है कि मांग बुरी तरह से प्रभावित है, वित्त वर्ष 2020-21 में विकास दर नकारात्मक रह सकती है। ऐसे में फिर क्यों वह अर्थव्यवस्था में और पूंजी डाल रहे हैं? उन्हें सरकार से खुलकर कह देना चाहिए कि वो अपनी ड्यूटी करे, राजकोषीय उपाय करे। चिदंबरम ने कहा कि रिजर्व बैंक के बयान के बाद भी, क्या प्रधानमंत्री कार्यालय या निर्मला सीतारमण खुद ही ऐसे पैकेज की सराहना कर रहे हैं, जिसमें GDP का 1 फीसद से कम राजकोषीय प्रोत्साहन है?’

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आरबीआई 22 मई को COVID-19 संकट के असर को कम करने के लिए ब्याज दरों में कटौती, कर्ज अदायगी पर ऋण स्थगन को बढ़ाने और कॉर्पोरेट को ज्यादा कर्ज देने के लिए बैंकों को इजाजत देने का फैसला किया। शक्तिकान्त दास ने बताया कि रेपो रेट में 40 बेसिस प्वाइंट की कटौती करके इसे 4.4 फीसद से 4 फीसद किया गया है, रिवर्स रेपो रेट 3.35 फीसद रहेगा।

कोरोना महामारी संकट का असर अब दुनिया भर में दिखने लगा है। जनवरी-मार्च तिमाही के दौरान अमेरिका की जीडीपी ग्रोथ गिर कर निगेटिव हो गई है। यह माइनस 4.8 फीसद पर आ गई है जबकि जानकार इसके माइनस 3.8 फीसद होने का अनुमान लगा रहे थे। अमेरिका की मौजूदा आर्थिक व्यवस्था 10 साल के अपने सबसे बुरे दौर में है। व्हाइट हाउस के वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार केविन हसेट ने स्वीकार किया है कि उन्हें दूसरी तिमाही में भी हालात के सुधरने की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है।

गौरतलब है कि भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। इस देश की जनता को बहुत आशा थी कि मोदी आए हैं तो देश की स्थिति में बदलाव भी लाएंगे। लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री पद सम्भालने  के बाद भारत नोटबंदी से अपने कार्यकाल का स्टार्टअप किया वहीं जीएसटी के साथ देश के व्यापारियों को स्टैंड अप इंडिया का तोहफ़ा दिया और फिर देखते ही देखते देश की अर्थव्यवस्था आसमान को तो नहीं छू पाई लेकिन ज़मीन में इतनी गहराई तक पहुंच गई कि पिछले 40 वर्षों में इतनी नीचे तक नहीं पहुंच पाई थी।

विश्व बैंक ने कोरोना वायरस संकट के बीच जारी रिपोर्ट की दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था पर ताज़ा अनुमान: कोविड-19 का प्रभाव में कहा है कि भारत समेत दक्षिण एशियाई देशों में 40 वर्षों में सबसे ख़राब आर्थिक विकास दर दर्ज की जा सकती है। विश्व बैंक ने कहा है कि इस संकट से दक्षिण एशिया के आठ देशों की वृद्धि दर सबसे अधिक प्रभावित हो सकती है। 

भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में 40 साल में सबसे ख़राब आर्थिक वृद्धि दर रिकॉर्ड की जा सकती है। दक्षिण एशिया के क्षेत्र जिनमें आठ देश शामिल हैं, विश्व बैंक का अनुमान है कि उनकी अर्थव्यवस्था 1.8 फ़ीसद से लेकर 2.8 फीसद की दर से बढ़ेगी। छह महीने पहले विश्व बैंक ने 6.3 फ़ीसद वृद्धि दर का अनुमान लगाया था। दक्षिण एशिया में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत के बारे में विश्व बैंक का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में वहां वृद्धि दर 1.5 फीसद से लेकर 2.8 फीसद तक रहेगी। हालांकि विश्व बैंक ने 31 मार्च 2020 को ख़त्म हुए वित्त वर्ष 2019-2020 में 4.8 से 5 फीसद की आर्थिक वृद्धि रहने का अनुमान जताया है। रिपोर्ट में कहा गया कि 2019 के अंत में जो हरे निशान के संकेत दिख रहे थे उसे वैश्विक संकट के नकारात्मक प्रभावों ने निगल लिया है।

भारत के अलावा विश्व बैंक ने अनुमान में जताया है कि श्रीलंका, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की आर्थिक विकास में तेज़ गिरावट दर्ज होगी। तीन अन्य देश-पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और मालदीव में भी मंदी आने का अनुमान है। विश्व बैंक ने 7 अप्रैल तक सभी देशों के डाटा पर यह रिपोर्ट तैयार की है। कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के उपायों के कारण पूरे दक्षिण एशिया में सप्लाई चैन प्रभावित हुई है। दक्षिण एशिया में 13,000 के क़रीब मामले सामने आए हैं, जो दुनिया के अन्य भागों के मुक़ाबले में कम हैं। भारत में लॉकडाउन के कारण 1.3 अरब लोग घरों में बंद हैं, लाखों लोग बिना काम के हैं। लॉकडाउन ने बड़े और छोटे कारोबार को प्रभावित किया है। लाखों प्रवासी मज़दूर शहरों से अपने गांवों को लौट चुके हैं।

रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यह राष्ट्रीय लॉकडाउन आगे बढ़ता है तो पूरा क्षेत्र आर्थिक दबाव महसूस करेगा। अल्पकालिक आर्थिक मुश्किलों को कम करने के लिए विश्व बैंक ने क्षेत्र के देशों से बेरोज़गार प्रवासी श्रमिकों का समर्थन करने के लिए वित्तीय सहायता देने और व्यापारियों और व्यक्तियों को ऋण राहत देने को कहा है।

अप्रैल में एकत्रित किए गए आँकड़ों के अनुसार, भारत के निर्यात में 60 प्रतिशत की कमी आई। यह आगे बढ़ रही 10 अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गिरावट है। ज्यादातर देशों में 5-25 फीसद की कमी देखी गई। सिर्फ दो देशों चीन और थाईलैंड का निर्यात इस दौरान बढ़ा है। भारत का उत्पादन अप्रैल में 27.4 फीसद गिरा। यह 10 इमर्जिंग मार्केट में सबसे बड़ी गिरावट है। एक मात्र चीन ऐसा देश है, जहाँ इस दौरान भी उत्पादन बढ़ा है। भारत ने जनवरी-मार्च के दौरान सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का आँकड़ा जारी नहीं किया है। इनवेस्टमेंट बैंकिंग कंपनी गोल्डमैन सैक्स ने 17 मई को कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था 45 प्रतिशत सिकुड़ जाएगी।  गोल्डमैन सैक्स ने यह भी कहा कि आर्थिक पैकेज का नतीजा कुछ दिनों बाद ही दिख सकता है, यानी मीडियम टर्म के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है। पर उससे फ़िलहाल का कोई लाभ नहीं होगा।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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