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Categories: बीच बहस

आईआईएमसी को बनाया जा रहा है मीडिया का ‘विवेकानंद फाउंडेशन’

क्या विडम्बना है कि जिस व्यक्ति को विवादास्पद टिप्पणियों के कारण भाजपा जैसी पार्टी पद के लिए अयोग्य पाया गया, उसे राष्ट्रीय स्तर के मीडिया संस्थान में पढ़ाने के लिए उपयुक्त करार दे दिया गया है! है ना कमाल की बात। पर इससे भी ज़्यादा कमाल की बात ये है कि केंद्र की सत्ता में काबिज नरेंद्र मोदी सरकार नफ़रती विचारधारा को समर्पित किसी भी व्यक्ति को कभी दंडित नहीं करती। कई बार दबाव में वो ऐसे कदम उठाती है जिससे लगता है कि सरकार दंडित कर रही है लेकिन बिना ज़्यादा समय गंवाए सरकार उसे पुरस्कृत करके उसका सारा मलाल भी दूर कर देती है।

अब जैसे अनिल कुमार सौमित्र को ही ले लें। मध्यप्रदेश में भाजपा के मीडिया सेल प्रमुख और भाजपा के मुखपत्र ‘चरैवेति’ का संपादक रहे अनिल कुमार सौमित्र को पिछले साल पार्टी से इसलिए निलंबित कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को ‘पाकिस्तान का राष्ट्रपिता’ कहा था। लेकिन साल बीतते-बीतते केंद्र सरकार ने अनिल कुमार सौमित्र को केंद्र सरकार द्वारा संचालित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में बतौर प्रोफेसर नियुक्ति देकर पुरस्कृत कर दिया है।

वहीं आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइजर’ से जुड़े एक कथित पत्रकार प्रमोद कुमार सैनी को भी आईआईएमसी में प्रोफेसर नियुक्त किया गया है। इससे पहले जुलाई 2020 को संजय द्विवेदी को अगले तीन साल के लिए आईआईएमसी का महानिदेशक बनाया गया था। संजय द्विवेदी आरएसएस-भाजपा के विचारों का पोषण करने वाले दक्षिणपंथी विचारधारा के व्यक्ति हैं। उनकी नियुक्ति कार्मिक मंत्रालय के आदेश मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने सीधी भर्ती के आधार पर किया था। अब इन्हीं महानिदेशक संजय द्विवेदी की अध्यक्षता वाले पैनल ने 60 लोगों का इंटरव्यू करके आरएसएस के रत्नों को आईआईएमसी में बतौर प्रोफेसर नियुक्ति दी है।

नवनियुक्त महानिदेशक ने 60 लोगों के साक्षात्कार करके संस्थान के लिए खोजे आरएसएस के दो रत्न
1 जुलाई, 2020 को आईआईएमसी के महानिदेशक पद पर केंद्र सरकार द्वारा सीधी भर्ती करके नियुक्त किए संजय द्विवेदी ने कृतज्ञता ज्ञापन के तौर पर आरएसएस के दो लोगों को आईआईएमसी में प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति दिया है।

बताया जा रहा है कि आईआईएमसी में प्रोफेसर पद के लिए 60 लोगों का साक्षात्कार लिया गया था। जिसके बाद 26 अक्तूबर को एक आदेश जारी करके अनिल कुमार सौमित्र व प्रमोद कुमार सैनी समेत 6 लोगों को नियुक्ति पत्र सौंपा गया। पत्र में स्पष्ट कर दिया गया है कि सितंबर के पहले सप्ताह में हुए साक्षात्कार के बाद प्रोफेसर के पद के लिए उनका चयन हो गया है। इसके साथ ही बताया गया है कि वे जॉइनिंग की तारीख से दो साल तक प्रोबेशन पीरियड पर रहेंगे। संस्थान में छह अन्य नव नियुक्त प्रोफेसरों में प्रमोद कुमार सैनी हैं, जो आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गेनाइजर’ के साथ जुड़े रहे हैं।

टेलीग्राफ से बात करते हुए संस्थान के एक अधिकारी ने कहा कि सौमित्र और सैनी दोनों ने पात्रता की शर्तों को पूरा किया है। संस्थान के महानिदेशक संजय द्विवेदी की अध्यक्षता वाले एक पैनल ने लगभग 60 उम्मीदवारों का साक्षात्कार किया था, जब एक जांच समिति ने उनकी पात्रता का सत्यापन किया था।

IIMC विश्वविद्यालयों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित भर्ती नियमों का पालन करता है। इन मानदंडों के अनुसार, विश्वविद्यालय के शिक्षक या शोधकर्ता के रूप में 10 वर्ष के अनुभव वाले उम्मीदवार प्रोफेसर के पदों के लिए पात्र हैं। हालांकि, पीएचडी के साथ उत्कृष्ट पेशेवर जिन्होंने “प्रासंगिक विषयों पर ज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान” किया है, भले ही वे 10 साल की कसौटी पर खरे न उतरें, उन्हें प्रोफेसर नियुक्त किया जा सकता है।

संस्थान के एक अधिकारी के मुताबिक सौमित्र और सैनी पेशेवर माने जाते थे जिन्होंने अपने विषय क्षेत्र में ज्ञान के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया था। हालांकि उन्होंने विस्तार से नहीं बताया। सौमित्र और सैनी पूर्व पत्रकार हैं।

पैनल को विवादित पोस्ट के बारे में जानकारी ही नहीं थी

वहीं साक्षात्कार समिति के एक सदस्य ने टेलीग्राफ अख़बार को बताया कि छह सदस्यीय पैनल को सौमित्र की विवादित पोस्ट के बारे में जानकारी नहीं थी।

“पैनल ने सभी उम्मीदवारों का चयन मेरिट और उनके काम के आधार पर किया। पैनल पर किसी भी विशिष्ट व्यक्ति का चयन करने के लिए किसी भी तरह का कोई दबाव नहीं था। हमें इन विवादास्पद पोस्ट के बारे में पता नहीं था”।

आरएसएस के एजेंडे के अनुकूल रहा है अनिल कुमार सौमित्र का लेखन

आईआईएमसी में प्रोफेसर पद पर चयनित किए गए अनिल कुमार सौमित्र बीते साल मई में अपने एक विवादित बयान को लेकर काफी विवादों में रहे थे। सौमित्र ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि – “महात्मा गांधी राष्ट्रपिता तो थे, लेकिन पाकिस्तान के। भारत में उनके जैसे करोड़ों बेटे हुए, कुछ लायक तो कुछ नालायक। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें राष्ट्र का पिता कहा है, लेकिन राष्ट्र का कोई पिता नहीं होता, अगर कोई होता है तो वो सिर्फ पुत्र होता है। ”

सौमित्र की इस पोस्ट को लेकर भाजपा को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, जिसके बाद पार्टी ने उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए पार्टी से निकाल दिया था। लेकिन इससे अनिल कुमार सौमित्र की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि वो भाजपा के मुखपत्र ‘चरैवेती’ के संपादक रहते हुए इसी तरह की अनाप शनाप बातें लिखते थे और पार्टी से उन्हें प्रमोशन और प्रशंसा मिलती आई थी। साल 2013 में सौमित्र भाजपा के मुखपत्र ‘चरैवेति’ में अपने एक संपादकीय लेख को लेकर भी घिरे थे। उन्होंने कैथौलिक चर्च में ननों के यौन शोषण को लेकर ‘चर्च में नन का जीवन’ नाम से एक लेख लिखा जिसको लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि पार्टी ने उन्हें बर्खास्त तक कर दिया था।

ये कोई पहला मामला नहीं है जब आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोगों को शैक्षणिक संस्थानों में नियुक्त किया गया है। जेएनयू में एबीवीपी के सौरभ शर्मा को महज दो महीने में डिग्री देकर 6 महीने में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया था। ये वही सौरभ शर्मा हैं जिसकी तहरीर पर छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के खिलाफ़ देशद्रोह की धारा लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया था। राजधानी दिल्ली के तमाम शैक्षणिक संस्थानों में आरएसएस से जुड़े लोगों को भर्ती करके दिल्ली को नया नागपुर बनाया जा रहा है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।) 

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This post was last modified on November 1, 2020 8:34 pm

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