बीच बहस

किसान आंदोलन: श्रमण बनाम ब्राह्मण संस्कृति का टकराव

संघ-भाजपा गठजोड़ द्वारा कारपोरेट-पूंजपीतियों के हित में लाए गए नए कृषि कानून के खिलाफ किसान आंदोलन चरम पर है। वर्तमान समय में इस आंदोलन को कई नजरिए से व्याख्यायित किया जा रहा है। जिसमें उच्च जातीय-उच्च वर्गीय एवं परजीवी भू-मालिकों से किसान आंदोलन को देखने का नजरिया भी शामिल है। लेकिन भारत में प्राचीन काल से मेहनतकशों की श्रमण संस्कृति की परंपरा रही है। यहां दो संस्कृतियों- श्रमण एवं ब्राह्मण संस्कृति का टकराव हमेशा से रहा है। आज संघ-भाजपा द्वारा उठाए जा रहे कदमों को दो संस्कृतियों के टकराव- ‘श्रमण एवं ब्राह्मण संस्कृति के टकराव’ के नजरिए से भी देखे जाने की जरूरत है।

नए कृषि कानून का मंसूबा स्पष्ट तौर पर मेहनतकश लोगों को गुलामी की तरफ धकेलने एवं पूंजीपतियों को सारा लाभ पहुंचाने का है। यह बिल सम्मानित जीवन जी रहे कृषकों की कमर तोड़ कर उन्हें केवल पूंजीपतियों के रहमो करम पर जीवित रहने के लिए छोड़ देगा। यह व्यवस्था प्राचीन काल में बनाई गई मनुवादी वर्ण व्यवस्था का ही उत्कृष्ट नमूना है, क्योंकि स्वयं किसान भी यह नहीं समझ पा रहे कि असल में यह हमला उसकी सभ्यता पर है, जिसमें मेहनतकश लोगों का सम्मान था।

प्राचीन काल में आर्यों ने इस देश की श्रमण सभ्यता को खत्म कर ब्राह्मण संस्कृति का बीज बोया। ब्राह्मण संस्कृति की व्यवस्था में मेहनतकश श्रमिक वर्ग को शूद्र एवं नीच घोषित कर दिया गया। अनेक शास्त्रों की रचना कर मेहनतकशों के शोषकों को उच्च एवं पूजनीय घोषित किया गया। आर्यों द्वारा बनाए गए इस परोपजीवी व्यवस्था को वर्ण व्यवस्था का नाम दिया गया और इसे ईश्वर जनित व्यवस्था बताकर यहां के मूलनिवासियों को भौतिक एवं मानसिक रूप से अपना गुलाम बना लिया। वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊपर ब्राह्मण वर्ग ने अपने को यज्ञ कर्म- यज्ञ करने एवं करवाने, शिक्षा कर्म- शिक्षा देने एवं लेने, और भिक्षा कर्म- भिक्षा देने एवं लेने तक सीमित रखा। ब्राह्मणों ने इन 6 कर्मों को इस प्रकार डिजाइन किया है कि उन्हें किसी भी प्रकार से श्रम न करना पड़े बल्कि मेहनत करने वाला उनका सम्मान करे और अपना सर्वस्व न्योछावर करने में ही अपनी भलाई समझे।

समय-समय पर परोपजीवी/शोषणकारी इस परंपरा को श्रमण सभ्यता के तमाम योद्धाओं ने चुनौती दी। उन योद्धाओं में सबसे बड़ा नाम तथागत बुद्ध का है। बुद्ध खेती-बाड़ी का काम करते थे, रैदास जूते बनाने का कार्य कर जीविका चलाते थे तो संत कबीर बुनकर थे और गुरुनानक ने वर्ण व्यवस्था को मनुष्यता के लिए खतरनाक बताया। गुरुनानक देव एवं उनके अनुयाई रसोईयां का काम करते हुए मेहनतकशों की श्रमण विचारधारा के दम पर लोगों के बीच प्रसिद्ध हुए। जबकि ब्राह्मण संस्कृति के मठाधीश हमेशा बिना मेहनत के मलाई खाते रहे, उनके द्वारा कहीं भी किसी शास्त्र में श्रम करने का उल्लेख नहीं है।

इस किसान आंदोलन के रीढ़ श्रमण परंपरा के अनुयाई मेहनतकश सिख किसान हैं। सिख अपने मेहनतकश चरित्र के लिए पूरी दुनिया में जाने और सराहे जाते हैं। गाय पट्टी के क्षेत्रों की तुलना में यहां के सभी पुरुष एवं महिलाएं मिलकर खेती करते हैं। यही कारण है कि यह संघर्ष अकूत मुनाफा की हवस रखने वाले कॉरपोरेट घरानों और मेहनतकश किसानों के बीच का संघर्ष बन गया है और इसी चरित्र के चलते देश के अन्य मेहनतकश तबके इसके साथ खुद को एकजुट महसूस कर रहे हैं। आज यह आंदोलन निरंतर मजबूत होता जा रहा है।

पूर्वांचल में कृषि भूमि के बड़े हिस्से पर ब्राह्मण परंपरा के मालिकों- द्विजों का दबदबा है। क्रांतिकारी भूमि सुधार न होने के चलते कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा अपरकॉस्ट के ऐसे लोगों के हाथ में है, जिसकी आय का मुख्य स्रोत खेती न होकर नौकरी या कोई अन्य कारोबार है। ये अपने खेतों में अपने परिवार के साथ काम भी नहीं करते हैं, महिलाएं तो बिल्कुल ही नहीं। उनकी खेती अनुत्पादक होती है, ऐसे लोग भले दरिद्रता की स्थिति में भी रहते हों। ये अनुत्पादक परजीवी ही हैं, जो जमीन के मालिक हैं। ये कागजों में तो किसान हैं, लेकिन ये किसी भी तरह से किसान की परिभाषा में नहीं आते हैं।

भारत में शूद्र एंव अतिशूद्र जातियां ही असल में किसान हैं, जो मिलकर खेती करती रही हैं। आज भी शूद्र जिन्हें पिछड़ा वर्ग कहा जाता है, उनकी बहुलांश आबादी खेती-किसानी में संलग्न है। वर्तमान किसान आंदोलन की रीढ़ पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों के यही किसान, मुख्यतः सिख-जाट किसान हैं। इनकी आय और समृद्धि का मुख्य स्रोत इनकी खेती है।

ब्राह्मण संस्कृति हमेशा से छल-कपट, धूर्तता एवं कूटनीतिक प्रयासों से अपना वर्चस्व कायम करती रही है। वर्तमान समय में भी संघ-भाजपा एवं बिकाऊ मीडिया द्वारा किसान आंदोलन को खालिस्तानी या विदेशों से प्रेरित बोलकर राष्ट्रवाद के बहाने बदनाम करने की कोशिश ब्राह्मण सभ्यता का कूटनीतिक हिस्सा है। वे किसी भी आंदोलन को हिंदू धर्म के खिलाफ बताने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखते हैं। किसी भी आंदोलन को कुचलने के लिए साम्प्रदायिक दंगों को हथियार की तरह समय-समय पर इस्तेमाल करते रहे हैं।

सीएए और एनआरसी के खिलाफ उठ खड़े हुए आंदोलन को कुचलने के लिए कैसे उन्होंने दिल्ली में दंगे करवाए तथा गुंडों द्वारा आंदोलनकारियों पर गोलियां चलवाईं, पिछले ही वर्ष की घटना है। लेकिन किसान आंदोलन उनके इस चाल को बखूबी समझ गया है इसलिए वह सही सवाल उठा रहा है। वह मंदिर-मस्जिद की बात नहीं कर रहा है, बल्कि उसकी मांग है कि उन्हें फसल की उचित कीमत मिले और उनका स्वामित्व बरकरार रहे, जबकि संघी सरकार का प्रयास है कि मेहनत न करने वालों को ज्यादा से ज्यादा फायदा मिले और मेहनतकश किसान इनका गुलाम बन जाए।

बाबासाहेब डा. आंबेडकर ब्राह्मण संस्कृति की साजिशों को बखूबी समझते थे और इसलिए उन्होंने श्रमिकों की सुरक्षा के लिए तमाम कानून बनाये। उन्होंने सामूहिक खेती की बात की। उन्होंने देश का सबसे बड़ा दुश्मन- मनुवाद और पूंजीवाद को बताया। संविधान में ऐसी व्यवस्था की ताकि किसान अपने हक के लिए ऐसे मनुवादी एवं मुनाफाखोरों के खिलाफ उठ खड़े हो। अगर आज किसानों की इस लड़ाई को श्रमण-ब्राह्मण के टकराव के नजरिए से देखा जाए तो संघ का एजेंडा पूरी तरह से नंगा हो जाएगा देश में मेहनतकश लोगों को समझ में आ जाएगा कि उनके ऊपर ब्राह्मण संस्कृति हावी है। वे संघर्ष कर रहे किसानों के साथ एकताबद्ध होकर मजबूती से संघर्ष करेंगे, जिन्हें रोक पाना संघ-भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।

(बहुजन समाज के लिए संघर्षरत धीरेंद्र प्रताप पूर्वांचल सेना के अध्यक्ष हैं। लंबे समय से उत्तर प्रदेश में अलग बुद्धालैंड राज्य के लिए आंदोलन चला रहे हैं। दलित एवं बहुजन मुद्दों पर लिखते भी रहते हैं। वर्तमान समय में गोरखपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on January 12, 2021 10:02 pm

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