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Saturday, September 25, 2021

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गरीबी बढ़ाना एक प्रोजेक्ट है

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दशकों तक गरीबी के खिलाफ मन-बेमन से चली जंग के बाद अब भारत में दिशा पलट गई है। ये बात तमाम आंकड़ों से जाहिर है। यहां हम बात की शुरुआत उनमें से कुछ का सरसरी तौर पर उल्लेख करते हुए करेंगेः

•इस साल मई में जारी अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया (भारत में श्रमिकों की अवस्था) रिपोर्ट-2021 में बताया गया कि कोरोना महामारी के पहले वर्ष में ग्रामीण भारत में गरीबी में 15 फीसदी और शहरी इलाकों में 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। इससे 23 करोड़ लोग फिर से गरीबी रेखा के नीचे चले गए, जो उसके पहले बड़ी जद्दोजहद के बाद इससे बाहर निकले थे।

•इस साल मार्च में अमेरिकी रिसर्च एजेंसी- पिउ रिसर्च सेंटर ने अपने सर्वे के आधार पर बताया कि 2020 में भारत के मध्य वर्ग से तीन करोड़ 20 लाख फिसल कर नीचे चले गए। यानी भारत के मध्य वर्ग का आकार एक तिहाई सिकुड़ गया। बाकी लोग गरीब या नव-मध्य वर्ग (neo-middle class) का हिस्सा बन गए।

•अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा और जगती केशरी परीदा ने हाल में अंग्रेजी अखबार द हिंदू में लिखे एक लेख में राष्ट्रीय आवधिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण (पीएलएफएस) और उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के मीडिया में लीक हुए आंकड़ों के आधार पर बताया कि भारत में गरीबों की वास्तविक संख्या में वृद्धि हुई है। यानी ये बढ़ोत्तरी सिर्फ आबादी के प्रतिशत के हिसाब नहीं है। बल्कि असल में जितनी संख्या में सात साल पहले गरीब लोग थे, आज उसकी तुलना में ज्यादा लोग गरीब हैं। मेहरोत्रा और परीदा ने आकंड़ों की व्याख्या करते हुए यह भी बताया कि गरीबी में इजाफा पूरी तरह कोरोना महामारी का परिणाम नहीं है। बल्कि उसके पहले ही ग्रामीण और शहरों की गरीब आबादी के बीच उपभोग घटने के ठोस आंकड़े सामने आने लगे थे। इस लेख में इस परिघटना की जो खास वजहें बताई गईं, उनमें नवंबर में 2016 अचानक लागू की गई नोटबंदी, फिर पेचीदा वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) और कोरोना महामारी आने पर अचानक लागू अनियोजित लॉकडाउन शामिल हैं।

आम आदमी की जिंदगी बदहाल होने का रुझान पहले से वजूद में आ गया था, इस बात का ठोस संकेत पिछले साल जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएच-5) के नतीजों से भी मिला था। तब भी इस ओर ध्यान खींचा गया था कि आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है, जब देश में कुपोषण ग्रस्त बच्चों की संख्या बढ़ी है। ये सर्वे 17 राज्यों में हुआ, जिनमें से 11 में अविकसित बच्चों की संख्या में वृद्धि देखी गई।

ये किसी संयोग का परिणाम नहीं है। बल्कि यह आज की सरकार की प्राथमिकताओं और नीतियों का नतीजा है। तब एनएफएचएस-5 में दिखे ट्रेंड की एक उचित व्याख्या अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रह्मण्यम ने प्रस्तुत की थी। सुब्रह्मण्यम ने बताया कि कुपोषण में बढ़ोत्तरी असल में नरेंद्र मोदी सरकार की नई जन-कल्याण नीति (new welfarism) का परिणाम है। उन्होंने बताया कि न्यू वेल्फयरिज्म का मतलब ऐसे कल्याण कार्यों से है, जो मतदाताओं को प्रत्यक्ष रूप से दिखें और जिनका फौरी फायदा उन्हें महसूस हो। तो मोदी सरकार ने शौचालय निर्माण, उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस कनेक्शन देना, आयुष्मान भारत योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाने में सीधी मदद, सड़क निर्माण, और किसानों को नकदी ट्रांसफर की योजना को तरजीह दी है। इन कार्यक्रमों के साथ सत्ताधारी दल के लिए फायदे की बात यह होती है कि उनसे जितने लोग असल में लाभान्वित होते हैं, उससे कई गुना ज्यादा लोगों में ये आस जगाई जा सकती है कि जल्द ही ऐसे प्रत्यक्ष लाभ उन तक भी पहुंचेंगे। ये लाभ कौन दे रहा है, ये संदेश भी उन्हें बेलाग दिया जा सकता है। जाहिर है, जब मतदान होता है, तो ये लाभान्वित या लाभ की उम्मीद वाले विशाल मतदाता समूह की पसंद उससे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती है।

लेकिन ऐसी नीति का एक दूसरा नतीजा भी होता है। ये बात ध्यान में रखने की है कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में जन कल्याण के लिए वैसे ही संसाधन सीमित कर दिए गए हैं। उस हाल के बीच जो उपलब्ध संसाधन हैं, उन्हें सीधे लाभ के तौर पर खर्च कर दिया जाता है। ऐसे में बुनियादी मानवीय ढांचे (fundamental human infrastructure) के विकास के लिए शायद ही कुछ बचता है। तो बुनियादी शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि जैसे क्षेत्रों में निवेश घटता चला गया है।

अगर खाद्य सुरक्षा की गारंटी करने की कीमत पर प्रत्यक्ष लाभ दिए जाएंगे, तो गरीब तबकों के बीच उसका परिणाम बाल और महिला कुपोषण बढ़ने के रूप में सामने आएगा, ये निर्विवाद है। इसी तरह जब शिक्षा और स्वास्थ्य में सरकार निवेश नहीं करेगी, तो ये तमाम क्षेत्र प्राइवेट सेक्टर के मुनाफे की होड़ का शिकार हो जाएंगे। उसका परिणाम गरीबों के शिक्षा से बाहर होने और रोगों की रोकथाम और आम इलाज की व्यवस्था के कमजोर होने के रूप में सामने आएगा। जब प्राथमिकता वाले तबकों के अलावा भी सबको फ्री बिजली की योजनाएं अपनाई जाएंगी, तो सरकारी क्षेत्र में बिजली घर लगना या नए बांध बनना लगभग असंभव हो जाएगा। 

और असल में यही हुआ है। अब उसके नतीजे सामने आ रहे हैं। बीते सात वर्षों में देश में आम इंसानी खुशहाली का ढांचा तबाह हुआ है और दीर्घकालिक विकास की संभावनाएं धूमिल होती जा रही हैं। इसके बावजूद सरकार की लोकप्रियता कायम है। उसके चुनाव जीतने की स्थितियों पर न्यू वेल्फयरिज्म के असल नतीजों का कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

यहां यह उल्लेख जरूर कर लेना चाहिए कि नरेंद्र मोदी सरकार ने भले न्यू वेल्फयरिज्म को बेहिचक और बेलाग रूप से लागू किया है, लेकिन इसकी दिशा उनके सत्ता में आने के तकरीबन ढाई दशक पहले तय कर दी गई थी। जब देश ने उदारीकरण- निजीकरण- भूमंडलीकरण की नीतियों को गले लगाया, तो उसमें यह निहित था कि पहले के नियोजित विकास का रास्ता छोड़ा जा रहा है। ये संयोग नहीं है कि उसके बाद देश में शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र का उत्तरोत्तर निजीकरण हुआ, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था कमजोर हुई, और दीर्घकालिक विकास सरकारों की प्राथमिकता से हट गया। ये नीतियां 2014 में योजना आयोग को औपचारिक रूप से भंग करने के साथ ही अपनी चरम सीमा पर पहुंच गईं।

बहरहाल, इस पूरे संदर्भ को ध्यान में रखें, तो मोदी सरकार की नीतियों को नव-उदारवाद की दिशा का तार्किक परिणाम ही कहा जाएगा। इसीलिए जब इस बिंदु पर हो रही चर्चा सिर्फ मोदी सरकार की आलोचना तक ठहर जाती है, तो वह अधूरी रह जाती है। बहरहाल, मोदी सरकार का विशेष योगदान यह है कि उसने गरीबी और रोजगार जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श से बाहर कर दिया है। जबकि पहले की सरकारों के सामने इन मुद्दों पर जवाबदेह होने की स्थिति बनी हुई थी। मोदी के दौर में भाजपा हिदू-मुसलमान के अपने डिस्कोर्स से राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध का विच्छेद करने में सफल हो गई है। ऐसे में एक दुखी व्यक्ति को, जिसके दुखी बने रहने की परिस्थितियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं, उसे प्रचार तंत्र के व्यापक उपयोग से यह समझाना आसान हो गया है कि देश प्रगति कर रहा है और इसके लाभ देर-सबेर उस तक भी पहुंचेंगे। पिछले सात साल से यही विमर्श देश का प्रमुख विमर्श है।

याद कीजिए, देश में गरीबी के पैमाने को लेकर आखिरी सार्वजनिक बहस कब हुई थी? आज हकीकत यह है कि जब ये बहस ही नहीं है, तो बहुत कम लोग हैं, जो गरीबी बढ़ने या घटने से चिंतित हों या इस मुद्दे में उनकी दिलचस्पी हो। बहरहाल, चूंकि इस लेख का विषय गरीबी है, तो यहां ये उल्लेख जरूरी है कि भारत में गरीबी मापने का अपनाया गया पैमाना हमेशा से न्यूनतम है। यानी ऐसा आरंभ से रहा है। तब से जब मशहूर अर्थशास्त्री डीटी लकड़वाला ने भोजन में उपलब्ध कैलोरी का आधार गरीबी की कसौटी तय की थी। 1991 के बाद तो यह कसौटी सीधे तौर पर विश्व बैंक के तय खर्च पैमाने को भारतीय मुद्रा में तब्दील कर तय होने लगी। एक समय विश्व बैंक 1.09 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति दिन खर्च क्षमता से नीचे के लोगों को गरीब मानता था। आज उसका पैमाना 1.90 डॉलर खर्च क्षमता है। इस रकम को भारत में परचेजिंग पॉवर पैरिटी के फॉर्मूले से रुपये में तब्दील किया जाता है।

यूपीए के शासनकाल में अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर ने इसी आधार पर हिसाब लगाया था कि गांवों में रोज 27 रुपये और शहरों में 31 रुपये से कम खर्च पर जो लोग जीवित हैं, वही गरीब हैं। इस फॉर्मूले की आलोचना के बाद यूपीए सरकार ने अर्थशास्त्री सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक नई समिति बनाई थी। उसने जब तक रिपोर्ट सौंपी, नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आ चुकी थी। वो रिपोर्ट तब से कहीं आलमारियों में धूल फांक रही है। बताया जाता है कि रंगराजन कमेटी ने गरीबी की कसौटी गांवों में 39 और शहरों में 45 रुपए करने की सलाह दी थी। बहरहाल, अगर इसे अपनाया जाता, तो यह भी एक न्यूनतम पैमाना ही होता। जबकि आज दुनिया में बहुआयामी गरीबी को मापने की अवधारणा के तहत मल्टीपल पॉवर्टी इंडेक्स न सिर्फ लोकप्रिय हो गया है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र ने भी उसे अपना लिया है। मगर भारत में वह कहीं चर्चा में भी नहीं है।    

और यह भी कोई संयोग नहीं है। बल्कि आज जो नीति है, उसे सोच-समझ कर अपनाया गया है। कैसे, इसे समझने के लिए याद कीजिए। यूपीए-1 के शासनकाल में, जब मनमोहन सिंह लेफ्ट फ्रंट के समर्थन पर निर्भर थी, महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून बनाया गया था। उस कानून का बड़ा असर हुआ। आज भी गरीबों के लिए वह सहारा बना हुआ है। तब उस कानून का परिणाम साल में 100 दिन रोजगार की गारंटी मिल जाने के कारण गांवों और शहरों में मजदूरी की दर बढ़ने के रूप में सामने आया था। उससे गांवों और शहरों दोनों जगह के धनी तबकों में भारी नाराजगी देखी गई थी। पूंजीपति तबके की ओर से भी मजदूरी बढ़ने और भारत के आर्थिक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाने जैसी बातें कह कर ऐसे उपायों के प्रति नाराजगी जताई गई थी। कॉरपोरेट मीडिया ने इस योजना के खिलाफ मुहिम छेड़ दी थी। उसमें इस पर अमल में कथित भ्रष्टाचार को (कु)तर्क बनाया गया था। यूपीए से नाराजगी और उसके खिलाफ छेड़े गए कॉरपोरेट वॉर के पीछे जो कारण थे, उसमें मनरेगा, वनाधिकार कानून और ऐसी दूसरी योजनाएं भी शामिल हैं।

आखिर इसके पीछे क्या सोच झलकती है। सोच यह है कि गरीब को गरीब ही रहना चाहिए। तभी संपन्न तबकों और ‘निवेशकों’ को सस्ते और झुक कर काम करने वाले मजदूर मिलते रहेंगे। ऐसे मजदूर जो अधिकार या आत्म-सम्मान की बातें ना करें। जब आर्थिक विकास के लाभ उन्हें मिलते हैं, तो उससे उनकी मजबूरियां कम होती हैं। तब वे आत्म-सम्मान और बेहतर जिंदगी के सपने देखने लगते हैं। अगर बुनियादी मानवीय विकास का ढांचा खड़ा होता है, तो उससे जिंदगी सस्ती और आसान होती है। मसलन, अगर बच्चों की शिक्षा मुफ्त हो और मुफ्त या सस्ते इलाज का आश्वासन हो, तो कम कमाई के साथ भी एक परिवार आराम की जिंदगी जीने की स्थिति में होता है। नव-उदारवाद में ये पहलू नकारात्मक समझा जाता है। ये अनुभव सिर्फ भारत का नहीं, बल्कि विकसित देशों का भी है।

इसीलिए गरीबी को जारी रखना धनी वर्ग के नियोजित प्रोजेक्ट का हिस्सा होता है। भारत जैसे देश में आजादी के बाद अपनाई गई अर्थव्यवस्था ने गरीबों के सशक्तीकरण की राह तैयार की थी। उसका परिमाण आजादी के 40-50 वर्षों के बाद दिखना शुरू हुआ था। मगर तभी पहले नव-उदारवाद की नीतियां अपना ली गईं, और फिर “न्यूनतम सरकार” का वादा करते हुए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आ गई। ऐसे घोर नव उदारवादी नारे में यकीन करने वाली इस सरकार (वैसे पूरे भारतीय सत्ता तंत्र) की पॉलिटिकल इकॉनमी से वाकिफ कोई व्यक्ति समझ सकता है कि अगर देश में गरीबी और कुपोषण बढ़े हैं, तो ऐसा क्यों हुआ है?

आखिर नोटबंदी का भी यही परिणाम हुआ था कि गरीबों और निम्न मध्य वर्ग की कमर एकबारगी से टूट गई। इसीलिए कई जानकार उसे गरीब तबके से धनी वर्ग के हाथ में धन ट्रांसफर करने की योजना मानते हैं। जीएसटी और उसके साथ परोक्ष करों और सेस के बढ़ते गए दौर से भी इसी तरह का ट्रांसफर हो रहा है। इसलिए गरीबी का बढ़ना भले विवेकशील लोगों को चिंताजनक लगे, लेकिन असलियत यह है कि यह एक सुविचारित प्रोजेक्ट का हिस्सा है। ये प्रोजेक्ट जब तक राजनीतिक रूप से कामयाब है, बदहाली की कहानियां हमारे आस-पास यूं ही आम बनी रहेंगी।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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