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अमेरिका और चीन के बीच में भारत

लद्दाख में चीनी सैनिकों की दादागीरी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अपुष्ट दावा कि उनकी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात हुई और वे इससे बहुत प्रसन्न नहीं हैं, एक ऐसी स्थिति को प्रदर्शित करता है जहां अमेरिकी और चीन के वर्चस्ववाद के बीच भारत निरंतर फंसता हुआ दिख रहा है। हालांकि भारत ने तत्काल इस बात का खंडन किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कोई वार्ता हुई है, लेकिन यह खंडन किसी सरकारी प्रवक्ता ने नहीं किया है। यह खंडन सूत्रों के हवाले से किया गया है। इस बीच भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अमेरिकी रक्षामंत्री मार्क टी एस्पर से बात करके उनसे कहा है कि भारत इस विवाद को दोतरफा वार्ता से निपटा लेगा।

यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन की सरकार  के बीच कोविड-19 के संक्रमण का दोष और उससे जुड़े दायित्वों के बारे में जबरदस्त राजनीति छिड़ी हुई है। वह राजनीति एक प्रकार से शीतयुद्ध का रूप ले चुकी है। अमेरिका से आर्थिक संबंधों को लाभदायक मानते हुए भी चीन इस शीतयुद्ध को अनिवार्य मान रहा है। एक तरफ अमेरिका में इस बीमारी से मरने वालों का आंकड़ा एक लाख पार कर गया है तो दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप इसके लिए सीधे तौर पर चीन की साजिश को दोषी बता रहे हैं।

इसमें उनका चुनावी हित तो है ही साथ में एक प्रकार का व्यापारिक युद्ध भी है जो हांगकांग और ताइवान से भी लगातार जुड़ता जा रहा है। चीन की राजधानी पेईचिंग में हाल में हुए चाइना नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (चीन की संसद) के सम्मेलन में नेशनल सिक्योरिटी एक्ट पारित कर हांगकांग में आंदोलनों पर पाबंदी लगाने की तैयारी कर ली गई है। उधर अमेरिका ने हांगकांग को दिया जाने वाला विशेष दर्जा भी समाप्त करने की घोषणा कर दी है।

इस बीच सांग-इंग- वेन के दोबारा ताइवान की राष्ट्रपति चुने जाने और ताइवान को डब्लूएचओ का विशेष सदस्य बनाए जाने की कोशिशों से चीन नाराज है। चीन इस मामले को भी लेकर इतना संवेदनशील है कि उसने भारत सरकार से इस बात पर भी विरोध जताया है कि कैसे भाजपा के दो सांसद उनके शपथ ग्रहण समारोह में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए शामिल हुए।

चीन और अमेरिका के बीच भारत की यह उलझन वैचारिक भी है और भूराजनीतिक भी। भारत सरकार, उसके नीति निर्माता, जनमत निर्माता और मध्यवर्ग इस उलझन के जबरदस्त शिकार हैं। भारत में तकरीबन 90 साल तक चलने वाले स्वाधीनता संग्राम के कारण एक ओर तो उसके भीतर आजादी के उन सपनों की ललक है जिसकी घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने चार स्वतंत्रताओं के रूप में की थी। रूजवेल्ट ने जिन चार स्वतंत्रताओं की घोषणा की थी वे हैं—युद्ध और भूख से मुक्त, धर्म और अभिव्यक्ति की आजादी। भारत में इन स्वतंत्रताओं के प्रति जबरदस्त चाह रही है ऐसा कांग्रेस पार्टी के 1930 में पूर्ण स्वाधीनता की घोषणा के साथ और बाद में संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के साथ प्रकट होता है।

लेकिन इस बीच और विशेषकर उदारीकरण और सांप्रदायिकता के बढ़ते जोर के कारण भारत के व्यापारी और राजनेता भीतर ही भीतर देंग श्याओ पिंग के उस सूत्र की ओर आकर्षित हुए हैं कि बिल्ली काली है या सफेद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, फर्क इस बात से पड़ता है कि वह चूहा पकड़ती है या नहीं। भारत का शासक वर्ग और योजनाकारों का समूह यह तेजी से महसूस करने लगा है कि आर्थिक (और सैन्य) शक्ति ही असली ताकत है और उसके लिए लोकतंत्र के रास्ते से समझौता भी किया जा सकता है। आखिर चीन ने लोकतंत्र के रास्ते पर चले बिना दुनिया में अपनी हैसियत बनाई तो है और वह सोवियत संघ की तरह बिखरता हुआ भी नहीं दिखता।

भारत के दक्षिणपंथी संगठन भले ही यह कहते हुए चीन के प्रति घृणा जताएं कि चीन से दो चीजें आई हैं एक माओवाद और दूसरा कोराना, हमें दोनों से लड़ना है, लेकिन भीतर ही भीतर वे चीन की नकल करते हुए एक दक्षिणपंथी अधिनायकवाद लाना चाहते हैं। उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अधिनायकवाद की तरह ही भारत में हिंदू राष्ट्र में विश्वास करने वाली पार्टी का अधिनायकवाद लाने की तैयारी कर ली है। जैसे चीन में राजनीतिक विपक्ष के लिए जगह नहीं है वैसे ही भारत में वे विपक्ष के लिए जगह नहीं चाहते।

दरअसल आज भारत में भले ही भारतीयता और भारतीय संस्कृति की तेजी से बात चलती हो लेकिन वास्तव में भारत बुरी तरह चीन और अमेरिकी माडल के आकर्षण में खिंच रहा है। इस दौरान वह अपनी परंपरा और इतिहास भी भूलता जा रहा है। अगर अमेरिका में आजादी का छद्म मॉडल चल निकला है और वहां वैसे लोग और संस्थाएं कमजोर होती जा रही हैं जो लोकतंत्र के गेटकीपर का काम करते हुए किसी अधिनायकवाद को आने से रोकें, तो भारतीय लोकतंत्र ने लगभग वही राह पकड़ ली है। स्टीवन लेविटस्की और डैनियल जिबलाट की बेस्टसेलर पुस्तक `हाउ डेमोक्रेसीज डाइड’ अमेरिकी लोकतंत्र की ढलान की विस्तार से चर्चा करती है। वह बताती है कि अमेरिकी समाज का जो लोकतांत्रिक गेटकीपर नाजीवाद के समर्थक फोर्ड को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनने से रोक ले गया था वह डोनाल्ड ट्रंप को नहीं रोक पाया।

इधर चीन के प्रति भारत का जो आकर्षण कम्युनिस्ट पार्टियों में माओवाद के कारण था अब वह वहां की आर्थिक तरक्की के कारण बना है। उसी के साथ भारत का एक आकर्षण वहां के कन्फ्यूसियसवाद के कारण भी है। कन्फ्यूसियसवाद जनता में सरकार के प्रति पूरी निष्ठा का सिद्धांत पेश करता है। हालांकि चीन में ताओवाद भी रहा है जो एक प्रकार से बुद्ध के दर्शन का ही चीनी संस्करण कहा जाता है और ताओ स्वयं को बुद्ध का अवतार ही कहते थे। भारत में चीन के कन्फ्यूसियसवाद और आज के साम्यवाद की तरह राजसत्ता के प्रति आंख मूंदकर यकीन करने का प्राचीन सिद्धांत नहीं रहा है।

जहां तक चीन के प्रति हमारे रुख का सवाल है तो उसमें एक प्रकार का संदेह हमारे आजादी के दार्शनिक राजनीतिज्ञों में पाया जाता है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने भी चेताया था कि हमें चीन पर यकीन नहीं करना चाहिए। हालांकि वे स्वयं राजसत्ता के साथ तालमेल बिठाकर ही राजनीति करने वाले राजनेता थे लेकिन उनकी यात्रा सत्ता से जनता की ओर हो रही थी। बौद्ध धर्म अपनाकर उन्होंने अहिंसा और लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था को और मजबूत किया। उनके बाद चीन पर सर्वाधिक संदेह जताने वाले राजनेता थे डॉ. राम मनोहर लोहिया। वे जनता और आंदोलन से सत्ता की ओर यात्रा कर रहे थे।

उन्होंने बार बार आगाह किया कि भारत को चीन के साथ तिब्बत का सवाल जिंदा रखना चाहिए। इसी के साथ वे भारत और चीन की सीमा पर शांति के लिए एक हिमालय नीति की बात करते थे जिसमें वहां की जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ हिमालय के भीतरी इलाकों में रहने वाली आबादी की स्वायत्तता का सवाल भी उठाते थे। कहा जाता है कि चीन पर भरोसा करने का खामियाजा पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ पूरे देश को उठाना पड़ा। चीन से हार के बाद नेहरू दो वर्ष तक भीतर ही भीतर घुटते रहे और बाद में जीवन से हाथ धो बैठे।

आज सवाल यह है कि चीन और अमेरिका के बीच खिंचा भारत किस पर ज्यादा यकीन करे और किधर जाए। क्या आज की स्थिति में भारत इनमें से किसी एक से दोस्ती और दूसरे से दुश्मनी की नीति अपना सकता है ? क्या भारत चीन पर उसी तरह संदेह कर सकता है जैसे डॉ. आंबेडकर और डॉ. लोहिया ने किया था और उनकी तरह ही आक्रामक हो सकता है? क्या भारत कोरोना के बहाने या लद्दाख, अरुणाचल और अक्साई चीन के बहाने चीन के प्रति अमेरिका जैसा आक्रामक हो सकता है? क्या भारत अमेरिकी प्रशासन के हर उकसावे से प्रेरित होकर चीन की वस्तुओं का बायकाट शुरू कर दे या फिर व्यापारिक युद्ध करे या छिटपुट संघर्ष?

इसी तरह भारतीय साम्यवादियों और समाजवादियों ने अमेरिका की आलोचना में बहुत कुछ कहा है। वे भारत के विभाजन के लिए अमेरिका को जिम्मेदार मानते हैं और गांधी की इस टिप्पणी का बहुत उल्लेख करते हैं कि वह डॉलर को पूजने वाला देश है इसलिए वहां नहीं जाऊंगा। लेकिन हकीकत यह है कि भारत के ज्यादातर वामपंथी अपने ज्ञान का प्रदर्शन अमेरिकी विश्वविद्यालयों और संगठनों के मंचों पर जाकर करना चाहते हैं। वह अपनी संतानों को वहीं शिक्षा देना चाहता है और चाहता है कि वे वहीं बस जाएं। अमेरिकी आजादी के बरअक्स अब चीन इस बात का प्रचार कर रहा है कि असली मानवाधिकार तो अपने नागरिकों की जान की रक्षा है। कोरोना महामारी के समय में अमेरिका इस मामले में पूरी तरह विफल रहा है जबकि चीन ने इस काम को बखूबी किया है।

सवाल है कि आखिर अमेरिका और चीन के बीच मची इस खींचतान, जिसे कुछ लोग शीतयुद्ध का नाम दे रहे हैं तो कुछ लोग सभ्यताओं का संघर्ष बता रहे हैं, भारत क्या रुख ले ? सभ्यताओं के संघर्ष का जो खाका सैमुअल पी हंटिंग्टन ने खींचा है आज चीन और अमेरिका का संघर्ष और उसमें भारत को खींचने की कोशिश उसी दिशा में जा रही है। लेकिन भारत के पास अपने लोकतांत्रिक इतिहास और प्राचीनता के माध्यम से एक और मॉडल है। वह मॉडल है सभ्यताओं के मेलमिलाप का। भारत स्वयं तमाम सभ्यताओं का संगम है और वह चीन और यूरोप की तरह एकरूपता में यकीन नहीं करता। न ही वह शीत युद्ध से निकले अमेरिका की तरह एक और शीतयुद्ध को अनिवार्य मानता है।

उसके राजनीतिक दार्शनिकों ने विश्व शांति पर आधारित उस विश्व व्यवस्था का समर्थन किया है जो रूजवेल्ट की चार स्वतंत्रताओं के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र में शामिल की गई थीं। डॉ. राममनोहर लोहिया तो विश्व सरकार के लिए निरंतर अभियान चलाते रहे। भारत का लोकतंत्र अपने में अमेरिका और यूरोप सभी से अलग और विशिष्ट है। इतनी विविधता यूरोपीय देश न तो सह सकते हैं और न ही यह उनकी प्राचीन परंपरा का हिस्सा है। भारत को इन दो ध्रुवों की खींचतान के बीच अपना व्यावहारिक संतुलन तो बनाना ही है और उसके लिए प्रधानमंत्री मोदी ने प्रयास किया भी है।

अगर वे डोनाल्ड ट्रंप को भारत आमंत्रित करते हैं तो उससे पहले अक्तूबर में महाबल्लीपुरम में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भी बुलाते हैं। भारत के पास एक रास्ता तो यह है कि वह चीन और अमेरिका की अधिनायकवादी और युद्धोन्मादी सत्ता का अनुसरण करे और उन्हीं जैसा बन जाए। दूसरा रास्ता यह है कि वह अपने लोकतंत्र को निरंतर मजबूत बनाते हुए उसको दुनिया के सामने एक आदर्श के रूप में पेश करे। साथ ही भारत को यह करना चाहिए कि वह संयुक्त राष्ट्र, डब्ल्यूएचओ और सुरक्षा परिषद जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूती देने और उसे लोकतांत्रिक बनाने के लिए अभियान चलाए। दूसरा रास्ता लंबा और कठिन है लेकिन भारत के विचार और दुनिया के हित में है।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) 

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This post was last modified on May 31, 2020 4:08 pm

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