Monday, January 24, 2022

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अमेरिकी पतवार के हवाले भारतीय विदेशी नीति की नाव

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आजादी के बाद भारतीय विदेशी नीति पंचशील सिद्धांतों के सहारे बुनी गयी थी और गुटनिरपेक्षता उसके केन्द्र में थी। एक-दूजे की क्षेत्रीय अखण्डता और संप्रभुता का आदर, पारस्परिक आक्रमण या हस्तक्षेप रहित समता, आपसी लाभ के लिए शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का सम्मान, विदेश नीति का सिद्धांत रहा है। आज स्थिति बदल चुकी है। किसी भी देश की विदेशी नीति उस देश की आर्थिक मजबूती, सामरिक शक्ति और भौगोलिक स्थिति के अनुसार तय होती है। भारत ने 2019 में ही अपनी बदलती विदेशी नीति के बारे में संकेत दे दिये थे जो बहुत हद तक अमेरिकी परस्त हो चली थी। अमेरिकी परस्त नीतियां हमें रूस, चीन, ईरान आदि से दूर करती हैं। अमेरिकी परस्त नीतियों के चलते ही हम आज अफगानिस्तान में फंसे हैं। उसी के उकसाने पर निर्माण कार्यों में 3 बिलियन के लगभग निवेश कर बैठे हैं जो तालिबान के आने के बाद डूबने के कगार पर है। अमेरिकी पक्षधरता के चलते इजराइल जैसा हिंसक देश करीबी बन गया और दशकों की फिलीस्तिनी मित्रता से हमने हाथ खींच लिए हैं।

2019 के रायसीना डायलॉग में विदेश सचिव ने स्पष्ट कहा- ‘भारत गुटनिरपेक्षता के अतीत से बाहर निकल चुका है।’ अमेरिकी बड़बोले राष्ट्रपति, ट्रंप के समय अमेरिकी पक्षधरता के बावजूद जी-20 और इण्डो-पैसिफिक क्षेत्र में हमारी कोई खास भूमिका नहीं देखने को मिली। दो बार तो ऐसा देखा गया, जब ट्रंप ने भारत के विरूद्ध अपमानजनक टिप्पणियां कीं। बदले में हमने अपनी विदेशी नीति को राष्ट्रहित से व्यक्तिहित में बदलकर, उसे और नीचे गिराया। ट्रंप को जिताने की अपील तक की जो आज बाइडेन से बेहतर सम्बंधों की राह में रोड़ा बना हुआ है।

भारत के प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति के बीच 2014 में अहमदाबाद मुलाकात और 2019 में महाबलीपुरम की सैर के बावजूद चीन ने आक्रामक रूप से चारों ओर से घेर लिया। गलवान घाटी में झड़प और हमारे 20 जवानों की हत्या को कभी भुलाया नहीं जा सकता। यह बात स्वयं प्रधानमंत्री ने भी कही है। चीन के विरुद्ध हमने सामरिक दृष्टि से कुछ भी हासिल नहीं किया है। एक-एक कर कई जगहों पर, लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीन हमारी सीमा में घुस रहा है। हम वार्ता-दर वार्ता से आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं हैं। हमारा विरोध ऐप बंद करने और चीनी समानों के बहिष्कार के आगे बढ़ नहीं पाया है। चीनियों की हमारे बाजार में पकड़ लगातार बढ़ती जा रही है क्योंकि आर्थिक मोर्चे पर हम बहुत पीछे और कमजोर हैं। यह बात चीन को मालूम है और इसलिए भी वह चौधरी की भूमिका में नजर आने लगा है। उससे मुकाबला करने के लिए हमारे पास अमेरिकी खेमे में खड़े होने का विकल्प दिख रहा है जहां, हम अफगानिस्तान जैसे मुल्क में फंस कर अपने हितों को बचा नहीं पा रहे हैं। दूसरी ओर चीन ने अफगानिस्तान में तांबा खनन का काम शुरू कर दिया है।

1991 के नरसिम्हाराव सरकार की ‘लुक ईस्ट’ नीति की जगह 2014 में मोदी सरकार ने ‘एक्ट ईस्ट’ नीति की घोषणा की। हम विदेशी नीति का मूल्यांकन इसी बिन्दु पर करें तो देखेंगे कि हमने ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में भी कोई सफलता नहीं पायी है। यह महज एक घोषणा बन कर रह गया है। पूर्व विदेशी मंत्री सुषमा स्वराज के थ्री ‘सी’ यानी कॉमर्स, कनेक्टिविटी एण्ड कल्चर मामले में आगे बढ़ने की बात की थी मगर वहां भी कुछ खास हासिल नहीं हुआ। आसियान (दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन) देशों से हमारी संस्कृति सदियों पुरानी है, लगभग मिलती-जुलती है, इसलिए भी इसे और प्रगाढ़ करने की दिशा में हमने जो कुछ हासिल किया हो, वह खास नहीं समझी जायेगी।

चीन की चौधराहट ने दक्षिण पूर्वी एशिया क्षेत्र से भारत को अलग-थलग कर दिया है। उसकी घेराबंदी से छोटे-छोटे देशों में जो असन्तोष पैदा हुआ है उसे अपने हितों के अनुरूप इस्तेमाल करने के लिए हमने कोई कारगर पहल नहीं की है। दक्षिणी चीन सागर में नटूना आईलैंड पर कब्जे को लेकर चीन का इंडोनेशिया से, पारसेल आइलैंड को लेकर वियतनाम से और जेम्स शोल को लेकर मलेशिया से विवाद बना हुआ है मगर वहां भारत की कोई कूटनीतिक पहल नहीं दिखाई दे रही है। मलेशिया से हमारे रिश्ते मजबूत रहे हैं मगर देश की साम्प्रदायिक घटनाएं एवं हमारी दक्षिणपंथी नीति ने संबंधों को एक हद तक बिगाड़ दिया है।

मालदीव की सामरिक स्थिति भारत के लिए बहुत महत्व की है और ऐतिहासिक रूप से उसका रिश्ता दक्षिण राज्यों से जुड़ता है। इसके बावजूद पूर्व यामीन सरकार से भारत के संबंध बहुत खराब हो चले थे। उनकी पार्टी आज भी ‘इंडिया आउट’ अभियान को हवा दे रही है और वर्तमान राष्ट्रपति इब्राहिम की पार्टी एम.डी.पी. ने चीन पर आरोप लगाया है कि वह विपक्ष को उकसा रहा है।

आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच ऑन लाइन शिखरवार्ता सात समझौतों तक सीमित रही है और उसका सामरिक महत्व नहीं दिखता। जापान सरकार के साथ हमारा संबंध महज आर्थिक है और जापान के हित में लचीला है। ईरान भारत का पुराना दोस्त रहा है मगर ट्रंप के दबाव में तेल लेना बंद करने के कारण उससे भी संबंध बिगड़ गए हैं। चाबहार पोर्ट के काम में मतभेद उभरे हैं और ईरान ने भारत को वहां से बाहर कर दिया है। गैस पाइप लाइन बिछाने का मामला अब अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो जाने के बाद, अधर में लटक गया है। ईरान का कश्मीर पर आया बयान, मतभेदों को पुख्ता करता जान पड़ता है। उसे कम करने के लिए विदेश मंत्री जयशंकर ने ईरान के नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत कर संबंधों को सामान्य बनाने की पहल की है। यूरोपियन यूनियन के कुछ दक्षिणपंथी सांसदों को कश्मीर यात्रा कराने से सकारात्मक प्रभाव पड़ने के बजाय, हमारी साम्प्रदायिक नीतियों का प्रचार ज्यादा हुआ।

सदियों से नेपाल के साथ हमारा मित्रवत और सांस्कृतिक संबंध रहा है। दोनों के बीच खुली सीमाएं और सेना में गोरखाओं की भर्तियां खास संबंधों की नींव रखती हैं मगर लिपुलेख-धारा चूला मार्ग उद्घाटन को नेपाल ने एकतरफा कार्यवाही बताते हुए आपत्ति जता दी। उसने उत्तराखण्ड के कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख को अपना हिस्सा बताकर अचंभित कर दिया।

आज भारत को चारों ओर से चीन ने घेर रखा है। नेपाल की सड़क निर्माण से लेकर टेलीकॉम सेवाओं पर चीन का अधिकार जम चुका है। चीन की ‘बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव परियोजना’ में भारत के पड़ोसी शामिल हो गए हैं। भारत इस परियोजना के पक्ष में नहीं है। सार्क देशों में अब न गर्मजोशी देखी जा रही है न एकता। बांग्लादेश के साथ तिस्ता नदी जल विवाद बना हुआ है यद्यपि हाल के दिनों में रिश्ते सामान्य बनाने के प्रयास हुए हैं मगर अवैध प्रवासन, एन.आर.सी, और सी.ए.ए. रजिस्टर विवाद ने बांग्लादेश से संबंधों को ठीक करने में प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

श्रीलंका के निर्माण कार्यों में चीन का एकाधिकार बन चुका है और इस प्रकार चीन अपनी ‘चेक-बुक डिप्लोमेसी’ के आधार पर दक्षिण एशिया में अच्छी पकड़ बना चुका है। पाकिस्तान से हमारे संबंध पहले भी बहुत ठीक न रहे और अब उसमें लगातार गिरावट जारी है।

अफगानिस्तान के नए घटनाक्रम में भी चीन और पाकिस्तान ने बाजी मार ली है। उन्होंने तालिबान को मान्यता देते हुए अपने हितों की सुरक्षा का आश्वासन ले लिया है। तालिबान ने पाकिस्तान को अपना दूसरा घर बताया है। ऐसे में स्पष्ट नीतियों के अभाव में हम दक्षिण-पूर्व एशिया में अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। इसके दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे और आर्थिक एवं सामाजिक हितों का नुकसान होगा।

(सुभाष चन्द्र कुशवाहा इतिहासकार और साहित्कार हैं। आप आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

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