Sunday, May 29, 2022

बुद्धिजीवियों को लेना होगा हिंदुत्ववादी ताकतों से सीधा मोर्चा

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आज निम्न गंभीर संकट हमारे सामने खड़ा है-

1- आरएसएस-भाजपा और उसके घोषित-अघोषित आनुषांगिक संगठनों के नेतृत्व में एक बहुसंख्य समूह के रूप में हिंदू बर्बर और आक्रामक तरीके से धार्मिक अल्पसंख्यकों (मुसलमानों और ईसाईयों) खिलाफ हमलावर है। अब बात मुसलमानों के सामूहिक कत्लेआम के आह्वान तक पहुंच गई है और मानवता और करुणा के प्रतीक ईसाई मसीह की मूर्तियां ध्वस्त की जा रही हैं और चर्चों पर हमले हो रहे हैं। अब तो धार्मिक अल्पसंख्यकों के सफाया अभियान की शुरुआत का आह्वान भी हरिद्वार की हिंदू धर्म संसद ने कर दिया है।

2- आरएसएस-भाजपा के नेतृत्व में तथाकथित अपरकॉस्ट अपने खोए हुए स्वर्ग (द्विज वर्चस्व की पूर्ण स्थापना) की वापसी के लिए खुले और छिपे तौर पर दलितों-पिछड़ों के खिलाफ आक्रामक है। दलितों-पिछड़ों के सारे संविधान प्रदत्त अधिकार खतरे में हैं, जिसमें दलितों-पिछड़ों के प्रतिनिधित्व का एक रूप आरक्षण भी शामिल है। गांवों में बड़े पैमाने पर दलितों पर हिंसात्मक हमले हो रहे हैं। नियम-कानूनों को ऐसे तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है कि जिससे अपरकॉस्ट को अधिक से अधिक फायदा पहुंचाया जा सके। अपरकॉस्ट इतना ताकतवर हो गया है कि सामाजिक न्याय के लिए जरूरी जातिवार जनगणना तक नहीं होने दे रहा है।

3- आरएसएस-भाजपा के समर्थन और सहयोग से भारतीय कार्पोरेट इतना ताकतवर हो गया है कि मजदूरों, किसानों, छोटे व्यापारियों-कारोबारियों और आदिवासियों को तबाह करने पर उतारू है, इस प्रक्रिया में आम जनता के बड़े हिस्से को कंगाल और बेरोजगार बना रहा है और देश के प्राकृतिक और सार्वजनिक संसाधनों पर कब्जा कर रहा है।

4-  राष्ट्रवाद को हिंदू राष्ट्रवाद में तब्दील कर दिया गया है और उसका अर्थ मुसलमानों के खिलाफ घृणा और पाकिस्तान और कश्मीरियों के खिलाफ नफरत तक सीमित कर दिया गया है। हिंदुत्ववादी होना राष्ट्रवादी होने का पर्याय बना दिया गया है।

5- भारतीय इतिहास की सबसे बर्बर, प्रतिक्रियावादी और पतनशील वैदिक-सनातनी (हिंदूवादी) विचारधारा और संगठनों (आरएसएस-भाजपा) का पूंजीवाद की सबसे बर्बर, प्रतिक्रियावादी और पतनशील विचारधारा (कार्पोरेट विचारधारा) के साथ पूरी तरह मेल हो गया है। कार्पोरेट आरएसएस-भाजपा को फलने-फूलने के लिए अकूत धन और मीडिया मुहैया करा रहे हैं और उसके बदले में भाजपा ने कार्पोरेट को देश को लूटने की खुली छूट दे रखी है। मनुष्य विरोधी दो बर्बर शक्तियों का मेल हो गया है।

6- आरएसएस-भाजपा की विचारधारा और नीतियों का विरोध करने वाले स्वतंत्र चेता बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और नागरिकों को देशद्रोहियों की श्रेणी में डाला जा रहा है और कइयों को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया है।

7- भारतीय संविधान और लोकतंत्र गंभीर खतरे में हैं। जिन संवैधानिक संस्थाओं पर लोकतंत्र टिका हुआ है, वे एक-एक करके आरएसएस-भाजपा के हाथ का खिलौना बनती जा रही हैं। संसद रबर स्टैंप बन गई है और न्यायपालिका अधिकांश निर्णायक मामलों पर चुप्पी साधे हुए है। चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया (कार्पोरेट मीडिया) तो बर्बरता का सबसे बड़ा प्रचारक बन गई।

8- लोकतंत्र के प्रहरी कहे जाने वाले बहुलांश विपक्षी राजनीतिक दल विचारधारात्मक तौर पर कमोवेश भाजपा के सामने समर्पण कर चुके हैं। भाजपा ने पूरे चुनावी राजनीतिक मैदान को इतना हिंदुत्वादी बना दिया है कि कोई भी राजनीतिक दल खुलकर धार्मिक अल्पसंख्यकों (मुसलमानों-ईसाईयों) के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है। अल्पसंख्यकों को उनके भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया है, सभी विपक्षी दल बहुसंख्यकवादी हिंदुत्वादी राजनीति की तरफ झुके गए हैं। कोई भी हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद को खुली चुनौती नहीं दे रहा है। तमिलनाडु जैसे अपवादों को छोड़कर दलित-पिछड़ों की कही जाने वाली बहुलांश पार्टियां, अपरकॉस्ट को खुश करने में लगी हुई हैं, जिसके चलते दलितों-पिछड़ों के निर्णायक मुद्दों पर वे या तो चुप हैं या बहुत ही धीमे स्वर में बात करती हैं। उनके भीतर दलित-पिछड़ों के निर्णायक मुद्दों पर कोई बड़ा जनांदोलन खड़ा करने का मद्दा नहीं है। देश में कोई भी ऐसी प्रभावशाली पार्टी नहीं है, जो वैकल्पिक एजेंडों के साथ भाजपा को चुनौती दे रही हो।

ऐसे समय में एक सचेत नागरिक और बुद्धिजीवी के रूप में हमारी भूमिका क्या है, क्या हम चुनावी राजनीति में भाजपा विरोधी इस या उस पार्टी को जिताने के लिए माहौल बनाने तक खुद को सीमित रखें या खुलकर मुद्दों पर स्टैंड लें।

हमारे निम्न कार्यभार बनते हैं-

1- हमें आक्रामक और हमलावर हिंदुत्व के इस दौर में खुलकर मुसलमानों-ईसाईयों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ खड़े होना चाहिए और इसके लिए बड़े पैमाने पर जन गोलबंदी करनी चाहिए।

2- अपरकॉस्ट वर्चस्व और प्रभुत्व के हर रूप का विरोध करते हुए हमें दलित-पिछड़ों के साथ खड़ा होना चाहिए और उनके साथ होने वाले अन्याय के हर रूप का प्रतिरोध एवं प्रतिवाद करना चाहिए तथा उनके हर संघर्ष में उनका साथ देना चाहिए।

3- कार्पोरेट के खिलाफ किसानों-मजदूरों और आदिवासियों के हर संघर्ष में हमें सक्रिय हिस्सेदारी करनी चाहिए, जैसा कि किसान आंदोलन में काफी हद तक बौद्धिक समाज ने किया।

4- कश्मीरियों के साथ होने वाले हर अन्याय का हमें पुरजोर तरीके से प्रतिवाद करना चाहिए। इस मुद्दे पर भी चुप्पी नहीं लगानी चाहिए।

बुद्धिजीवी वर्ग को इस या उस पार्टी का पिछलग्गू बनने की जगह सुकरात, वाल्तेयर और पेरियार, भगत सिंह, राहुल सांकृत्यायन और आंबेडकर की भाषा में सच को सामने रखने और उसके पक्ष में संघर्ष करने की जरूरत है।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं। और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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