अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फ़िच ने भी कह दिया- संकट से उबरने में अक्षम है निर्मला का पैकेज

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अभी तक देश में कांग्रेस सहित विपक्षी दल ही मोदी सरकार के 20.97 लाख करोड़ रुपए के पैकेज पर जीडीपी के 10 फीसद होने पर सवाल उठा रहे थे, लेकिन अब तो अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने भी इसकी सफलता पर सवाल उठा दिया है और कहा है कि आत्मनिर्भर भारत पैकेज देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का सिर्फ एक फीसद ही है। कोविड-19 महामारी की वजह से पूरी तरह डगमगा चुकी देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए मोदी सरकार ने 20.97 लाख करोड़ रुपए का पैकेज दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस पैकेज का ब्रेकअप भी दे चुकी हैं। लेकिन रेटिंग एजेंसी फिच ने कहा है कि देश को संकट से उबारने में ये पैकेज सक्षम नहीं है। सरकार का कहना है कि ये पैकेज देश की जीडीपी का 10 फीसदी है।

यूके की एजेंसी फिच सॉल्यूशंस ने कहा है कि कोरोना राहत पैकेज की करीब आधी राशि राजकोषीय कदमों से जुड़ी है। इसकी घोषणा पहले ही की जा चुकी थी। इसमें भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक राहत वाली घोषणाओं के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले अनुमान को भी जोड़ लिया गया। फिच के मुताबिक कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन से भारत की अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ रहा है। साथ ही, घरेलू और वैश्विक दोनों मांग कमजोर हो रही हैं।

फिच ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था को कोरोना के संकट से उबारने के लिए सरकार को और अधिक रकम खर्च करने की जरूरत है, लेकिन इससे राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक 13 से 17 मई के बीच की गई घोषणाओं में मोदी सरकार ने ऋण गारंटी, ऋण चुकाने की अवधि में विस्तार आदि के साथ नियामकीय सुधार किए हैं। एजेंसी के मुताबिक सरकार के राहत पैकेज में जितनी देरी होगी, अर्थव्यवस्था के गिरने का खतरा उतना बढ़ जाएगा।

गौरतलब है कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए लगातार चार दिनों तक कई योजनाओं की घोषणा की है। इस दौरान वह लगातार कहती रहीं कि इन योजनाओं का मकसद प्रधानमंत्री के सपनों का नया ‘आत्मनिर्भर’ भारत बनाना है। लेकिन कोरोना महामारी से लड़ने और अर्थव्यवस्था को उबारने के नाम पर इन नीतिगत घोषणाओं ने किसानों, कर्मचारियों, और कामग़ारों पर अमीरों के हितों के लिए कड़ा वार किया जा रहा है। ट्रेड यूनियनों, किसानों और कृषिगत कार्य में लगे कामग़ारों के संगठनों, प्रगतिशील लोगों, समूहों और जनआंदोलनों ने इनकी तीखी आलोचना की है। लॉकडाउन के बावजूद पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे हैं। ‘सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) के साथ 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने 22 मई से दो दिन का विरोध-प्रदर्शन करने का ऐलान किया है।

कोरोना महामारी से लड़ने और सिकुड़ती अर्थव्यवस्था को उबारने के नाम पर नरेंद्र मोदी सरकार ने खुलकर अमीरों के पक्ष में घोषणाएं की हैं। इस तरह गरीबों पर जंग का ऐलान कर दिया गया है। 15 मई को सिलसिलेवार ढंग से जारी घोषणाओं से कृषि उत्पादों के व्यापार की पूरी व्यवस्था बदल दी गई। मुख्य खाद्यान्न फ़सलों की कीमतों का निर्धारण अब तक कानून से होता आया है। क्योंकि विकट गरीब़ आबादी वाले भारत जैसे बड़े देश में जरूरी अनाजों और दूसरे उत्पादों की कीमतें तय करने का अधिकार व्यापारियों के हाथ में नहीं छोड़ा जा सकता। वह लोग कीमतों के साथ खिलवाड़ कर लोगों के दुख और भूख से अपना फायदा बनाने पर आमादा हो जाएंगे। बल्कि अब भी वो ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं। इसलिए कीमतों की सीमा निर्धारित की गई थी। यह भी तय था कि कोई व्यापारी कितना माल इकट्ठा कर सकता है। पर अब यह सब खत्म हो गया।

इन कदमों को किसानों को आज़ाद करने वाला बताया जा रहा है, पर इन योजनाओं से सभी के लिए खुली छूट हो जाएगी, जिसमें बड़े व्यापारी बाज़ार पर एकाधिकार कर लेंगे और आखिरकार यही व्यापारी कीमतों और आपूर्ति को तय करेंगे। भारी जेबों वाले लोग और संस्थाएं, स्थानीय व्यापारियों को कुचल देंगी। किसानों के हित बलि चढ़ जाएंगे। इन बड़े व्यापारियों और एकाधिकार करने वाली संस्थाओं में विदेशी कंपनियां भी शामिल होंगी। जिस नए ढांचे का सुझाव दिया गया है, दरअसल वो बड़े निजी खिलाड़ियों को कृषि उत्पादों में बेइंतहां फायदा देने वाले प्रबंध हैं। बेहतर वितरण केंद्र, E-मार्केटिंग और ज़्यादा बेहतर पहुंच से इनकी लॉबी को ही फ़ायदा मिलेगा।

जो किसान अपनी फ़सलों को उचित मूल्य पर बेचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो अपने खर्च से सिर्फ़ 50 फ़ीसदी ज़्यादा का समर्थन मूल्य मांग रहे हैं, उन्हें अब अपनी फ़सल बेचने के लिए बड़े व्यापारी का इंतज़ार करना होगा, जो उनकी खड़ी फ़सल खरीदेगा। यह व्यापारी उन्हें अग्रिम और छूट का लालच देंगे, जिससे किसान अपने उत्पाद के लिए दूरदृष्टि नहीं बना पाएगा। तमाम भ्रष्टाचार और खामियों के बावजूद, अब किसानों के पास एक तय बाज़ार की उपलब्धता नहीं होगी। क्योंकि सरकार ने इससे संबंधित नियम को बदल दिया है। अब नया कानूनी ढांचा लाया गया है।

दरअसल इन कदमों से कृषि-वस्तुओं का क्षेत्र मुक्त बाज़ार व्यवस्था के लिए खुल जाएगा। इसे भविष्य में वैश्विक बाज़ारों से जोड़ दिया जाएगा। भारतीय किसानों को अपने अनाज़ को वैश्विक व्यापारियों को उनकी शर्तों पर बेचना होगा। भारत में लोगों के पास अब पर्याप्त अनाज भंडार की सुरक्षा नहीं रहेगी। पिछले दो महीनों में इन्हीं भंडारों से लाखों जिंदगियां बचाई गई हैं। एक बार जब पूरी व्यवस्था का निजीकरण हो जाएगा, तो केवल निजी कंपनियां ही भंडारण कर पाएंगी। अगर ऐसा नहीं होगा, तो भारत को अनाज़ बाहर से आयात करना होगा, जैसा पचास साल पहले किया गया था।

अप्रैल के अंत तक 14 करोड़ कामग़ारों और कर्मचारियों की नौकरियां जा चुकी हैं, लेकिन मोदी सरकार ने इनकी मदद के लिए कुछ नहीं किया। बल्कि ज़्यादातर श्रम कानूनों को एक बेहद तनाव वाले वक़्त में थोपा गया है। पूरी श्रम शक्ति का 27 फ़ीसदी हिस्सा बेरोज़गार है, इसे बढ़ने के लिए प्रश्रय दिया गया। क्योंकि ऐसा होने से वेतन में कमी आती है। इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि लाखों लोग सिर्फ़ अपने जिंदा रहने और किसी तरह गुजारा चलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। प्रोत्साहन पैकेज में महज़ कुछ किलो अनाज़ और चंद रुपयों की मदद देने की व्यवस्था की गई, जो ऊंट के मुंह में जीरा है। इसलिए इस पैकेज की नीतियां कामग़ारों और बेरोज़गारों को 21 वीं सदी में गुलाम बनाने पर आमादा हैं, जो उदास तो है, लेकिन उसने आत्मसमर्पण और बंधुआ होने से इंकार कर दिया है।

सरकार इस महामारी का इस्तेमाल बड़े उद्यमियों, व्यापारियों और विदेशी हितों की पकड़ मजबूत करवाने के लिए कर रही है। इससे मोदी का सामाजिक समर्थन भी खोखला हो रहा है। कोरोना महामारी के आने वाले दिनों में यह ज़्यादा साफ़ होता नज़र आएगा। दरअसल नवउपनिवेशवाद शोषित को इस तरह प्रशिक्षित कर देता है कि वह स्वयं को शोषित मानने से इनकार कर देता है और छोटी-छोटी परितुष्टियों की भूल भुलैया में उलझकर हमेशा इस मिथ्या विश्वास से ग्रस्त रहता है कि यह व्यवस्था उसे नौकर से मालिक बनाने की असीमित संभावनाएं स्वयं में समेटे है।

इस पैकेज का एक बड़ा भाग बजट में किए गए प्रावधानों की पुनर्प्रस्तुति है। जो नीति संबंधी फैसले लिए गए हैं, उनमें निजीकरण को सभी समस्याओं का हल मानने की धारणा केंद्र में है। पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स को उस कॉरपोरेट सेक्टर के हवाले किया जा रहा है जिसकी स्थिति 10-15 बड़े घरानों को छोड़कर खुद खस्ताहाल है। वास्तव में अपने चहेते पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने का यह खेल है। नाओमी क्लेन ने बहुत विस्तार से यह सिद्ध किया है कि सरकारें आपात स्थितियों का उपयोग अपने कॉरपोरेट एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए करती हैं और जनता में व्याप्त अस्थिरता और भय का लाभ उठाकर ऐसे आर्थिक परिवर्तन करती हैं जिनका सामान्य दशाओं में घोर विरोध होता। हमारे देश में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। सरकार जिस वर्ग के लिए काम कर रही है वह स्पष्ट है। सरकार द्वारा इसे छिपाने का कोई विशेष प्रयत्न भी नहीं हो रहा है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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