Friday, December 2, 2022

‘धर्म का गुड़गोबर करना है सारी चीजों में उसका घुसाया जाना’

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3 जुलाई को महक रेस्टोरेंट संचालक तालिब हुसैन को यूपी के संभल से पुलिस ने सिर्फ़ इस बिना पर गिरफ़्तार कर लिया कि वो जिन अख़बारों पर नॉनवेज खाद्य पदार्थ पैक करके ग्राहकों को दे रहा था उसमें देवी-देवता छपे थे। तालिब हुसैन के ख़िलाफ़ भारतीय दंड विधान की धारा 153 ‘अ’ (वैमनस्य फैलाना), 295 ए (किसी वर्ग के धर्म का अपमान करने के आशय से उपासना के स्थल को क्षति पहुंचाना या अपवित्र करना), 353 (सरकारी काम में बाधा डालना) और 307 (हत्या का प्रयास) के तहत मुकदमा दर्ज़ किया गया है। चूंकि केवल देवी-देवता छपे अख़बारों में मांसाहारी खाद्य बेंचने के मामले में कोई खास आपराधिक धारा नहीं बनती थी तो यूपी पुलिस ने एक किस्सा गढ़ लिया।

पुलिस अधीक्षक चक्रेश मिश्रा ने वरिष्ठ उप निरीक्षक अजय कुमार द्वारा दर्ज़ कराई गई रिपोर्ट के हवाले से सोमवार 4 जुलाई को प्रेस कान्फ्रेंस में बताया कि संभल कोतवाली क्षेत्र में तालिब हुसैन नामक व्यक्ति अपने होटल पर देवी-देवताओं के चित्र वाले काग़जों पर चिकन रखकर बेच रहा था। कुछ लोगों ने इसकी शिकायत की थी, जिस पर पुलिस की एक टीम मौके पर पहुंची थी। आरोप है कि तफ्तीश के दौरान तालिब ने पुलिस दल पर चाकू से हमला किया। और घटना स्थल से देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले अखबार की प्रतियां तथा हमले में इस्तेमाल चाकू बरामदी दिखाई गयी।

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क्या वाकई में तालिब हुसैन गुनाहगार है। आखिर जन सामान्य इस पर क्या सोचता है। गौरतलब है कि नवरात्रियों के अलावा तमाम त्योहारों और तिथियों पर देवी देवताओं की फोटो अख़बारों में छपते हैं। साथ ही आध्यात्मिक पेजों और अध्यात्म के साप्ताहिक पन्नों पर भी देवी-देवताओं की तस्वीरें छपती हैं। इसके अलावा रोज़ाना होने वाले जगरातों, चौकियों, भागवत, अखंड रामायण पाठ आदि से संबंधित रिपोर्ट्स में भी देवी देवताओं के चित्र छपते हैं। तमाम उत्पादों और निजी कंपनियों द्वारा नये साल पर कैलेंडर भी छपवाकर बाँटा जाता है जिसमें देवी देवताओं का चित्र छपा होता होता है। इसके अलावा तंबाकू, गुटखा, ख़ैनी, बीड़ी आदि के पैकेट बंडल पर भी देवी देवताओं के चित्र छपे होते हैं।

नैनी इलाहाबाद की आभा देवी गांव देहात में बिसात-खाना की दुकान चलाती हैं। उनके रेलवे से रिटायर्ड ससुर अख़बारों के शौकीन हैं। तो अख़बार लगवा रखा है। हॉकर देर शाम अख़बार लेकर आता है। उन्होंने हॉकर को कई बार टोका है कि ये कोई पेपर देने का समय है लेकिन वो कहता है कि शहर में बांटकर गांव में पेपर लेकर आता हूं। आभा देवी कहती हैं कि एक बार नाराज होकर ससुर जी अख़बार बंद भी करवा रहे थे लेकिन उन्हें बिसाती सामानों को पैक करने के लिये रद्दी अख़बारों की ज़रूरत पड़ती है। मैंने जब उनसे पूछा कि क्या वो अख़बारों में देवी देवताओं के चित्र वाले अखबार बराती हैं लपेटने में या लपेट देती हैं। वो कहती हैं इतना समय नहीं होता है। न छांटने का न सोचने का। और निकाल भी लूँ तो मैं उसका करूंगी क्या?

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देवी देवताओं के चित्रों के संदर्भ में ट्रांसपोर्टर संजय बताते हैं कि ट्रांसपोर्ट नगर कानपुर में कई ट्रासपोर्ट ऑफ़िस हैं। वो बताते हैं के पहले एक गणेश खैनी आती थी उस पर गणेश जी की फोटो छपी होती थी। ट्रक ड्राईवर खलासी आदि खैनी खाते और पैकेट वहीं फेंक देते। और वहीं सब पेशाब करते। संजय कहते हैं कि मेरी नज़र कई बार ऐसे खैनी के पैकेट्स पर पड़ी बिल्कुल मूत्र से भीगी हुई। तो मूत्र से भीगे उन पैकेटों का आपने क्या किया। इस सवाल पर संजय कहते हैं आस्था अपनी जगह है, हो सकता है कि नज़र पड़ने पर मैं वहां पैकेट पर पेशाब न करूं। लेकिन मैं उसे अपने हाथ से उठाकर कहीं और तो नहीं रख सकता ना।

लाई, मुरमुरे, चना, मटर, मूंगफली आदि भूनकर बेंचने वाले रद्दी अख़बार में ही बेंचते हैं। सड़क किनारे मुरमुरे का ठेला लगाने वाले सचिन धुरिया रद्दी अख़बार ख़रीदते हैं। फिर उसे काटकर उसमें मुरमुरे बेंचते हैं। मैंने पूछा क्या काटते या मुरमुरा परोसते वक़्त आप इस बात का ख्याल रखते हैं कि अख़बार में देवी देवता छपे हैं तो उनको बचाया जाये। उन्होंने कहा नहीं। गांव देहात में दुकानदार समोसा, पकौड़ी आदि अख़बार में ही परोसते हैं। सबसे ज़्यादा रद्दी अख़बारों का इस्तेमाल फलों में होता है। फल वाले इन रद्दी अख़बारों को फल बेंचने के बाद जहां तहां फेंक देते हैं। जिन्हें नगर निगम के सफाई कर्मी उठाकर गंदे स्थानों पर ले जाकर डंप कर देते हैं। उनके साथ वो देवी देवता भी डंप होने को बाध्य होते हैं जो अख़बारों में छपे होते हैं। 

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जौनपुर जिले की मसौली गांव की पूजा पिछले साल मां बनी हैं। पूजा के यहां शौचालय नहीं है, वो अख़बार फैलाकर उस पर अपनी नन्हीं बिटिया को पॉटी कराती हैं और फिर उसे लपेटकर फेंक आती हैं। पूजा बताती हैं कि ऐसा वो अपने गांव-जवार और परिवार की तमाम स्त्रियों को करते देखती आई हैं। वहीं गांव की कई स्त्रियों का कहना है कि जब उनके बच्चे ज़मीन पर पॉटी कर देते हैं तो उसे खुरपे से खोदकर अख़बार या पॉलीथीन में भरकर फेंक आती हैं। मैंने पूछा क्या सबके यहां अख़बार आता है। अधिकांश ने कहा कि नहीं उनके यहां अख़बार नहीं आता। लेकिन जिनके यहां आता है उनसे दो-चार दिन का अख़बार मांग लेती हैं। कुछ अख़बार सर-सामान के साथ आ जाता है तो उसका इस्तेमाल कर लेती हैं। 

एक इंटरमीडिएट कॉलेज से प्रिंसिपल के पद से रिटायर पन्ना लाल शर्मा इसे उत्पादन की अतिरेकता से उपजा संकट बताते हैं। वो कहते हैं आप एक भिखारी को देखते हैं तो आपके अंदर करुणा का संचार होता है आप उसे कुछ रुपये दे देते हैं। लेकिन इसके बाद जब दूसरा, तीसरा, चौथा भिखारी मिलता है तब आपकी करुणा और दया कम होती जाती है। बहुत सारे भिखारी देखने के बाद आप वहां से भाग खड़े होते हैं। ऐसे ही एक मंदिर देखते हैं तो श्रद्धा से सिर नवा लेते हैं।

लेकिन यदि एक किलोमीटर तक कतार से मंदिर ही मंदिर खड़े हों तो आप कितनी बार सिर नवाएंगे। प्रिंटिंग मशीनों ने देवी देवताओं का अधिकाधिक उत्पादन कर दिया है। इसलिये कोई भी धार्मिक से धार्मिक व्यक्ति अख़बारों में छपे देवी देवताओं को सिर नहीं नवाता है। न ही उन्हें धूप दीप अगरबत्ती दिखाता है। पन्ना लाल शर्मा जी आगे कहते हैं कि अख़बारों में छपे देवी देवताओं की वही गति होती है जो अख़बारों की होती है। ताजा अख़बार है तो संभाल कर रख दिया। तारीख बदलते ही वह रद्दी में तब्दील हो जाता है। फिर तो जो रद्दी अख़बार की गति होती वही उसमें छपे देवी देवताओं की भी होगी। इसके लिये बहुत रार मचाने की ज़रूरत नहीं है।

इस घटना पर लगभग खीझते हुये कहते हैं हद है भाई। इतना ही चिंता है तो एक फरमान क्यों नहीं ज़ारी कर देते कि कोई भी अख़बार देवी देवाताओं के चित्र नहीं छापे। कंपनियां देवी देवताओं के कैलेंडर नहीं छापें। और जय श्री राम का शोर मचाने वाले राम के चित्र झंडों और पोस्टरों में न छापें क्योंकि वो सब भी नालियों और सीवरों में ही इतिश्री कर दी जाती हैं।

स्नातक छात्र गौरव अपने गुस्से का इजहार करते हुए कहते हैं कि जिन लोगों ने तैयब हुसैन के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज़ करवाई है पहले तो उन्हें पकड़कर उनको पीटा जाना चाहिए। और फिर उनसे पूछा जाना चाहिये कि तुम अपने यहां आने वाले अख़बारों में छपे देवी देवताओं का क्या करते हो। क्या उन्हें अख़बारों के साथ रद्दी के भाव में नहीं बेंचते। अगर तुमने रद्दी के भाव उन्हें बेंच दिया तो दूसरा उनमें समोसा चटनी रखकर खाये या चिकेन तुम कौन होते हो उन्हें क़ानून सिखाने वाले।   

हाल ही में चंडीगढ़ से रेलगाड़ी में सफ़र करके घर आये क्रिकेटर सचिन यादव अपने ताजा अनुभव को साझा करते हुए बताते हैं कि रेलवे स्टेशनों पर, रेलगाड़ियों में, सरकारी अस्पतालों में रोज़ाना हजारों लोग अख़बार बिछाकर सोते हैं। और फिर उसे वैसे ही छोड़कर चलते बनते हैं। दूसरे लोग उसे पांव से कुचलते आगे बढ़ जाते हैं वो नहीं ध्यान देते कि उनमें देवी देवता छपे हैं या कि क्या छपा है। ये लोग व्यवहारिक चीजों में धर्म घुसाकर सारा गुड़ गोबर कर रहे हैं।

(प्रयागराज से सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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