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Categories: बीच बहस

योगी जी, बेवजूद हो जाती हैं जनता की जरूरतों की राह में रोड़ा बनने वाली सरकारें!

लॉकडाउन प्रबंधन सरकार की प्रशासनिक अक्षमता का द्योतक है। सरकार की यह सबसे बड़ी तीसरी प्रशासनिक अक्षमता है। पहली 2016 की नोटबन्दी, दूसरी 2017 के जीएसटी का क्रियान्वयन, और तीसरी यह लॉक डाउन। यही कारण है कि जगह-जगह लॉक डाउन का उल्लंघन हुआ, लोग सड़कों पर आए। सरकार ने कहा कि उनकी कंपनियां इन मज़दूरों को रहने खाने की व्यवस्था करेंगी। कुछ कंपनियों ने किया कुछ ने यह भी नहीं किया। सरकार ने कहा कोई तनख्वाह नहीं काटेगा। सरकार ने खुद ही तनख्वाहें कम करने का एलान कर दिया। कम्पनियों ने अदालत का रास्ता पकड़ा।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की कि, उन्हें भी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है अतः उन्हें सबको वेतन न देने की छूट बंदी के दिनों की न देने की सरकार के निर्देश से राहत दी जाय। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली और सरकार को कुछ समय अपना पक्ष रखने का अवसर दिया। इसी बीच सरकार ने लॉक डाउन चतुर्थ की घोषणा कर दी और अपना वह आदेश कि सभी मज़दूरों को कंपनियां वेतन देंगी खुद ही वापस ले लिया। अब इस याचिका का कोई अर्थ नहीं रहा।

यह भी एक राजनैतिक निर्णय था। पहले मज़दूरों के पक्ष में उनको वेतन के मामले में निर्णय लेकर मज़दूरों का हितैषी बनने की अभिलाषा थी तो दूसरे में उद्योगपतियों के पक्ष में खड़ा दिखना था, जो कि गोपनीय इलेक्टोरल बांड के स्वास्थ्य के लिये आवश्यक था।

अब सभी मज़दूर अपने अपने घर जाने के लिये महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, पंजाब, कर्नाटक आदि उद्योग सम्पन्न राज्यों से निकल पड़े। गुजरात, महाराष्ट्र कर्नाटक आदि ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उनका तर्क यह था कि अगर कल लॉक डाउन खुल गया तो फिर उद्योग धंधे कैसे चलेंगे ? मज़दूर कहाँ से आएंगे ? अगर मज़दूर यूपी, बिहार, एमपी, झारखंड अपने घर पहुंच गए तो, फिर उन्हें जल्दी नहीं लाया जा सकेगा । यह सारी आशंकाएं निर्मूल भी नहीं थी। पर कुछ तो बीमारी का डर, कुछ घर जल्दी से जल्दी पहुंचने की इच्छा, कुछ अर्थाभाव और कुछ सरकार और कंपनियों की बदइंतजामी से मज़दूर उचट गए और जिसे जो साधन मिला वह अपने अपने घर की ओर चल पड़ा।

यह खबर अखबारों और सोशल मीडिया पर तो खूब आ रही थी पर कुछ टीवी चैनलों से गायब थी। अचानक एक रेल दुर्घटना में मालगाड़ी से कट कर 16 मज़दूर जब मर गए तो इस पलायन पर देश भर में शोर मचा और आक्रोश भी बढ़ा। तब सरकार ने कुछ रेलें चलाने का फैसला किया। इस पर इस आपदा में नफा नुकसान देखा जाने लगा। रेलवे का कहना था कि वह 85 % किराया वहन करेगी और राज्य सरकारें 15 %। कांग्रेस ने भी कुछ किराया अदा करने की बात कही। बहरहाल काफी तू तू मैं मैं के बाद कुछ ट्रेनें चली और प्रवासी कामगार अपने घरों की ओर आये भी।

इसी बीच उत्तर प्रदेश में औरैया जिले मे एक भीषण सड़क दुर्घटना में 26 मज़दूरों की मृत्यु हो जाती है और सरकार ने यह आदेश दिया कि असुरक्षित वाहन से कोई यात्रा नहीं करेगा। जगह जगह मज़दूरों की भीड़ लग गयी। 16 मई को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा कि कांग्रेस की तरफ से 1000 बसें आगरा में यूपी सीमा पर हैं, उनसे मज़दूरों को उनके घरों में भेजने के लिये यूपी सरकार अनुमति दे।

18 मई को यूपी सरकार ने कांग्रेस महासचिव को उन बसों का ब्योरा देने को कहा। प्रियंका गांधी के सचिव ने सभी बसों का ब्योरा दिया और जो सूची यूपी सरकार को दी गयी उसकी जांच यूपी सरकार ने किया और यह पाया कि इस सूची में कुछ नम्बर ऑटो और एम्बुलेंस के हैं। जो विवरण यूपी सरकार ने तैयार किया है उसके अनुसार, कुल बसों की संख्या, 879 और शेष अन्य हैं। शेष अन्य क्यों हैं इसकी जानकारी सरकार कांग्रेस महासचिव से पूछ सकती थी। अब खबर आ रही है कि सरकार ने उन सभी वाहनों के फिटनेस सर्टिफिकेट तलब किये हैं। यह खबर अभी मेरे पास नहीं है कि फिटनेस सबके दुरुस्त हैं या नहीं हैं।

प्रियंका गांधी के सचिव संदीप सिंह ने जो पत्र उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव को पत्र लिखा उसका यह अंश पढ़े,
“आप वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं। बहुत अनुभवी हैं और कोरोना महामारी के इस भयानक संकट से भिज्ञ भी हैं। तमाम जगह प्रवासी मजदूर फंसे हुए हैं। मीडिया के माध्यम से इनकी विकट स्थिति सबके सामने है। हजारों मजदूर सड़कों पर हैं। हजारों की भीड़ पंजीकरण केंद्रों पर उमड़ी हुई है। ऐसे में 1 हज़ार खाली बसों को लखनऊ भेजना न सिर्फ़ समय और संसाधन की बर्बादी है। बल्कि हद दर्ज़े की अमानवीयता है और एक घोर गरीब विरोधी मानसिकता की उपज है। आपकी ये मांग राजनीति से प्रेरित लगती है। ऐसा लगता नहीं कि आपकी सरकार विपदा के मारे हमारे उत्तर प्रदेश के भाई बहनों की मदद करना चाहती है। हम सभी उपलब्ध बसों को चलवाने की अपनी बात पर अडिग हैं। कृपया नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करें जिनसे संपर्क स्थापित करके हम श्रमिक भाई बहनों की मदद कर सकें। “
अब इस पर यूपी सरकार को अगर बस लेनी थी तो ले लेती और अगर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की बात थी तो यह कह कर मना कर सकती थी कि सरकार के पास संसाधन की कमी नहीं है। पर सरकार उलझ गयी झूठमूठ के पत्राचार में।

इस सिलसिले में प्रियंका गांधी की ओर से लिखा गया आखिरी खत।

सरकार अगर सभी सरकारी बसों और  जीपों का फिटनेस चेक कराए तो लगभग एक तिहाई बेड़ा अनफिट पाया जाएगा । फिटनेस सर्टिफिकेट एक आदर्श स्थिति है। यूपी सरकार आगरा सीमा पर खड़ी बसों का भौतिक सत्यापन करे और उनसे इस 40 डिग्री तापमान में सड़क पर घिसट रहे मज़दूरों में से जितनों को भी हो सके, उनके गंतव्य तक पहुंचाए। जब हम ट्रक में लाद कर मज़दूरों को सैकड़ों किलोमीटर भेज रहे हैं तो जो बसें मिलें उन्हीं से वापस क्यों नहीं भेज सकते। यह तो वही हुआ कि, जब कोई बीमार किसी इमरजेंसी में एम्बुलेंस मंगाए तो सरकार को चाहिए कि उस एम्बुलेंस की आरसी, फिटनेस चेक कर के ही उसे अस्पताल में मरीज़ ले जाने दिया जाए। सड़क पर अनफिट वाहन बिल्कुल न चलें चाहे जो भी इमरजेंसी हो !

जब मज़दूर ऐसे प्रतिकूल मौसम में सड़क पर घिसट रहे हैं तो सरकार को मेरी राय में निम्न प्रशासनिक कदम उठाने चाहिए थे।
● सभी बसों का जहाँ वे खड़ी हैं भौतिक सत्यापन कराना चाहिए था।
● सभी वाहनों में रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, ( आरसी ), बीमा, प्रदूषण सर्टिफिकेट, फिटनेस सर्टिफिकेट लेकर और ड्राइवर का डीएल लेकर चलने का एक तयशुदा निर्देश है।
● सीमा पर ही ट्रांसपोर्ट विभाग और पुलिस के लोग एक-एक वाहन को चेक करते, उनके कागज़ देखते, और फिर जिलावार जो भी मज़दूर होते उन्हें उनके गंतव्य पर रवाना कर देते।
● जो बसें नहीं कोई और वाहन होते उन्हें वे वापस कर देते।
लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया।

शाम तक यूपी सरकार ने प्रियंका गांधी द्वारा भेजी गयी बसों की छानबीन की तो, पाया गया, कि प्रियंका गांधी ने जिन एक हजार बसों की बात की थी, उसमे 879 बसें थी बाकी बीमारों के लिए एम्बुलेंस और आस पास 40-50 किलोमीटर जाने वालों के लिए ऑटो और कार का भी इंतजाम था। यह जरूरी भी है क्योंकि प्रवासी मजदूरों में गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे भी हैं। यह रिपोर्ट यूपी सरकार के ही अधिकारियों ने तैयार की है। अब इसके बाद प्रियंका गांधी का एक ट्वीट और आया कि अगर यूपी सरकार इन वाहनों पर अपनी पार्टी का झंडा लगाना चाहती है तो वह लगा ले पर पहले मज़दूरों को छुड़वाए। लेकिन अभी तक स्थिति जस की तस बनी हुई है।

कहा जा रहा है कि, कांग्रेस बस के मामले में राजनीति कर रही है। यह बात सही भी हो, कि कांग्रेस बस मामले में राजनीति कर रही है, तो एक राजनीतिक दल राजनीति करेगा ही। उसका उद्देश्य ही राजनीति करना है। इसीलिए उसका गठन किया गया है। कांग्रेस राजनीतिक दल है और वह देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। अभी 6 साल पहले वह सरकार में थी और अब भी चार राज्यों में वह अपने दम पर और एक राज्य में साझेदारी से सरकार में हैं। वह दुबारा सत्ता में आना चाहती है। इसमें कोई बुरा भी नहीं है। हर दल और नेता की ख्वाहिश होती है कि वह सत्तारूढ़ बने और लंबे समय तक सत्ता में रहे। आज कांग्रेस एक विपक्षी दल है तो उसका यह संवैधानिक दायित्व है कि वह सरकार की नीतियों का तार्किक विरोध करे और सरकार को एक्सपोज़ करे।

जब कांग्रेस सत्ता में थी तो यही काम उसे अपदस्थ करने के लिये भाजपा ने किया था। यह लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है। सरकार के विरोध का एक भी मौका कांग्रेस को छोड़ना भी नहीं चाहिये। सरकार या लोकतंत्र एक राजनीतिक प्रक्रिया से चलता है। कांग्रेस ही नहीं सभी राजनीतिक दलों को अपनी अपनी सोच और एजेंडे के अनुसार राजनीति करने का हक़ है। यहां तक कि हर व्यक्ति को राजनीति में आने, अपनी बात कहने और राजनीति करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। अक्सर इस आरोप पर कि अमुक राजनीति कर रहा है वह रक्षात्मक हो जाता है और यह बचाव करने लगता है कि नहीं-नहीं यह राजनीति नहीं है। यह वाक्य भी बिल्कुल झूठ है। राजनीतिक दल और राजनेता का हर कदम राजनीति से प्रेरित होता है यहाँ तक कि जब वह अपने चुनाव क्षेत्र में लोगों के पारिवारिक आयोजनों में जाता है तब भी।

आज की सबसे बड़ी समस्या है जल्दी से जल्दी सभी प्रवासी कामगार अपने-अपने घरों में पहुंचे। क्योंकि अब अधिकतर जो सड़क पर है वे न रास्ते में रुक सकते हैं और न ही वापस जा सकते हैं। उन्हें घर पहुंचना ही है। वे अब मरने से भी नहीं डर रहे हैं। हम जैसे लोग जो घर से ओला उबर कैब या निजी वाहन के बिना इस चिलचिलाती धूप में निकलने की सोच भी नहीं सकते मज़दूरों की इस व्यथा की कल्पना नहीं कर सकते हैं। ज़रा सोचिए जो हज़ार हज़ार किलोमीटर की दूरी पैदल और तरह-तरह के साधनों चल कर घर पहुंचने का मंसूबा बांधे हों, उसे किसी भी दशा में रोका नहीं जा सकता है। उन्हें सरकार साधन दे या न दे, वे तो जाएंगे। यह बात यूपी सरकार को समझ में आ जानी चाहिए। इस पक्ष-विपक्ष की रस्साकशी में सबसे अधिक भुगत तो मज़दूर रहा है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on May 20, 2020 7:47 am

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