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‘जनता खिलौनों से खेले, देश से खेलने के लिए मैं हूं न!’

इस बार के ‘मन की बात’ में प्रधानसेवक ने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश का ध्यान आकर्षित किया है। बात इतनी महत्वपूर्ण है कि लगा यह ‘मन की बात’ नहीं ‘आत्मा की बात’ है। पता नहीं क्यों लोगों को लगता है की आत्मा की बातें वही होती हैं जो जनता के दुख-दर्द की बात हों। परीक्षा, अर्थव्यवस्था और कोरोना जैसे भारी-भरकम विषय जिसके नीचे सरकार दब गई तो आम आदमी की क्या बिसात, इसलिए आम आदमी की सेहत का ध्यान रखते हुए प्रधानसेवक ने खिलौनों की बात की।

उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में पूरी दुनिया को संबोधित करते हुए पहले खिलौनों के बारे में बताया फिर सिर्फ़ देश के भाई-बहनों को बताया कि देश में खिलौनों की कमी है? देश में खिलौनों की कितनी मांग है? वो दुनिया के पहले ऐसे प्रधानसेवक हैं जिन्होंने खिलौनों की अहमियत समझी और पहली बार राष्ट्रीय मंच से अंतरराष्ट्रीय संबोधन किया। देशवासियों को खिलौनों के बारे में समझाया कि ये समझने की जरूरत है कि देश ही नहीं दुनिया के लिए खिलौने कितने जरूरी हैं। हम प्रधानसेवक की बात से पूरी तरह सहमत हैं जो नहीं सहमत वो असहमति के परिणामों पर विचार करें।

खेलने और खिलौनों की परंपरा अंग्रेजों ने स्थापित की थी। वो पूरी दुनिया के साथ खेलते थे। इतना खेलते थे कि कभी खेल बंद ही नहीं होता था। 24 घंटे, सातों दिन, साल दर साल खेल चलता ही रहता। अंग्रेजों के खेल को देखकर दर्शक भी थोड़ा बहुत खेल सीख गए और उन्होंने भी खेलने की मांग कर डाली। उन्हें लगा हमारे देश के साथ दूसरा कोई कैसे खेल सकता है, हम खुद खेलेंगे। कुछ दशकों तक बहस, वाद-विवाद और झगड़ा चला फिर अंत में अंग्रेज खिलाड़ी बन चुके दर्शकों को खिलौना देकर अपने देश लौटने का मन बनाने लगे।

खिलौना देते समय विवाद हुआ, खिलाड़ियों के दो गुट बन गए। दोनों एक ही खिलौने से नहीं खेलना चाहते थे। दोनों अपने लिए अलग-अलग खिलौने चाहते थे। अंग्रेजों के पास एक ही खिलौना था और वह नया खिलौना नहीं ला सकते थे, इसलिए खिलौने के दो टुकड़ा कर दिए और चले गए। जाते-जाते खेल से जीती गई कितनी रकम भी उठा ले गए।

उधर दोनों गुट खुश हो टूटे खिलौनों के टुकड़ों से खेलने लगे। टूटे खिलौनों में से एक में गंभीर दरार पड़ गई थी, इसलिए वह ज्यादा दिन नहीं टिका रह सका और वो टूट गया। इस तरह से एक खिलौने से तीन खिलौने बन गए। सभी खिलाड़ी मगन होकर अपने-अपने खिलौने के टुकड़े से खेलने लगे। वैसे अंग्रेजों ने पूरी दुनिया में इसी तरह खिलौने बांटे।


प्रधानसेवक जी दुनिया के पहले ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने खिलौनों पर इतनी बात की है। खिलौना कोई ऐसी-वैसी चीज नहीं, इंसान खेल और खिलौनों की बदौलत ही तो यहां तक पहुंचा है। आग का आविष्कार हो या पहिए का सब शुरुआती आविष्कार खेल-खेल में ही तो हुए हैं, इसलिए न तो खेल को नकारा जा सकता है और न खिलौनों के महत्व को। बल्कि खेल और खिलौनों ने खिलाड़ियों का विकास किया है। कालांतर में खिलाड़ियों ने अपने हिसाब से खेल को बदल दिया। असली खिलाड़ी, खिलौना न मिलने पर किसी को भी खिलौना बना सकता है।

शायरों ने तो जाने कब से दिल को खिलौना घोषित कर रखा है। सीधी सी बात है अगर खेलने वाले को खिलौना और मैदान नहीं मिलेगा तो वो जहां जगह मिलेगी वहीं खेलेगा। ऐसे में चारों तरफ खेल ही खेल फैलता है और खिलौनों की जबरदस्त कमी हो जाती है। खेल-खेल में तो खिलौने टूटते हैं और खिलौने नहीं होंगे तो जिससे खेला जा रहा होगा वही टूट जाएगा।

खिलौने होते तो मंदिर-मस्जिद का झगड़ा ही नहीं होता, क्योंकि खेल बहुत जरूरी है और खिलाड़ी और खिलौने भी। अर्दोआन को कुछ नहीं मिला तो म्यूजियम से ही खेल गए। यही हाल भारत का भी है। लोगों को जब खेलने के लिए नहीं मिल रहा तो ईश्वर, उसके प्रतीकों, प्रतिमाओं और उनके रहन-सहन के साथ ही खेलने में जुटे हैं। अगर खिलौने पर्याप्त होते तो लोग खिलौनों से खेल लेते, कम से कम जाति धर्म को खिलौना नहीं बनना पड़ता।

ख़ैर खिलौनों की बात से याद आया कि आज चारों तरफ खिलाड़ियों की भरमार है। हर कोई कहीं न कहीं खेल ही रहा है, पर खिलौने न होने के कारण जिसे जो मिल रहा है उसे ही खिलौना बना ले रहा है। प्रधानसेवक ने बताया कि 70 साल की नाकामयाबी के कारण देश में खिलौने ख़त्म हो गए हैं। ऐसे में खिलौनों की कमी खलती है। अगर नेताओं के पास खिलौना होता तो वो कम से कम देश के साथ न खेलते। अगर खिलौने होते तो लोकतंत्र के साथ आपात-आपात नहीं खेला गया होता। प्रधानसेवक के जोड़ीदार अपने बेटे को खिलौना नहीं दिला पाए, क्योंकि खिलौनों की कमी थी। मजबूरी में उन्हें बीसीसीआई देना पड़ा। मीडिया भी खेलने में माहिर है।

मीडिया खबरों से खेलते-खेलते कब लोगों की जिंदगी और मौत से खेलने लगेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। पत्रकार खेलने में सबके उस्ताद होते हैं। देश में कई सालों से ‘जनता जानना चाहती है’, ‘भारत जानना चाहता है’ के नाम पर खेल का अभियान ही चल रहा है।

खेल अब खेल से आगे बढ़कर प्रतीक बन गया है। भारत में खिलाड़ियों की कमी न होने पाए, इसलिए समय-समय पर खेल के दंगल होते रहते हैं। जिनको टीवी चैनल वालों के अलावा कुछ लोग चुनाव कहते हैं। इस पर्व में खेलने के लिए खिलाड़ियों का चयन होता है, ताकि वो आगे जाकर बड़े खेल में हिस्सा ले सकें। खेल केवल स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं हो रहा है, बल्कि यह वैश्विक हो गया है। अब पूरी दुनिया खेल रही है। खिलौनो की कमी के कारण लोगों को परमाणु बमों से खेलना पड़ता है। हथियारों से खेलना पड़ता है। सोचिए अगर पूरी दुनिया में बंदूकों के बजाय खिलौने होते तो क्या पूरी दुनिया ऐसी होती।

दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है, जिन्हें खिलौनों की सख्त जरूरत है। पूरे खेल में अमरीका सबसे बड़ा खिलाड़ी है, वो कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित करता है, खुद भाग लेता है और जीतता है। अफगानिस्तान और इराक में अपने जैसे खिलाड़ियों को मात देने के बाद अब ईरान और उत्तर कोरिया के साथ खेलने के लिए बेकरार है। असली खिलौने दुनिया में कम हैं, इसलिए वह लड़ाकू विमान युद्धपोत लेकर खेल रहा है। वैसे कुछ लोग ऐसे भी रहे हैं, जिन्हें खेलना पसंद नहीं है। तो खिलाड़ी ही कभी-कभी दर्शकों के मनोरंजन के लिए उनका जिक्र करते रहते हैं।

भारत में गांधी जी अंग्रेजों के खेल को ठीक नहीं मानते थे। आजादी के बाद उन्होंने धर्म को खिलौना मानने से इंकार किया तो धर्म के साथ खेलने वालों ने उनके साथ ही खेल कर दिया। अब पूरी दुनिया उनके विचारों के साथ खेल रही है।

अब भला प्रधानसेवक क्यों न खिलौनों की बात करें, जब ट्रंप अमेरिका के साथ, अमेरिका परमाणु बम के साथ और परमाणु बम दुनिया के साथ खेल रहा है। कोरोना के लिए अमेरिका चीन के साथ तो डब्ल्यूएचओ करोना वैक्सीन के साथ लगातार खेल रहा है। जितने बड़े खिलाड़ी उतना बड़ा खिलौना। आख़िरकार बाल रूप में कृष्ण को भी सूरदास के मार्फ़त कहना पड़ा था ‘मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों’।

अंबानी और अडानी के लिए तो पूरा देश खिलौना है। जहां चाहें खेलें, कभी कोई रोक-टोक नहीं। इनको खेलने के लिए खिलौनों की कमी न होने पाए, इसलिए सरकार खुद कहीं पूरा खिलौना तो कहीं खिलौने में हिस्सेदारी देकर खेलने के लिए मना रही है। खेल-खेल में लोग क्या-क्या खेल गए पता ही नहीं चला। पूरे देश को पिगी बैंक बनाया और नोटबंदी-नोटबंदी खेल डाली। सरकार और आरबीआई जीडीपी के साथ खेल गईं।

सीबीआई के साथ तो लोग हमेशा से खेलते रहे हैं। सीबीआई कभी-कभी खुद खिलौना मानने से इंकार करती है तो लोग उसे पालतू तोता कहने लगते हैं। ऐसे में वह खिलौना ही बने रहने में सुरक्षित महसूस करती है। सरकार बेरोज़गारों के साथ और बेरोज़गार सोशल मीडिया के साथ लगातार खेल रहे हैं। कुलपति विश्वविद्यालयों के साथ, प्रोफेसर विद्यार्थियों के साथ और विद्यार्थी डिग्रियों के साथ खेल रहे हैं।

बहुत बढ़िया खेल चल रहा है। लोग तो बस खेलेंगे, क्योंकि खेलना पहली ज़रूरत है। सरकार ने तो खेलो इंडिया प्रोग्राम ही चला दिया। जो पैसा दे वो इंडिया के साथ खेल सकता है। बहुत सफल प्रोग्राम रहा है अब बचे-खुचे विपक्षी सोच रहे हैं कि जब वो सत्ता में होते हैं तो उन्हें ऐसा विचार क्यों नहीं आता? वो क्यों कम सोच पाए कि खेल-खेल में क्या-क्या खेला जा सकता है? बहरहाल देर हुई है अंधेर नहीं फ़क़ीर से खेल खेलना सीख लीजिए।

  • संदीप दुबे

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया स्कॉलर हैं।)

This post was last modified on September 25, 2020 12:57 pm

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi