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Thursday, September 23, 2021

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बाइडेन ने ही किया था मोदी के वीजा बहाली संबंधी कई सिफारिशों को खारिज

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नरेंद्र मोदी कार्यकाल-2 भारत में मानवाधिकारों के हनन का काल साबित हुआ है। फिर चाहे वो असम एनआरसी से 19 लाख लोगों की नागरिकता छीनना रहा हो, चाहे जम्मू-कश्मीर की पहचान छीनने के लिए डेढ़ साल तक कश्मीरी लोगों को कैदी बनाकर रखना हो, या सीएए कानून के जरिए मुस्लिम समुदाय को टारगेट करना, या दिल्ली में जनसंहार का मसला। यही नहीं दलित, आदिवासी, मुस्लिम समुदाय के मानवाधिकारों को लेकर आवाज़ उठाने वाले तमाम लोगों को सलाखों के पीछे धकेल दिया गया। 10 सितंबर को एमनेस्टी इंटरनेशल इंडिया के सारे बैंक खातों को गृह मंत्रालय के इशारे पर ईडी ने फ़्रीज़ कर दिया, जिससे मानवाधिकार संस्था के अधिकतर काम ठप हो गए और अक्तूबर जाते-जाते अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत में अपना काम बंद करने की घोषणा कर दी।

एमनेस्टी ने एक बयान में अपना काम बंद करने के लिए ‘सरकार की बदले की कार्रवाई’ को ज़िम्मेदार बताया और कहा, “हमें सरकार की ओर से एक व्यवस्थित तरीक़े से लगातार हमलों, दादागिरी और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और ये केवल इसलिए हो रहा है, क्योंकि हम मानवाधिकार से जुड़े काम कर रहे हैं और सरकार हमारे उठाए सवालों का जवाब नहीं देना चाह रही है, फिर चाहे वो दिल्ली दंगों को लेकर हमारी पड़ताल हो या जम्मू-कश्मीर में लोगों की आवाज़ों को ख़ामोश करने का मामला।”

ऊपर ये भूमिका सिर्फ़ इसलिए क्योंकि जिस अमेरिका के दम पर अब तक भारत सरकार उछल रही थी, उसकी सत्ता अब उस जो बाइडेन के हाथ में आ गई है जो खुद मानवाधिकारों के हनन पर लगातार मोदी सरकार की आलोचना करते आए हैं। दक्षिणपंथी डोनाल्ड ट्रंप की विदाई और जो बाइडेन के सत्तासीन होने के साथ ही दुनिया भर के मानवाधिकार विरोधी दक्षिणपंथियों में हताशा और अवसाद है।

बावजूद इसके शनिवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को मुबारकबाद दी और साथ मिलकर अमेरिका-भारत के रिश्तों को नई ऊंचाई प्रदान करने की इच्छा जाहिर की। जो बाइडेन को संबोधित अपने ट्वीट में नरेंद्र मोदी ने लिखा, “उपराष्ट्रपति के रूप में, भारत-यूएस रिश्ते को मजबूत करने में आपके योगदान महत्वपूर्ण और अमूल्य थे। मैं भारत-यूएस संबंधों को नई ऊंचाई प्रदान करने के लिए एक बार फिर से एक साथ मिलकर काम करने के लिए उत्सुक हूं।”

मोदी सरकार द्वारा मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ़ लगातार आवाज़ उठाते रहे बाइडेन
जो बाइडेन लगातार नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार हनन के खिलाफ़ आवाज़ उठाते रहे हैं। CAA-NRC के खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन के बीच जो बाइडेन ने टिप्पणी करते हुए कहा था, “भारत का मूल लोकतांत्रिक और सेक्युलेरिज्म का रहा है, ऐसे में ताजा कानून इनसे मेल नहीं खाता है।”

वहीं सीएए-एनआरसी और जम्मू-कश्मीर के मसले पर जो बाइडेन की कैंपेन टीम ने उनकी ओर से कहा था, “भारत सरकार को कश्मीर के लोगों के अधिकारों को बहाल करने के लिए सभी जरूरी उपाय करने चाहिए। असहमति पर प्रतिबंध जैसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को रोकना या इंटरनेट को बंद या धीमा कर देना लोकतंत्र को कमजोर करता है। जो बाइडेन भारत सरकार के असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NCR) और बाद में नागरिकता संशोधन अधिनियम पारित करने के तरीकों से निराश हैं।”

सुषमा के जरिए मोदी ने लगाई थी जो बाइडेन से अपना अमेरिका वीजा बहाल करने की गुहार
इकोनॉमिक टाइम्स की 23 जुलाई 2013 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 23 जुलाई 2013 को बतौर लोकसभा नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने अपने अमेरिकी दौरे में तत्कालीन उपराष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात करके गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी वीजा पर लगे प्रतिबंध को हटाने का अनुरोध किया था। उसी समय अमेरिकी दौरे पर गए तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी अमेरिकी अथॉरिटी से नरेंद्र मोदी के अमेरिकी वीजे पर लगे बैन को हटाने के बाबत बात करने की बात कही थी। दिसंबर 2012 में भारत के 40 लोकसभा और 25 राज्यसभा सांसदों ने अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को पत्र लिख कर नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ ‘नो-वीजा’ पॉलिसी को जारी रखने की अपील की थी।

19 मार्च 2005 को संयुक्त राज्य अमेरिका के दूतावास ने हिंदुत्ववादी नेता नरेंद्र मोदी का वीजा इस आधार पर रद्द कर दिया था कि वो गुजरात में धार्मिक आज़ादी के हनन और गुजरात दंगों में 1000 से अधिक (अधिकांश मुस्लिम) लोगों की हत्या के जिम्मेदार थे। बता दें कि 20 मार्च 2005 को नरेंद्र मोदी का एक कार्यक्रम न्यूयॉर्क में आयोजित किया जाना था, जिसमें उन्हें फोर्ट लॉडरडेल (Fort Lauderdale) में एशियन-अमेरिकन होटल ऑनर्स एसोसिएशन और न्यूयार्क में एक पब्लिक मीटिंग को अटेंड करना था।  इसके अलावा उन्हें बिजनेस लीडर्स से भी मिलना था।

अमेरिकी दूतावास ने वीजा कैंसिल करने की पुष्टि करते हुए कहा था, “हम पुष्टि करते हैं कि गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने आवर्जन और राष्ट्रीयता अधिनियम के तहत राजनयिक वीजा के लिए आवेदन किया था, लेकिन अमेरिकी दूतावास के वीज़ा अधिनियम के एक प्रावधान के तहत निरस्त किया गया जो किसी भी सरकारी अधिकारी को जिम्मेदार ठहराता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता के लिए किसी भी समय, विशेष रूप से धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार या सीधे तौर पर जिम्मेदार रहा हो।”

अमेरिकी वीजा के लिए मना किए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए नरेंद्र मोदी ने इसे ‘भारतीय संविधान का अपमान और भारतीय संप्रभुता पर हमला कहा था।’ साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि भारत आने के लिए अमेरिकियों के वीजा आवेदनों की प्रक्रिया के समय भारत भी विचार करेगा कि अमेरिका ने इराक में क्या किया है।”

ट्रंप-मोदी की यारी के परे
कट्टर दक्षिणपंथी और नरेंद्र मोदी के समवैचारिकी वाले डोनाल्ड ट्रंप के शासन काल में अमेरिका में भी मानवाधिकारों का ख़ूब हनन हुआ। ह्युमन राइट वॉच ने ट्रंप शासन के दौरान अमेरिका में बढ़ते मानवाधिकार हनन पर चिंता जताई थी। इस तरह अमेरिका और भारत दोनों जगह एक तरह, एक विचारधारा के नेता सत्ता में थे, जिसके चलते भारत अमेरिका के रिश्ते ज़्यादा प्रगाढ़ हुए। ट्रंप से यारी को नरेंद्र मोदी ने भारत के बढ़ते ग्लोबल कद के रूप में चिन्हित किया तो वहीं फरवरी में अहमदाबाद में एक स्टेडियम में नरेंद्र मोदी द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘नमस्ते ट्रंप’ में डोनाल्ड ट्रंप ने नरेंद्र मोदी के बारे में कहा, “आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें मैं अपना सच्चा मित्र कहते हुए गर्व महसूस करता हूं।”

ट्रंप और मोदी दोनों मानवाधिकारों का हनन करने वाले थे। शायद इसीलिए दोनों के जरिये भारत-अमेरिका इतने नजदीक आए, लेकिन अब चूंकि भारत की सत्ता में वही व्यक्ति है जो मानवाधिकारों के हनन को अपनी ताक़त समझता है, जबकि अमेरिकी सत्ता में एक ऐसा व्यक्ति आ गया है जो कि मानवाधिकारों का पुरजोर हिमायती है। ऐसे में रिश्ते में दूरी आना स्वाभाविक है। ट्रंप लगातार चीन को अपना दुश्मन बनाने पर अमादा थे जाहिर है ये उनके राष्ट्रवादी राजनीतिक संकल्पना की बुनियादी ज़रूरत भी थी जैसे कि पाकिस्तान को दुश्मन बनाना नरेंद्र मोदी की राष्ट्रवादी राजनीति की ज़रूरत है, लेकिन जो बाइडेन के सत्ता में आने के बाद अब चीन-अमेरिका के संबंधों को वापस पटरी पर लौटने के कयास लगाए जा रहे हैं। जाहिर है ऐसे में नरेंद्र मोदी नीत भारत के अलग-थलग पड़ने का खतरा है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव का आलेख।)

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