पीएम की एक जज द्वारा प्रशंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकीलों में घमासान

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उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करने पर उच्चतम न्यायालय के वकीलों में घमासान मच गया है। दरअसल वैचारिक लाइन पर उच्चतम न्यायालय के वकील अलग-अलग खेमों में बंधे हुए हैं।  सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव अशोक अरोड़ा ने बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद से सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे को हटाने के लिए 11 मई को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की आम सभा की बैठक बुलाई थी लेकिन उसके पहले बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने कार्यकारी समिति (ईसी) द्वारा शुक्रवार को बुलाई गई बैठक में निर्णय लेने के बाद एससीबीए ने अपने सचिव अशोक अरोड़ा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।

एससीबीए के अध्यक्ष  दुष्यंत दवे ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा प्रधानमंत्री की तारीफ का संज्ञान लिया और जस्टिस अरुण मिश्रा के द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की गई प्रशंसा को अनुचित ठहराया। 26 फरवरी को एससीबीए ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें जस्टिस अरुण मिश्रा की आलोचना करते हुए यह भी कहा गया था कि जस्टिस मिश्रा का यह बयान स्वतंत्र न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ है। उच्चतम न्यायालय के वकीलों का एक खेमा एससीबीए के उस प्रस्ताव के खिलाफ भड़क गया है और दुष्यंत दवे को उनके पद से हटाने की मांग कर रहा है है। उसी कड़ी में ये बैठक बुलाई गई थी।

हालांकि दुष्यंत दवे ने एससीबीए सेक्रेटरी के द्वारा बुलाई गई इस मीटिंग को गैरकानूनी करार दिया है। दवे ने कहा है कि एससीबीए की एक्‍जीक्‍यूटिव कमेटी ने ऐसी कोई मीटिंग नहीं बुलाई है। बता दें कि वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे मोदी सरकार के मुखर विरोधी रहे हैं। दवे, कोर्ट के भीतर और बाहर दोनों जगह मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं।

दरअसल, 25 फरवरी 2020 को एससीबीए की कार्यकारी समिति द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा की गई सार्वजनिक टिप्पणी की निंदा की गई थी। जस्टिस मिश्रा ने 22 फरवरी को इंटरनेशनल जजेज कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन समारोह में दिए गए अपने वोट ऑफ थैंक्स में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की थी और कहा था कि पीएम मोदी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। वैश्विक स्तर पर सोचते हैं और स्थानीय स्तर पर कार्य करते हैं।”

उस प्रस्‍ताव में कहा गया था कि एससीबीए का मानना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारत के संविधान की मूल संरचना है और इस स्वतंत्रता को संरक्षित किया जाना चाहिए। एससीबीए का मानना है कि इस तरह का कोई भी बयान न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर दुष्प्रभाव डालता है और इसलिए माननीय न्यायाधीशों से निवेदन है कि भविष्य में वे ऐसे बयान न दें और न ही कार्यपालिका से कोई निकटता दिखाएं। ऐसी निकटता और परिचय माननीय न्यायाधीशों की निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है और वादकारियों के मन में संदेह पैदा कर सकती है।

इस मुद्दे पर जारी घमासान के बीच एससीबीए के सचिव अशोक अरोड़ा ने एससीबीए नियम 22 का उपयोग करते हुए 11 मई को बैठक बुलाई थी जिसमें मुद्दा था कि एससीबीए कार्यालय का उपयोग राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं करना। दुष्यंत दवे को अध्यक्ष पद से हटाना तथा बार के हितों के खिलाफ काम करने के कारण दुष्यंत दवे को एससीबीए की प्राथमिक सदस्यता से हटाना।

दूसरी तरफ एससीबीए के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने बार के सभी वकीलों को पत्र लिखकर कहा है कि मैं आप सभी का ध्यान सचिव अशोक अरोड़ा के प्रयासों की ओर लाने के लिए यह पत्र लिख रहा हूं, जो आपको उनके मंसूबे के बारे में बताएगा। पूरी कवायद अवैध और अनुचित है। ईसी ने ऐसी किसी भी बैठक को बुलाने का फैसला नहीं किया है। इसलिए पूरी कवायद दुर्भाग्यपूर्ण और गलत है।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने कार्यकारी समिति (ईसी) द्वारा शुक्रवार को बुलाई गई बैठक में निर्णय लेने के बाद एससीबीए ने अपने सचिव अशोक अरोड़ा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह भी तय किया गया है कि सहायक सचिव रोहित पांडे, सचिव की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को संभालेंगे।

अरोड़ा ने आरोप लगाया था कि दवे राजनीतिक उद्देश्यों के लिए एससीबीए के कार्यालय का उपयोग कर रहे हैं और बार एसोसिएशन की प्राथमिक सदस्यता से भी उन्हें हटाने का आह्वान कर रहे हैं। हालांकि यह ईजीएम भी रद्द हो गया। कार्यकारी समिति ने बहुमत से निर्णय पारित किया था, जहां प्रेसिडेंट को मतदान करने से रोक दिया था। अरोड़ा के खिलाफ आरोपों की जाँच  के लिए एससीबीए द्वारा 3 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है।

निलंबित किए जाने के तुरंत बाद अरोड़ा ने बार के सदस्यों को एक संदेश भेजा, जिसमें कार्यकारी समिति पर विभिन्न अवसरों पर उन्हें डराने-धमकाने का आरोप लगाया गया और कहा कि दवे के आचरण से बाद दरार उत्पन्न हुआ । अरोड़ा ने कहा कि यह दिखाने के लिए दस्तावेजी सबूत हैं कि कार्यकारी समिति में प्रेसिडेंट और उनके साथियों ने मुझे समय-समय पर धमकाया, जिसके लिए मैंने कानूनी कार्रवाई शुरू करने का अपना अधिकार सुरक्षित रखा। उन्होंने मुझे अस्पष्ट और आधारहीन आरोप में निलंबित कर दिया। वास्तव में उनकी अलोकतांत्रिक कार्रवाई से इस प्रतिष्ठित बार की प्रतिष्ठा क्षतिग्रस्त हो गई।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ क़ानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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