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जस्टिस लिब्रहान ने कहा- पूरी साजिश से ढहाई गई थी बाबरी मस्जिद

बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड में विशेष सीबीआई अदालत ने बुधवार को फैसला सुना दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में मजबूत सबूतों के अभाव और घटना के सुनियोजित न होने का हवाला देते हुए सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया। इस मामले की जांच करने वाली लिब्रहान आयोग के अध्यक्ष जस्टिस लिब्रहान का कहना है कि बाबरी मस्जिद को गिराना एक साजिश थी और मुझे अब भी इस पर भरोसा है। बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले में सीबीआई अदालत ने कहा है कि ऐसे कोई सबूत नहीं है कि ढांचा गिराने के पीछे कोई षड़यंत्र था।

जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत में, विशेष सीबीआई अदालत के इस निष्कर्ष पर कि बाबरी मस्जिद गिराने के पीछे कोई षड़यंत्र नहीं था, को खारिज करते हुए  कहा है कि मेरे सामने मामले में जो भी सबूत रखे गए, उससे साफ था कि बाबरी मस्जिद को ढहाना सुनियोजित था। मुझे याद है कि उमा भारती ने इस घटना के लिए जिम्मेदारी भी ली थी। आखिर किसी अनदेखी ताकत ने तो मस्जिद गिराई नहीं, यह काम इंसानों ने ही किया।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सरकार ने इस घटना की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने 17 साल चली जांच के बाद 2009 में अपनी रिपोर्ट दायर की थी। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बड़ी संख्या में जुटे कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था। इस मामले में घटना की साजिश रचने में आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिन 68 लोगों को दोषी ठहराया था, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, शिव सेना के अध्यक्ष बाल ठाकरे, विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन, केएन गोविंदाचार्य, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और प्रवीण तोगड़िया के नाम भी शामिल थे।

इस रिपोर्ट में तत्‍कालीन मुख्यमंत्री कल्‍याण सिंह पर उन्‍हें घटना का मूकदर्शक बताते हुए आयोग ने तीखी टिप्‍पणी की थी। आयोग का कहना था कि कल्‍याण सिंह ने इस घटना को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया और आरएसएस को अतिरिक्त संवैधानिक अधिकार दे दिए।

लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संघ और भाजपा के बड़े नेताओं पर बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल होने के आरोप लगाए थे। रिपोर्ट में एक जगह कहा गया था कि इन वरिष्ठ नेताओं ने सक्रिय या निष्क्रिय तौर पर मस्जिद तोड़ने का समर्थन किया था। आयोग ने कहा था कि कारसेवकों का अयोध्या पहुंचना न तो अचानक था और न ही वे सब अपनी ही मर्जी से वहां आ गए थे। यह पूरी तरह सुनियोजित था, जिसकी पहले से ही तैयारी कर ली गई थी।

गौरतलब है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई अदालत द्वारा 32 आरोपियों को बरी किया जाना जस्टिस एमएस लिब्रहान आयोग के परिणाम के उलट है। आयोग ने कहा था कि पूर्व नियोजित तैयारी के तहत ढांचे को गिराया गया था। आयोग ने इस दलील को खारिज कर दिया था कि कारसेवकों ने अचानक ही यह कदम उठाया, जबकि सीबीआई अदालत ने कहा है कि ऐसे कोई सबूत नहीं हैं कि ढांचा गिराने के पीछे कोई षड्यंत्र था।

जस्टिस लिब्रहान के एक सदस्यीय आयोग का गठन 16 दिसंबर 1992 को किया गया था। आयोग को उन कारणों, तथ्यों और हालात की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसके कारण अयोध्या में ढांचे को गिराया गया। आयोग ने 100 से ज्यादा गवाहों से पूछताछ की और 17 वर्ष बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने विवादित ढांचा गिराए जाने में मदद और इसे अंजाम देने के लिए संघ परिवार और आएसएस पर दोष मढ़ा था।

लिब्रहान जांच आयोग के समक्ष पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और विश्वनाथ प्रताप सिंह, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह और राम जन्मभूमि आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले अन्य नेताओं की गवाही हुई थी।

उप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने शीर्ष अदालत को हलफनामे पर आश्वासन दिया था कि कारसेवकों को विवादित ढांचे को किसी भी तरह की क्षति पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा कि इस मामले के तथ्यों से यही सबूत सामने आता है कि सत्ता और धन की संभावना से प्रलोभित भाजपा, आरएसएस, विहिप, शिव सेना और बजरंग दल आदि के भीतर ही ऐसे नेता उभर आए थे, जो न तो किसी विचारधारा से निर्देशित थे और न ही उनमें किसी प्रकार का नैतिक संयम था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि छह दिसंबर, 1992 को देखा कि उत्तर प्रदेश सरकार कानून का शासन बनाए रखने की इच्छुक नहीं थी और यह उदासीनता मुख्यमंत्री (कल्याण सिंह) के कार्यालय से लेकर निचले स्तर तक थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद को गिराने की सुनियोजित तैयारी की गई थी और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इन नेताओं को इसका पता नहीं था या फिर वो इस पूरे घटनाक्रम में निर्दोष हों।

बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड में विशेष सीबीआई अदालत ने न तो स्वयं लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट का संज्ञान लिया न ही अभियोजन एजेंसी सीबीआई ने ही अपने आरोपों के समर्थन में इस रिपोर्ट को अदालत में दाखिल करने की अनुमति मांगी। वैसे भी विशेष सीबीआई अदालत ने इस मामले की जांच में कदम कदम पर सीबीआई की लापरवाहियों को इंगित किया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on October 1, 2020 10:48 am

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