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Categories: बीच बहस

अगला पखवाड़ा तय करेगा कि संविधान सर्वोपरि है या सत्ता

उच्चतम न्यायालय 17 नवंबर के पहले जिन चार मामलों, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामला, राफेल मामला, सबरीमाला मामला तथा  वित्त विधेयक बनाम धन विधेयक में फैसला सुनाने जा रहा है उससे स्पष्ट हो जाएगा कि न्याय की देवी ने वास्तव में आंख पर पट्टी बांध रखी है और संविधान सर्वोपरि है या फिर चीन्ह-चीन्ह के न्याय देती है। इन फैसलों से यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि न्यायपालिका अभी भी स्वतंत्र और निष्पक्ष है, अथवा सत्ता के प्रति प्रतिबद्धता की ओर बढ़ रही है।

गोलकनाथ मामले और केशवानंद भारती केस ने स्थापित कर दिया है कि संसद को संविधान ने बनाया है, न कि संविधान को संसद ने। यानि संविधान सर्वोपरि है। केशवानंद भारती केस में उच्चतम न्यायालय ने गोलकनाथ मामले में दिए गए फ़ैसले को पलटते हुए कहा कि संसद के पास संविधान को संशोधित करने की शक्ति है, बशर्ते संविधान के मूलभूत ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) को न बदला गया हो। इस फ़ैसले ने तब से लेकर आज तक संविधान को शक्ति दी है और इस यक़ीन का आधार बना है कि एक पार्टी के वर्चस्व के दौर की वापसी भारत की संवैधानिक व्यवस्था को कमज़ोर नहीं करेगी।

उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे कहते हैं कि आजकल देश में न्यायपालिका अपनी सत्ता, अपना अधिकार क्षेत्र, अपना मैदान और यहां तक कि अपना कर्तव्य, सब धीरे-धीरे छोड़ती जा रही है। एक तरह से अपनी नई शक्तियों से अपनी सारी सत्ता सरकार को सौंपती जा रही है। यह बेहद दुखद और चिंताजनक है, क्योंकि न्यायपालिका देश का गार्डियन एंजेल (आदर्श अभिभावक), संविधान का आखिरी रखवाला और कानून का अल्टीमेट इंटरप्रेटर (आखिरी व्याख्याकार) है। संसद कानून बना सकती है, सरकार उस कानून को लागू कर सकती है, लेकिन वह कानून सही है या नहीं, यह तो न्यायपालिका ही बता सकती है। यही न्यायपालिका का कर्तव्य और दायित्व है। उच्चतम न्यायालय और न्यायपालिका का दूसरा दायित्व है कि वह देखे कि सरकार अपनी शक्तियों का जो इस्तेमाल कर रही, वह संविधान, कानून के दायरे में है या नहीं, और नहीं कर रही है, तो उसे रोके।

दुष्यंत दवे का कहना है कि न्यायपालिका मानो अपना दायित्व ही भूल चुकी है। वह कोई सवाल नहीं उठाना चाहती। इसकी वजहें भी कोई बहुत अनजानी नहीं हैं। उसके लिए तीन मामलों को याद किया जा सकता है जिनसे लगातार तीन चीफ जस्टिस संदेह के घेरे में आ गए। ये मामले हैं कलिखो पुल सुसाइड नोट, मेडिकल कॉलेज घोटाला और गोगोई यौन उत्पीड़न मामला। इससे लगता है कि जस्टिस  खेहर, जस्टिस  दीपक मिश्रा और जस्टिस रंजन गोगोई पर किसी कारण से सरकार का दबाव बढ़ गया है। पिछले कुछ दिनों से कश्मीर मामले से लेकर चिदम्बरम मामले में उच्चतम न्यायालय ने जो ढीला रवैया अपना रखा है और अधिकांश महत्वपूर्ण मामले एक जज विशेष के यहां मास्टर ऑफ रोस्टर यानि चीफ जस्टिस द्वारा सुनवाई के लिए भेजा जा रहा है उससे न्यायपालिका की शुचिता पर ही प्रश्न चिंह लगता जा रहा है।

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामला सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामला है, जिस पर अपनी सेवानिवृत्ति से पहले फैसला सुनाना संभव करने के लिए चीफ जस्टिस गोगोई ने रोज़ाना की सुनवाई की है। इस मामले को संविधान पीठ ने सुना है। इसमें उनके अलावा न्यायमूर्ति एसए बोबडे, अशोक भूषण, एसए नज़ीर और डीवाय चंद्रचूड़ शामिल हैं।

उल्लेखनीय है कि पूर्ववर्ती चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपने 2-1 के फैसले में अयोध्या मामले को केवल एक भूमि विवाद करार देते हुए कहा था कि मामले को संविधान पीठ को सौंपने का कोई आधार नहीं है। सिर्फ जस्टिस एसए अब्दुल नज़ीर ने राय दी थी कि मस्जिद के इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं होने संबंधी उच्चतम न्यायालय के 1994 के अवलोकन को एक बड़ी खंडपीठ के पास भेजा जाना चाहिए और यहां तक कि उन्होंने इस बारे में विचार के लिए कुछ प्रश्न भी तैयार किए थे। इस मामले में यक्ष प्रश्न यह है कि संविधान पीठ कानून पर चलेगी, या बहुसंख्यकों की भावनाओं का पक्ष लेगी, या कोई बीच का रास्ता निकालेगी?

मोदी सरकार के फ्रांसीसी कंपनी दसा एविएशन से राफेल युद्धक विमान खरीदने के फैसले की अदालत की निगरानी में जांच कराने की याचिकाओं पर पिछले साल दिया गया फैसला विवादित होने के बाद मुख्य न्यायाधीश गोगोई और अन्य जजों ने अपने फैसले के विरुद्ध पुनरीक्षण याचिकाओं पर सुनवाई की। मामले से जुड़े वकीलों के अनुसार 14 दिसंबर 2018 के फैसले में समस्या ये थी कि अदालत को बहुत सारी अहम सूचनाएं नहीं दी गई थीं और वो विवादित फैसला मोदी सरकार द्वारा अदालत को दिए गए धोखे की वजह से आया था। पीठ ने भारत के आधिकारिक ऑडिटर यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा रक्षा सौदों की जांच के तरीके का भी गलत संदर्भ दिया। इस फैसले से यह तय हो जाएगा कि एक गोपनीय सौदे में अनियमितता के आरोप लगने पर सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ ले सकती है या नहीं।

केरल के सबरीमाला मंदिर में माहवारी की उम्र की महिलाओं को पूजा करने की अनुमति देने के उच्चतम न्यायालय के 28 सितंबर 2018 के फैसले का कई हिंदू संगठनों ने भारी विरोध किया था। उस फैसले की समीक्षा के लिए 65 पुनरीक्षण याचिकाएं आईं, जिनकी सुनवाई मुख्य न्यायाधीश गोगोई की अगुआई वाली संविधान पीठ कर रही है। पुनरीक्षण याचिकाओं से इस सवाल का समाधान मिलेगा कि क्या अदालतों को धार्मिक रीति-रिवाजों और नियमों में दखल देना चाहिए।

चीफ जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली खंडपीठ को ये भी तय करना है कि वित्तीय विधेयक या संघीय बजट को लोकसभा के स्पीकर के निर्देश पर एक धन विधेयक के रूप में पारित किया जा सकता है या नहीं? इस मामले में उच्चतम न्यायालय के सामने इस व्यापक मुद्दे को सुलझाने का भी मौका है कि लोकसभा के स्पीकर का फैसला न्यायिक समीक्षा के अधीन आता है या नहीं? राज्य सभा को दरकिनार करने के लिए वित्त विधेयक, 2017 को धन विधेयक के रूप में पारित कराए जाने पर सबका ध्यान गया था। इस फैसले का सबको इंतजार है, क्योंकि इससे इस मुद्दे को भी सुलझाया जा सकेगा कि क्या भारी बहुमत वाली किसी सरकार को विपक्ष और स्थापित संसदीय मानदंडों की पूर्ण अवहेलना करने की अनुमति दी जा सकती है।

दूरगामी असर वाले इन चार मामलों के अलावा मुख्य न्यायाधीश गोगोई की अध्यक्षता वाली खंडपीठ इस बात का भी फैसला करेगी कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी द्वारा दायर आपराधिक अवमानना के लंबित मामले का क्या किया जाए। राहुल गांधी ने मोदी के लिए प्रयुक्त अपने चौकीदार चोर है के नारे के संदर्भ में गलत ढंग से राफेल पर पुनरीक्षण याचिकाओं की अनुमति देने वाले उच्चतम न्यायालय को उद्धृत किया था।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने चार अप्रैल को सीजेआई कार्यालय के आरटीआई अधिनियम के अधीन होने को लेकर दायर याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस याचिका को उच्चतम न्यायालय के सेक्रेटरी जनरल ने दिल्ली हाईकोर्ट के जनवरी 2010 के फैसले के खिलाफ चुनौती दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सीजेआई का कार्यालय आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 2 (एच) के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण है।

This post was last modified on November 2, 2019 2:10 pm

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