Sunday, October 17, 2021

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कर्नाटक और गुजरात की सरकारों ने प्रवासी मज़दूरों को बनाया बंधक!

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जैसा कि खबरें आ रही हैं और रेलवे का एक सर्कुलर बता रहा है, उसके अनुसार तो कर्नाटक के प्रवासी मज़दूर न फंसे हैं, न तो छिपे हैं, वे कंपनियों और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से बंधक बनाए जा चुके हैं। कल तक रेलवे कह रहा था, कि वह इन कामगारों को घर ले जाने के लिये स्पेशल ट्रेन चला रहा है, 85/15 प्रतिशत के अनुपात से सरकारें उनका किराया वहन कर रही हैं, और आज जब चहेते पूंजीपतियों के हित की बात सामने आई तो, यह सब योजना धरी की धरी रह गयी। 

कर्नाटक सरकार ने पहले तो सभी प्रवासी मज़दूरों को उनके घर ले जाने के लिये खुद ही रेलवे से तीन स्पेशल ट्रेन चलाने का अनुरोध किया था। यह स्पेशल ट्रेनें, दानापुर, बिहार के लिये तय भी हो गयी थीं। पर अचानक यह फैसला कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा की कर्नाटक की बिल्डरों के साथ होने वाली बैठक के बाद बदल दिया गया। निश्चय ही बिल्डर लॉबी का दबाव सरकार पर पड़ा होगा। राज्य के नोडल अधिकारी ने रेलवे को पत्र लिख कर कहा कि अब किसी स्पेशल ट्रेन की ज़रूरत नहीं है। कर्नाटक से बिहार की दूरी भी बहुत है जिससे सड़क मार्ग से भी मज़दूर अपने घर नहीं जा सकते हैं। यह तो सरासर बंधक बनाना हुआ। क्या हम दास प्रथा के युग में लौट रहे हैं ?

गुजरात से भी ऐसी खबरें हफ्ते भर से आ रही हैं। सूरत, गुजरात में अपने-अपने घरों को जाने वाले मजदूरों को जबरन वहां रोका जा रहा है। अपने घरों की ओर जाने की मांग करती हुई उनकी भीड़ पर लाठी चलाई जा रही है, उनकी बसें जो कुछ आ भी रही थीं, उन्हें राज्य की सीमा से वापस कर दिया जा रहा है। कर्नाटक और गुजरात के उद्योगपतियों को यह आशंका है कि अगर यह मज़दूर वापस चले गए तो दुबारा गुजरात या कर्नाटक नहीं लौटेंगे जिससे कामगारों की कमी हो जाएगी। उद्योगपतियों की यह आशंका अगर सच भी हो तो क्या वे मज़दूरों को बंधक बना कर रखेंगे और उन्हें अपने अपने घरों और परिवार में नहीं जाने देंगे ? 

5 मई की ही खबर है कि गुजरात के वे जिले जो मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित हैं पर बसें रोकी जा रही हैं। राज्यों की सीमाएं सील कर दी गयी हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 8,000 मज़दूर जिसमें महिलाएं और बच्चे भी हैं, बरवानी और 5000 मज़दूर झाबुआ जिले की सीमा पर रुके हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कष्ट में पड़े हुए मज़दूरों के ढेर सारे हृदयविदारक वीडियो लगातार घटना की भयावहता को दिखा रहे हैं। 

कहा जा रहा है कि मज़दूरों के लिये खाने पीने और रहने की व्यवस्था वहां की कंपनियां और राज्य सरकार मिल कर, कर रही हैं। सरकार और कम्पनियां ऐसी व्यवस्था कर भी रही होंगी। यह कोई एहसान नहीं है। यह इन कंपनियों का स्वार्थ है कि येन-केन प्रकारेण यह मज़दूर अपने घर न लौट पाएं और यहीं बने रहें। उन्हें पता है कि श्रम के बिना पूंजी का कोई मूल्य नहीं होता है। फिर भी जो मज़दूर अपनी मर्ज़ी से, अपने घरों को वापस जाना चाहते हैं उन्हें गुजरात या कर्नाटक में क्यों जबरन बंधक बनाकर रखा गया है ? यह तो एक प्रकार का दंडनीय अपराध है। 

इस महामारी की आपदा में, बहुत से लोग अपने अपने घरों और परिवार की ओर लौटना चाहते हैं। दूर रहते हुए घर परिवार के बारे में, प्रवासी मन वैसे भी अनिश्चितता से भरा रहता है। फिर यह तो एक महामारी की आपदा है। इन परिस्थितियों में तो सबकी यही स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह अपने घर परिवार के पास ही रहे। अतः ऐसी स्थिति में उन्हें केवल इस लिए जबरन रोक लेना कि, क्या पता वे कल वापस अपने काम पर आएंगे भी या नहीं, एक प्रकार से उन्हें बंधक ही बना लेना है। 

सरकार के पास क्या ऐसे श्रमिकों की कोई सूची है कि कौन-कौन से मज़दूर स्वेच्छा से घर जाना चाहते हैं और कौन-कौन स्वेच्छा से अपने काम की जगह पर रुकना चाहते हैं, जहां वह अभी हैं ? जो स्वेच्छा से रुकना चाहते हैं उन्हें छोड़ कर जो अपने घरों की ओर जाना चाहते हैं, उन्हें उनके घरों की ओर भेजा जाना चाहिये। जो स्वेच्छा से अपने घर जाना चाहते हैं, उन्हें घर भेजने की क्या व्यवस्था की गयी है ? सरकार ने लगता है, ऐसी परिस्थितियों की कल्पना भी नहीं की होगी। उसने सोचा कि जैसे ताली थाली बज गयी, बत्ती बुझा और मोमबत्ती जला दी गयी वैसे ही कह दिया कि जो जहां है वहीं रुका रहे तो लोग स्टैच्यू होकर रुक जाएंगे। एक इवेंट की तरह जो जहां है, वहीं थम जाएगा। 

सरकार के पास हो सकता है कि ऐसा कोई आंकड़ा भी न हो जिससे वह स्पष्ट रूप से यह बता सके कि किस-किस राज्य के किस-किस शहर में कितने प्रवासी मज़दूर हैं। उसमें से कितने किस-किस राज्य में जाना चाहते हैं, और कितने ऐसे हैं, जो कहीं नहीं जाना चाहते हैं। यह काम तलाबन्दी से पहले ही हो जाना चाहिए था, क्योंकि यह आसान काम भी नहीं था और इसमें समय भी लगता।

लेकिन जब लॉक डाउन का निर्णय लिया गया था तब शायद ही, सरकार और नौकरशाही में इस समस्या के बारे में सोचा गया हो। अगर सोचा गया होता तो उन्हें उनकी इच्छानुसार उनके घरों की ओर भेजने के लिये भी कोई न कोई योजना सरकार के पास होती। लॉक डाउन के निर्णय और उसके क्रियान्वयन को लेकर, एक गम्भीर कन्फ्यूजन केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक बना रहा और यह अब भी बरकरार है, जिसका दुष्परिणाम अब सबको भोगना पड़ रहा है। 

नोटबन्दी हो, या जीएसटी, या यह तालाबन्दी, सरकार के हर निर्णय के क्रियान्वयन में उठाया गया कदम प्रशासनिक रूप से अक्षमता से भरा हुआ रहा है। तालाबन्दी के इस मामले में भी, चाहे मज़दूरों को उनके घरों में भेजने का मामला हो, शराब के दुकानों के खोलने के फैसले का प्रकरण हो, या क्वारंटाइन सेंटर की व्यवस्था का बिंदु हो, या अस्पतालों के प्रबंधन का मुद्दा, या पीपीई उपकरण की व्यवस्था या टेस्टिंग करने की योजना का, हर जगह तंत्र की व्यवस्था टूटती और कनफ्यूजन से भरी नज़र आ रही है और उसका दुनिया भर में मज़ाक़ बनता जा रहा है। लगता है, सरकार बदहवास हो चुकी है और वह यह सोच भी नहीं पा रही है कि, क्या करे और कैसे करे। 

श्रमिक संगठनों को देश भर में फंसे, और बंधक बनाए गए मज़दूरों के हक़ में खड़ा होना चाहिये, क्योंकि किसी भी देश की प्रगति इन कामगारों के दम पर ही होती है। सरकार ने इनकी समस्या के बारे में सोचा तक नहीं और इनके संबंध में भ्रमपूर्ण फैसले कर रही है। कनफ्यूजन इतना है कि, न जाने किन नीति नियंताओं की सलाह पर सरकार रोज ही अपने निर्णय को उलट-पलट दे रही है, जिसका खामियाजा इन बेबस और गरीब प्रवासी मज़दूरों को भोगना पड़ रहा है। जो प्रवासी मज़दूर स्वेच्छा से रुकना चाहते हैं वे बिल्कुल रुकें और उनकी व्यवस्था कम्पनियाँ और सरकार मिल कर करें, पर जो अपने-अपने घरों को जाना चाहते हैं उन्हें उनके घरों की ओर सुरक्षित और सुगमता के साथ भेजा जाए। 

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

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