Sunday, May 22, 2022

कश्मीर फाइल्सः दो राष्ट्र के सिद्धांत और नाजीवाद का खतरनाक मिश्रण

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एक बड़े शहर के मल्टीप्लेक्स में ‘कश्मीर फाइल्स’ देखने गया तो पहला अहसास यही हुआ कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा समाचार माध्यमों को निगल जाने के बाद अब भाजपा तथा संघ परिवार के हाथ सिनेमा जैसा शक्तिशाली माध्यम भी आ गया है। मध्यम तथा निम्न मध्यम वर्ग के बेरोजगार नौजवानों को झुंड बना कर हॉल में आते देख कर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि फिल्म किसके लिए और क्यों बनाई गई है। यह वही खुराक है जो देश के नौजवान व्हाट्सएप्प के जरिए पाते रहे हैं। विवेक अग्निहोत्री ने एक ऐसी फिल्म बना दी है जो मुसलमानों के खिलाफ लोगों में नफरत भरने में संघ परिवार की मदद आने वाले कई सालों तक करती रहेगी। यह सांप्रदायिक आधार पर बंटे गुजरात जैसे राज्य के विधान सभा चुनावों में हिंदू वोट बैंक को एक करने और अगले लोकसभा चुनावों में ध्रुवीकरण के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करेगी। नफरत को जिंदा रखने के लिए इसे लगाातार सींचते रहने की जरूरत होती है।

लेकिन इस बात पर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है कि असत्यों तथा अर्धसत्यों को गूंथ कर बनी यह फिल्म कश्मीर के बारे में पाकिस्तान के इस तर्क को ही मजबूत करती है कि प्रदेश के सारे मुसलमान भारत के विरोध में हैं और लोग भारत में नहीं रहना चाहते हैं। इसका असली वैचारिक आधार दो राष्ट्र का सिद्धांत है जिसकी वकालत जिन्ना तथा सावरकर करते थे। सच पूछिए तो फिल्म उससे भी आगे निकल गई है और यहूदियों को घटिया बताने की नाजी कोशिशों की तरह मुसलमानों को घटिया बताती है ताकि उनके खिलाफ नफरत पैदा हो। भले ही जिन्ना तथा सावरकर हिंदुओं और मुसलमानों को अलग राष्ट्र बताते थे,लेकिन एक-दूसरे को घटिया नहीं बताते थे। पूरी फिल्म इस तरह से बुनी गई है कि मुसलमान इंसान ही नहीं लगते हैं।

अंतिम सीन में नायक कृष्णा दो राष्ट्र के नैरेटिव को कश्मीर पर लागू करता है जब वह कहता है कि कश्मीर पर मुसलमानों ने कब्जा किया और सैकड़ों साल तक उन्होंने कश्मीरी पंडितों पर जुल्म ढाए। वह इस हद तक आगे बढ़ जाता है कि सूफियों के हाथ में भी तलवार था यानि मुसलमान अच्छे हो ही नहीं सकते। वह साझी संस्कृति के अनुभव को ध्वस्त करना चाहता है। यह इससे मिलता-जुलता नैरेटिव है जिसमें हर मुसलमान लव-जिहादी है या गो-भक्षक है। लेकिन हिंदुत्व के दो राष्ट्रवाली नैरेटिव पाकिस्तान के पक्ष में हैं। वह तो इसी आधार पर कश्मीर पर अपना दावा ठोक रहा है,नहीं तो वहां के मुसलमानों ने उसे 1947 में ही खारिज कर दिया था। वे असली भारतीय हैं जिन्होंने 1947 में जिन्ना को मानने से इंकार कर दिया और महात्मा गांधी जब दंगों से जल रहे भारत से होकर कश्मीर गए तो उन्होंने यहीं उम्मीद की रोशनी नजर आई। घाटी के अल्पसंख्यक हिंदुओं को मुसलमानों से कोई खौफ नहीं था। वहां कोई फसाद नहीं हुआ।

सच्चाई यही है कि कश्मीर भारत की उस साझी संस्कृति को सबसे मजबूती से सामने लाता है जो यहां हिंदू,मुसलमान,बौद्ध,जैन,सिख तथा ईसाइयों ने मिल कर बनाई। कश्मीर तो बौद्ध,शैव,सूफी,भक्ति मतों के मिश्रण का बेहतरीन उदाहरण है।

दो राष्ट्र के नैरेटिव को मजबूत करने की अपनी कोशिश में फिल्मकार ने तरह-तरह के तरीके अपनाए हैं। कश्मीर का दुर्भाग्य कि वहां केंद्र की गलत नीतियों का फायदा इस्लामी आतंकवादियों ने उठाया और इंसानियत को शर्मसार करने वाले कारनामे किए। फिल्मकार ने उन्हीं अमानवीय घटनाओं का इस्तेमाल मुसलमानों को घटिया दिखाने के लिए मसाले की तरह किया है। इसमें अलग-अलग वास्तविक घटनाओं को अपने खास इरादे के लिए जोड़ा है और तोड़ा है। तोड़ा है। कहीं आधा सच रखा है तो कहीं तथ्यों को दबा दिया है।

‘कश्मीर फाइल्स’ ने भारतीय राज्य को भी इतना कमजोर और निकम्मा दिखा कर पाकिस्तान के भारत विरोधी नैरेटिव को ही मजबूत किया है। इसने भारत की पुलिस,नौकरशाही और यहां के मीडिया को इतना निकम्मा और लाचार दिखाया है कि इससे देश की बदनामी हुई है। गैर-भाजपा पार्टियों को नीचा दिखाने के लिए इसने भारतीय राष्ट्र को नीचा दिखा दिया है। लेकिन सवाल उठता है कि भारत उस समय कश्मीर में इतना कमजोर क्यों दिखाई दे रहा था कि उसके नागरिकों जिसमें हिंदू,मुसलमान तथा सिख-सभी शामिल थे,की हत्या हो रही थी और वे भागने को मजबूर थे? इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि अस्सी के दशक में कश्मीर में आतंकवाद अपनी जड़ें जमा रहा था और भाजपा राम मंदिर बनाने के आंदोलन में लगी थी। यह देश का प्रमुख मुद्दा बन गया था जबकि पंजाब,कश्मीर,असम,मणिपुर जैसे कई राज्य उग्रवाद से जल रहे थे।

यह भी लोगों को बताया जाना वाहिए कि कश्मीर के कट्टरपंथियों से वामपंथी और सेकुलर पार्टियां ही लोहा ले रही थीं। इसमें नेशनल कांफ्रेंस भी शामिल है जिसके नेता फारूक अब्दुल्ला को फिल्म में नरसंहार का दोषी बताया जा रहा है। सच्चाई यह है कि आरएसएस से जुड़े सिर्फ एकाध लोग ही मारे गए जबकि दूसरे संगठनों के लोग बड़ी संख्या में मरे। सीपीएम नेता मुहम्मद युसूफ तरीगामी इसके जीता-जागता उदाहरण हैं जो आंतकवादियों के जानलेवा हमले से बच निकले। उनका सुरक्षा गार्ड मारा गया था। नेशनल कांफ्रेंस के जान गंवाने वाले नेताओं में दो मंत्री भी शामिल थे। कश्मीर में सबसे पहले हाईकोर्ट के जज नीलकंठ गंजू मारे गए। बाद में दूरदर्शन केंद्र के निदेशक ने अपनी जान गंवाई। कई

पत्रकारों,नौकरशाहों और पुलिसकर्मियों ने अपनी जान गंवाई और इसमें मुसलमानों की बड़ी संख्या थी। यह लोग जानें कि सिर्फ पांच महीनों को छोड़ कर भाजपा के लाडले रहे जगमोहन ही अप्रैल 1984 से मई 1990 तक कश्मीर में राज्यपाल रहे और इसी दौरान आतंकवाद ने अपनी जडे़ं जमाईं।
भले ही यह मुद्दा फिल्म में पहली बार आया है,इसे पहले भी कई बार जोर-शोर से उठाया जा चुका है। 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से यह गोदी मीडिया का प्रिय विषय रहा है और इसे खास मौकों पर उठाया जाता रहा है। एक मौका तो तब आया जब एमएम कलबुर्गी,गोविंद पानसरे तथा नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के विरोध में साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने अवार्ड वापसी अभियान चलाया था। गोदी मीडिया उस समय यही सवाल कर रहा था कि बुद्धिजीवि कश्मीरी पंडितों के सवाल पर खामोश क्यों हैं। गोदी मीडिया ने आज से ठीक पाचं साल यानि ऐन गुजरात विधान सभा चूनावों के पहले भी कश्मीरी पंडितों के पलायन के मुद्दे को पूरी ताकत से उठाया था और अब भी ऐन गुजरात के चुनाव के समय इस फिल्म के जरिए यह मुद्दा उठाया गया है।

उसके कई सीन उन खबरों से प्रेरित हैं जो गोदी मीडिया ने चलाए हैं और इसके डायलॉग भी एक मोदी समर्थक एंकर की ओर से कहे गए शब्दों से मिलते-जुलते हैं। भाजपा के करीब माने जाने वाला संगठन पुनुन कश्मीर कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार तथा पलायन का सवाल शुरू से ही उठाता रहा है। पुनुन कश्मीर ने धारा 370 हटाए जाने जैसे भाजपा के एजेंडे पर लगातार सक्रिय भी रहा। लेकिन भाजपा ने सिर्फ उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया। पंडितों को जो न्याय भी मिला वह मनमोहन सिंह सरकार से। मनमोहन सरकार की ओर से मिले 2008 में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत पीड़ित कश्मीरी पंडितों को नौकरी और मकान देने का प्रवाधान है। मनमोहन सरकार के समय इस पैकेज के तहत तीन हजार से अधिक सरकारी नौकरियां भी दी तथा कुछ मकान भी मिले। लेकिन मोदी की सरकार ने उससे कम नौकरी और मकान दिए हैं। वाजपेयी सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया जबकि जगमोहन इसमें एक मंत्री थे।

‘कश्मीर फाइल्स’ यह बॉलीवुड की उन आम फिल्मों में से नहीं है जो बॉक्स आफिस पर सफलता पाने के लिए भी भाईचारे तथा देश-समाज या दोस्ती-मुहब्बत के लिए जान कुर्बान करने की नैरेटिव को जरूरी मानती हैं। इस मायने में ‘कश्मीर फाइल्स’ एक अलग तरह की फिल्म है जिसमें नफरत के सामने मुहब्बत और कपट के सामने ईमानदारी का नैरेटिव नहीं है। यह कहानी शायद बॉलीवुड में पहली बार आई होगी जिसमें यह कहा जा रहा है कि हिंदू-मुसलमान के भाई-भाई होने की बातें झूठी हैं और हम तो सैकड़ों साल से लड़ रहे हैं।

विवेक अग्निहोत्री स्टीव स्पिलबर्ग की फिल्म ‘शिंडलर्स लिस्ट’ का नाम बार-बार लेते रहते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि उनकी फिल्म मानवता-विरोधी है। जर्मनी में यहूदियों के नरसंहार पर बनी ‘शिंडलर्स लिस्ट’ या रोमन प्लांस्की की फिल्म ‘द पियानिस्ट’ अत्याचारी नाजियों में भी एक करुण हृदय ढूंढ लेती हैं और उनकी फिल्में मानवीय संवेदनाओं को उभारती हैं। लेकिन एक दूसरे को बचाने की कोशिश के अनगिनत उदाहरणों के बावजूद अग्निहोत्री को कोई अच्छा मुसलमान नजर नहीं आया। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि पंडितों के छोड़े गए मकानों की हिफाजत उनके मुसलमान पड़ोसी आज तक कर रहे हैं। मुसलमानों ने उन्हें पलायन के समय भी पूरी मदद की थी ताकि उनकी जान बचे। सबसे बड़ी बात यह है कि इन सब के बीच घाटी में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई दंगा नहीं हुआ।

मीडिया और जेएनयू का चित्रण भोंड़ा है। यह हास्यास्पद है कि कश्मीर में अलगाववादियों की राजनीति जेएनयू से संचालित हो रही थी। यह भारत के पूरे सिस्टम का मजाक बनाने वाली बात है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अर्बन नक्सल बताने के भाजपाई प्रचार को फिल्म इतने निचले स्तर पर ले आई कि दक्षिण एशिया के सबसे लोकप्रिय प्रतिरोध-गीतों में से एक फैज अहमद फैज के ‘हम देखेंगे’ का मजाक बना दिया। यह गीत इस्लामी कट्टरपंथ को लागू करने वाले सैनिक तानाशाह जिया उल हक के खिलाफ लिखा गया था और फैज ने इसमें इस्लामी अध्यात्म के कुछ प्रतीकों का इस्तेमाल किया है। भगवान के बंदों-शोषितों-उत्पीड़ितों को मसनद पर बिठाने और गद्दी पर बैठे लोगों का ताज छीनने की कल्पना वाले इस महान गीत को इस तरह पेश कर फिल्म ने जन-प्रतिरोध के बारे में अपना संकुचित नजरिया पेश किया है। इससे यह भी जाहिर होता है कि हिंदुत्व लेफ्ट से कितना डरता है। लेकिन एक प्रोपेगंडा फिल्म से आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं?
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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