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कश्मीर: नए गोरों का बोझ

जब अंग्रेजों ने 1858 में अधिकारिक रूप से भारत को ब्रिटिश शासन के अधीन लाया और रानी विक्टोरिया को भारत की महारानी घोषित किया तो तर्क दिया गया था कि ब्रिटिश सरकार अपनी भारतीय प्रजा को ‘बेहतर’ बनाने के लिए कार्य करेगी। ‘मूलनिवासी’ तब असभ्य, आत्मज्ञान से वंचित और इसलिए खुद शासन करने में अक्षम माने जाते थे। इस तरह गोरों का बोझ था अपनी प्रजा को जीवन के प्रगतिशील तरीकों के लिए ‘रास्ता दिखाना’। इसका मतलब भारतीयों को सोच के विदेशी तरीके सिखाना और ‘प्रतिगामी सांस्कृतिक रीतियाँ’  मानी जाने वाली चीज़ों को समाप्त करना। इसी ‘निरंकुश पितृसत्तावाद (पटर्नलिस्म) के ज़रिये अंग्रेज़ों ने अपने साम्राज्यवाद को न्यायोचित ठहराया था और सती प्रथा (पति की चिता पर विधवा के जलने की प्रथा) को बैन करने में इसकी सफलता का सार है। इस कार्य को स्पिवाक ने “गोरे पुरुषों द्वारा भूरी औरतों को भूरे पुरुषों से बचाने” की संज्ञा दी थी।



लेकिन, औपनिवेशिक शासन के तरीके के रूप में पितृसत्तावाद को राष्ट्रवादी संघर्ष और महिलाओं के आन्दोलन के उभार से चुनौती मिली। महिलाओं के रक्षक होने के इस पितृसत्तावादी दावे का खोखलापन तब नारीवादियों और राष्ट्रवादियों ने उजागर किया जब 1900 में महिलाओं के मताधिकार के लिए चर्चा शुरू हुई और अंग्रेजी प्रशासकों ने इस सुधार का विरोध किया यह कहकर कि “भारत की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए भारतीय महिलाओं को मताधिकार देना असामयिक होगा”। (ग्रेट ब्रिटेन फ्रैंचाइज़ी कमेटी)। इस तरह गोरे पुरुषों का बोझ सिर्फ महिलाओं के लिए बोलने तक के लिए था,और वह खुद अपने लिए बोल सकें ऐसे मंच प्रदान करना बिल्कुल नहीं था।



मज़े की बात यह है कि पितृसत्तावादी औपनिवेशिक परियोजना जो आज़ादी के बाद नए सामाजिक करार के गठन से उलट गयी थी, कुछ साल बाद ही, जैसे कश्मीर का सैन्यीकरण शुरू हुआ, और जैसे पूर्व-उपनिवेश खुद उपनिवेशवादी बन गए, पितृसत्तावाद की औपनिवेशिक धुन भी लौट आई। ऐसे तर्क हमेशा सुनाई देते थे कि भारत कैसे कश्मीर को पाकिस्तान से और कश्मीरी महिलाओं को ‘दूसरे’ यानी पाकिस्तानी से बचा रहा था। इस तरह, जैसे भारत ने अनुच्छेद 370 हटाकर कश्मीर पर अपने कब्ज़े का औपचारीकरण किया, कश्मीर को प्रतीकात्मक स्वायत्तता देने वाला खोखला ढांचा भारत के जनमत के खोखले वायदे का अवशेष बनकर रह गया, गोरे लोगों के बोझ का तर्क कि जो कुछ किया जा रहा है उन्हीं के भले के लिए हो रहा है, मज़बूत हो गया और हमारे व्हाट्सएप समूहों और अधिकारिक घोषणाओं में फिर सामने आ गया।

कश्मीर को अंधा बनाने और दबाने वाली भगवा पगड़ी की तस्वीरें देश भर में सोशल मीडिया पर फैलने लगीं, जब लोगों ने ‘कश्मीर हमारा हो गया’ पल का जश्न मनाया। कश्मीर को विकास से जोड़ने के लिए पेश किए गए विभिन्न ‘तर्कों’ में नारी मुक्ति आवरण मात्र है, जैसे कि भगवा मर्द कश्मीरी महिलाओं को उनके पुरुषों से बचाने की घोषणाएं कर रहे हैं क्योंकि अनुच्छेद 370 हटने से कश्मीरी पुरुष भारतीय संविधान के अधिकार क्षेत्र में आ गए हैं जिसने मुस्लिम महिलाओं के ‘भले’ के लिए तीन तलाक का अपराधीकरण किया है। यह तथ्य कि तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं के आन्दोलन का दक्षिणपंथी राज्यसत्ता ने विनियोग कर लिया, से अपने आप में पितातुल्य भलाई करने वाली पितृसत्ता (पेट्रिआर्की)   की बू आती है और इस पर अलग से विमर्श की ज़रुरत है।

आर्टिकल 35ए हटाने को लेकर भी जश्न का माहौल है कि अपने समुदाय से बाहर शादी करने वाली कश्मीरी महिलाओं के संपत्ति अधिकार सुरक्षित होंगे। जब यह सवाल किया जाता है कि विश्व के सर्वाधिक सैन्यीकृत क्षेत्र में महिलाओं के लिए संपत्ति अधिकारों का कोई अर्थ है भी, तो जवाब में चुप्पी और व्हाटअबाऊटरी ही सुनने को मिलती है। इसी तरह, यह दावा किया जा रहा है कि इस कदम से कश्मीर के समलैंगिक लोगों को मुक्ति मिलेगी क्योंकि अब वह स्वतंत्र रूप से ऐसी जगह रह सकेंगे जहाँ समलैंगिकता अपराध नहीं है। कि यही वह भारतीय सरकार है जो अपनी सेना का इस्तेमाल महिलाओं के उत्पीडन और बलात्कार से अनादर करने के लिए करती है, ऐसी कहानी बन गया है जो देशद्रोहियों ने गढ़ी है, जबकि कश्मीर घेराबंदी और संचारबंदी के कारण कुछ बोल ही नहीं पा रहा। यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि मुस्लिम महिलाओं को बचाना विश्वभर में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का बहाना है। मध्य पूर्व में अमरीकी सरकार के हस्तक्षेप और आक्रमण के लिए भी ‘बचाने’ का बहाना है।

साम्राज्यवादी योजना नंगे रूप में उस समय खुद सामने आ गयी जब प्रधानमंत्री के राष्ट्र को संबोधन में घोषित किया गया कि कश्मीर अब विकास के लिए खुल गया है और अम्बानी और अदानी नयी ज़मीनी फतह कर सकते हैं। रियल एस्टेट कंपनियां डल झील के सामने मकान खरीदने के मध्यम वर्गीय के सपनों को दर्शाते विज्ञापन देने लगीं और मंत्रियों ने घोषणाएं कीं कि अब कश्मीरी लड़कियां बहू के रूप में लाकर हरियाणा में लिंगानुपात संतुलित किया जा सकेगा। यह राष्ट्र निर्माण परियोजना की लैंगिक अवधारणाओं से बहुत अलग भी नहीं है और न ही महिलाओं को परिग्रहण के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने के पितृसत्तात्मक षड्यंत्र से अलग है। कश्मीरी महिलाओं को उपनिवेशवादी विजय के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रवादी परियोजना का वैचारिक उपकरण रहा है। इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 5 अगस्त 2019 के बाद कश्मीरी महिलाओं की तस्वीरों या ‘कश्मीरी महिलाओं से शादी कैसे करें’ के गूगल सर्च बढ़ गए। यह लेख कहना यह चाहता है कि यह सिर्फ आकस्मिक स्त्रियों से द्वेष (मिसोजिनी) नहीं है। हमें इसे कब्ज़े के अन्तर्निहित वैचारिक औज़ार के रूप में देखना चाहिये।

उत्तर-औपनिवेशिक राष्ट्र गठन परियोजना की प्रक्रिया में भी महिलाओं की नागरिकता रिश्तों के नेटवर्क के ज़रिये निर्धारित की जाती रही है। इसी तरह महिलाओं के शरीर हमेशा पुरुष नागरिकों के ज़रिये संवाद के लिए राजनीतिक अखाड़े के रूप में इस्तेमाल किये जाते रहे हैं। याद कीजिये, विभाजन के समय राष्ट्र निर्माण परियोजना के दौरान कैसे, महिलाओं के शरीर ‘दूसरे’ समुदाय को राजनीतिक सन्देश भेजने के लिए इस्तेमाल किये गए थे। इसी तरह विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान ने एक करार पर हस्ताक्षर किये जिसमें दोनों नए बने देशों ने विभाजन के दौरान अपहृत महिलाओं के पिता जैसी भूमिका निभाने का निर्णय लिया और आपस में तय किया कि उन महिलाओं को ‘पुन:प्राप्त’ किया जाएगा और अपने अपने देश में उनका ‘पुनर्वास’ किया जाएगा।

पुन:प्राप्ति और पुनर्वास की भाषा यहां हिन्दू और सिख महिलाओं को हिन्दू और सिख समुदायों को और मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम समुदाय को सौंपने के तौर पर देखा जा सकता है। महिलाओं की सहमति या उनका अस्तित्व, उनकी महत्ता राष्ट्र की ‘बेटियों’ की रक्षा और उनके स्वामित्व पर दावे की राष्ट्रवादी परियोजना में महत्वहीन थी। इसी सन्दर्भ में ‘एकीकरण’ की प्रक्रिया देखिये जिसका वायदा सरकार अनुच्छेद 370 हटाने के ज़रिये करती है, ज़मीन का स्वामित्व और कश्मीरी महिलाओं से शादी करने की बात, यह भारतीय राज्यसत्ता की औपनिवेशिक आकांक्षाओं को दर्शाती है।



कश्मीर के सैन्यीकरण के आरम्भ से ही भारत कश्मीरी महिलाओं के शरीरों को ‘लाक्षणिक क्षेत्रों’ के रूप में इस्तेमाल कर रहा है जिनके ज़रिये भारत अपने राजनीतिक सन्देश भेजता है। बलात्कार कश्मीर में राष्ट्रवाद पर ज़ोर देने के लिए युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। कुनान पोश्पोरा, शोपियां और कठुआ के भयावह मामले याद कीजिये जहाँ कश्मीरी महिलाएं राज्यसत्ता के लिए राजनीतिक शरीर बन गयीं, जिन पर कि उनके प्रभुत्ववादी पौरुष को थोपने के लिए चेतावनियाँ लिखी जाती हैं। कश्मीरी महिलाओं का वस्तुकरण भी भारतीय राजनीतिक नैरेटिव में नया नहीं है। बॉलीवुड पटकथाओं में न जाने कब से कश्मीरी महिलाओं का भारतीय नायकों से प्यार और शादी के ज़रिये ‘भारतीयकरण’ किया जा रहा है। इस तरह कश्मीर हमारी भारतीय कल्पना में हमेशा ऐसी खूबसूरत जगह रहा है जिसे हमें फतह करना है, उसका मालिक बनना है और कश्मीरी महिलाओं को परिग्रहण के, औपनिवेशिक फतह के उपकरणों के तौर पर देखा जाता है जिनकी इच्छाएं, आकांक्षाएं केवल उन्हें चाहने वालों से ही परिभाषित हो सकती हैं।

इस तरह स्त्रियों से द्वेष कब्ज़े की आकस्मिक संगत नहीं है, हमें इसे कब्ज़े के बुनियादी सिद्धांत, राष्ट्रवाद के अन्तर्निहित आधार के तौर पर पहचानना होगा। कश्मीरी महिलाओं के अस्तित्व को ख़ारिज करना, उनके स्वरों, असहमति, विरोध प्रदर्शनों, प्रतिरोधों को ख़ारिज करना और इनकी पूरी उपेक्षा आवश्यक है गोरे या यूं कहें कि सवर्ण हिन्दू पुरुष के बोझ की वकालत के लिए। यह भारतीय राज्य के लिए ज़रूरी है कि कश्मीरी महिलाओं को लाचार, उग्रवादियों और इस्लामिक कट्टरपंथ के अत्याचारों के बीच दबी-कुचली दिखाना, ताकि कश्मीर पर कब्ज़ा करने को न्यायोचित ठहराया जा सके।

पर यही वक्त है कि हम ऐसे नज़रियों को खारिज करें। हम, जिन्होंने कभी अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद की औपनिवेशिक आकांक्षाओं की दासियां बनने से इनकार किया था, हम, जिन्होंने महिलाओं के अस्तित्व, उनकी पसंद, प्यार करने, लिंग के आत्मनिर्णय अधिकार के लिए आवाज़ उठाई है, हम जिन्होंने आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी है, हम जिन्होंने हमेशा ज़ोर देकर कहा है कि ‘हमारे बिना हमारे बारे में कुछ नहीं’, हम जो जानती हैं कि थोपा जाना, कर्फ्यूग्रस्त जीवन जीना क्या होता है, हम जिन्हें अपनी पहचान भूलने, सम्मिलित होने के लिए कहा जाता रहा है, हमको कश्मीर के साथ, कश्मीरी महिलाओं के साथ खड़े होने की ज़रूरत है।

मुक्ति आन्दोलन कभी कर्फ्यूग्रस्त नहीं हो सकते। लोगों की आकांक्षाओं को कभी सैन्यीकरण से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। कश्मीरी महिलाएं जो कहना चाहती हैं, वह कविताओं, गीतों, नारों, मातम, यादों के ज़रिये, प्रेस सम्मेलनों, सोशल मीडिया, सड़कों और अन्त यात्राओं और शुक्रवारी प्रदर्शनों में कह रही हैं। हमें केवल उन्हें सुनने की और उन्हें अपनी बात कहने देने की ज़रूरत है।
‘शूटिंग एन एलीफेन्ट’ में ओरवेल ने लिखा था, “जब गोरा आदमी तानाशाह बनता है वह अपनी स्वतंत्रता को ही नष्ट करता है।” एक कब्ज़ा करने वाले देश के निवासियों के रूप में हमें इस पर कश्मीर के लोगों के लिए ही नहीं पर अपने लिए भी विचार करना होगा।

(झेलम रॉय जादवपुर यूनिवर्सिटी, कोलकाता की पीएचडी छात्रा हैं। उनका लेख 12 सितम्बर 2019 को काउंटर-करेंट्स वेबसाइट पर छपा था। इसका अनुवाद कश्मीर ख़बर ने किया है।)


मूल लेख-https://countercurrents.org/2019/09/kashmir-the-new-white-mans-burden

कश्मीर ख़बर – https://www.facebook.com/kashmirkhabar1/

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(89वें दिन का कश्मीर)
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This post was last modified on November 1, 2019 7:13 pm

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