Friday, December 2, 2022

डॉक्टर्स डे: खतरे में क्यों हैं डॉक्टर

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प्रायः जून के महीने का दूसरा पखवाड़ा आते आते चिकित्सा और समाज सेवा से जुड़े संगठन 1 जुलाई को होने वाले डॉक्टर्स डे की तैयारी में लग जाते हैं। परंतु इस बार यह वक्फा अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित, वर्तमान सुरक्षा उपायों और कानूनी प्रावधानों से असंतुष्ट व असहमत तथा शासन-प्रशासन के असंवेदनशील रवैये से आहत डॉक्टरों के राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों को समर्पित रहा। डॉक्टरों के प्रति असंतुष्ट और आक्रोशित मरीजों की शाब्दिक और शारीरिक हिंसा कोई नई परिघटना नहीं है। 1892 में अमेरिका की एक प्रसिद्ध शोध पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र असाल्टस अपॉन मेडिकल मैन की प्रारंभिक पंक्तियां हमें बताती हैं कि डॉक्टरों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति न तो नई है न ही केवल हमारे देश तक सीमित है, शोध पत्र कहता है कि चिकित्सक कितना ही ईमानदार, कर्त्तव्य परायण  और समर्पित   क्यों न  हो  वह यह दावा नहींं कर सकता कि उसे अनावश्यक आक्रमण, दुर्भावनापूर्ण दोषारोपण, ब्लैकमेल और इलाज के दौरान मरीज को हुए कथित नुकसान के लिए मुकद्दमों का सामना नहीं करना पड़ेगा। 

एशियाई देशों में चीन डॉक्टरों पर होने वाली हिंसा के लिए 2010 के बाद से निरंतर चर्चा में रहा है। विश्व में प्रकाशित मेडिकल जर्नल्स में इम्पैक्ट फैक्टर की दृष्टि से दूसरा स्थान रखने वाले द लैंसेट का 2014 का एक संपादकीय चीन में डॉक्टरों के साथ होने वाली बर्बरता और अनेक डॉक्टरों के कोल्ड ब्लडेड मर्डर की चर्चा करता है। इजराइल में 1999 में किया गया एक अध्ययन यह दर्शाता है कि इमरजेंसी में कार्य करने वाले 70 प्रतिशत डॉक्टरों और 90 प्रतिशत सपोर्ट स्टॉफ को हिंसा का सामना करना पड़ा। अमेरिका में तो 1980-90 के दशक में ही 100 से अधिक हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स हिंसा में मारे गए। यह आंकड़ा आने वाले दशकों में कमोबेश वैसा ही रहा है। ब्रिटेन में हाल ही में 600 डॉक्टरों पर किए गए एक सर्वेक्षण में यह पता चला कि इनमें से एक तिहाई को किसी न किसी तरह की हिंसा का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी मुल्कों में भी हालात कुछ जुदा नहीं हैं। 

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा 2015 में कराया गया एक अध्ययन यह उजागर करता है कि कार्य के दौरान 75 प्रतिशत डॉक्टरों को हिंसा का सामना करना पड़ा। जर्नल ऑफ हेल्थ रिसर्च एंड रिव्युज इन डेवलपिंग कन्ट्रीज में दिसंबर 2018 में प्रकाशित एक शोधपत्र 2006 से 2017 के मध्य भारत में डॉक्टरों के साथ हुई हिंसा पर केंद्रित है। इस अवधि में हुए 100 गंभीर और सांघातिक हिंसा के मामलों में से 2015 एवं 2016 में 17- 17 मामले और 2017 में 14 मामले दर्ज हुए हैं। इस प्रकार डॉक्टरों के साथ हिंसा की घटनाएं पिछले 4 वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ी हैं। यह हिंसा डॉक्टरों के साथ मारपीट तक ही सीमित नहीं है, उन पर जानलेवा हमले किए गए हैं। हॉस्पिटल की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया है और अन्य मरीजों के जीवन को भी हिंसक भीड़ द्वारा खतरे में डाला गया है।

पिछले 15 वर्षों में भारत के 19 राज्यों में डॉक्टरों एवं  मेडिकल सपोर्ट स्टॉफ के साथ होने वाली हिंसा और अस्पतालों की संपत्ति को पहुंचने वाले नुकसान के विषय में कानून बनाए गए हैं। किंतु  विभिन्न आरटीआई एक्टिविस्ट्स द्वारा मांगी गई सूचना के आधार पर पता चलता है कि अधिकांश मामलों में एफआईआर ही दर्ज नहीं हुई। जिन इक्का दुक्का मामलों में एफआईआर दर्ज हुई उनमें या तो समझौता हो गया और मामला कोर्ट तक नहीं पहुंचा या फिर कोर्ट में आरोपी बरी हो गए। डॉक्टरों पर हिंसा के लिए दोषी सिद्ध होकर दंडित होने वाले लोगों की संख्या नगण्य रही है।

डॉक्टरों पर होने वाली हिंसा का स्वरूप पश्चिम देशों और भारत में बिल्कुल अलग अलग है। पश्चिमी देशों में अल्कोहलिक, ड्रग एडिक्ट, तथा मनोरोगों से ग्रस्त मरीज इलाज के दौरान उग्र होकर डॉक्टरों पर हमला कर बैठते हैं। कनाडा एवं यूरोपीय देशों में अपने नागरिकों की स्वास्थ्य रक्षा का खर्च सरकारों द्वारा उठाया जाता है। इन देशों में डॉक्टर सुबह शाम नियमित रूप से हाउस कॉल पर घरों की विजिट भी करते हैं। अतः इलाज में आने वाले खर्च के प्रति असंतोष के कारण उपजे तनाव के फलस्वरूप डॉक्टरों पर हमले होने की आशंका नहीं होती। अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाएं महंगी हैं और इनका खर्च नागरिकों के स्वास्थ्य बीमे के माध्यम से उठाया जाता है। किंतु इन बीमा कंपनियों का भारी भरकम प्रीमियम न दे पाने के कारण बहुत से नागरिक बीमा कवर से वंचित रह जाते हैं और उन पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। कई बार यह तनाव और हिंसा का कारण बन जाता है।

भारत में डॉक्टरों पर होने वाले हमले मरीजों के परिजनों, उनकी मदद के लिए आए बाहुबली की छवि रखने वाले  तथाकथित समाजसेवियों या छात्र नेताओं या राजनीतिक दलों के सक्रिय कार्यकर्ताओं एवं नेताओं द्वारा अंजाम दिए जाते हैं। कई बार स्वयं को पत्रकार कहने वाले अपराधी तत्व भी इस तरह की हिंसक गतिविधियां करते हैं। 

डॉक्टरों पर होने वाली हिंसा के कारण अनेक हैं। सरकारी अस्पतालों में मूलभूत सुविधाओं का घनघोर अभाव रहता है। डॉक्टरों और सहायक मेडिकल स्टॉफ की संख्या आवश्यकता से बहुत कम होती है। लंबी प्रतीक्षा के बाद मरीजों को डॉक्टर से मिलने का अवसर मिलता है। काम के दबाव के कारण डॉक्टर उन्हें न तो समय दे पाता है न उनसे मधुर व्यवहार कर पाता है। सरकारी अस्पतालों में प्रायः इमरजेंसी और आईसीयू में जीवन रक्षक उपकरण खराब होते हैं या समुचित मात्रा में नहीं होते। यहां बिस्तरों की संख्या कम होती है। अनेक प्रकार के डायग्नोस्टिक परीक्षणों की सुविधा सरकारी अस्पतालों में न होने के कारण मरीजों को बाहर निजी प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। हॉस्पिटल में गंदगी और अव्यवस्था का आलम रहता है। मरीजों की देखरेख के लिए यहां का नर्सिंग स्टॉफ अपर्याप्त होता है। जो स्टॉफ होता है उसमें समर्पण का अभाव होता है। इस कारण मरीजों के साथ बड़ी संख्या में परिजनों, हितचिंतकों और मित्रों की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है जो दवा खरीदने, जांच रिपोर्ट लाने जैसे कार्यों को सम्पन्न करते हैं। ये ही आक्रोशित होकर हिंसा को अंजाम देते हैं।

 स्वास्थ्य सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और राजनीति का हस्तक्षेप डॉक्टरों के प्रति असंतोष और आक्रोश को बढ़ाने का एक मुख्य कारण है। सरकारी डॉक्टर तबादले, मनचाहे स्थान पर पदस्थापना और अन्य लाभों के लिए राजनेताओं की कृपा पर निर्भर होते हैं। इनमें से अनेक प्राइवेट नर्सिंग होम इत्यादि से जुड़े होते हैं और शासकीय कार्य से अनुपस्थित रह सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीजों को इन निजी चिकित्सालयों में इलाज के लिए बाध्य भी करते हैं। जन असंतोष बढ़ने पर राजनेताओं का संरक्षण ही काम आता है। भ्रष्टाचार बिना उभयपक्षीय सहयोग के नहीं चल सकता। आम जन भी बेहतर इलाज के लिए और बिना पात्रता के योजनाओं का लाभ पाने के लिए डॉक्टरों पर राजनीतिक दबाव बनाने और रिश्वतखोरी को बढ़ावा देने का कार्य करते हैं। गिरफ्तारी और जेल से बचने के लिए रसूखदार लोगों का किसी गंभीर बीमारी का बहाना कर आईसीयू में भर्ती होना एक आम चलन बन गया है। हीरा कारोबारी भरत शाह द्वारा गिरफ्तारी के बाद बीमारी के दौरान मुम्बई के एक जाने माने अस्पताल में दाखिल होने और फिर वहां शानदार जन्मदिन समारोह मनाने की खबरें चर्चित हुई थीं। मुम्बई के एक अग्रणी चिकित्सालय पर अपराधियों को कानून से बचाने के लिए शरण देने का आरोप लगा था। जब राजनेताओं व डॉक्टरों के इस भ्रष्ट गठबंधन में खटास आ जाती है तब इसकी परिणति हिंसा में होती है।

महाराष्ट्र के एक क्षेत्रीय दल के नेता आनंद दिघे की थाणे के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान कथित लापरवाही के कारण हुई मृत्यु के बाद भड़की हिंसा और तोड़फोड़ में अस्पताल को लगभग 10 करोड़ रुपए की क्षति होने का अनुमान लगाया गया था। निजी चिकित्सा एक अकूत मुनाफा देने वाले धंधे का रूप धारण कर चुकी है और हम जानते हैं कि प्रत्येक संपत्ति साम्राज्य की नींव अपराध पर टिकी होती है, यही निजी चिकित्सालयों के साथ हो रहा है। निजी चिकित्सालयों द्वारा मनमाना शुल्क वसूलने और मृतक मरीज के परिजनों द्वारा इसकी अदायगी न कर पाने पर शव को उन्हें न सौंपने के वाकये अकसर चर्चा में रहते हैं। डॉक्टरों के साथ होने वाली हिंसा की रिपोर्ट न होने या होने पर भी समझौता हो जाने की प्रवृत्ति के पीछे भी यह भ्रष्ट गठबंधन उत्तरदायी है। डॉक्टर दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने के लिए या तो खुद को नैतिक रूप से कमजोर पाते हैं या उन्हें भ्रष्ट राजनेताओं और अपराधी तत्त्वों द्वारा भयभीत कर दिया जाता है।

डॉक्टरों द्वारा पिछले तीन चार साल में चिकित्सालयों में सुरक्षा प्रबंधों के संबंध में अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। कुछ क्षेत्रों को सुरक्षा की दृष्टि से अति संवेदनशील माना गया है। इनमें इमरजेंसी सर्वप्रमुख है जहां कार्य करते हुए सर्वाधिक डॉक्टर हिंसा का शिकार हुए हैं। आईसीयू और उसके आसपास का क्षेत्र, शिशु रोग वार्ड तथा बिलिंग एरिया और प्रतीक्षालय भी हिंसा के केंद्र रहे हैं। डॉक्टरों द्वारा मरीजों के साथ आने वाले अटेंडेंट की संख्या को एक तक सीमित करने का सुझाव दिया गया है। संवेदनशील क्षेत्रों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था देने तथा ऑटोमैटिक लॉक युक्त दरवाजों का प्रयोग करने का सुझाव भी है। प्रत्येक हॉस्पिटल में एक ऐसा सुरक्षित क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव है जिसमें हिंसा भड़कने पर खुद को बन्द किया जा सके और जहां से पुलिस बल आदि को बुलाया जा सके। डॉक्टरों और उनके सपोर्टिंग स्टॉफ को सॉफ्ट स्किल की ट्रेनिंग दिए जाने की भी आवश्यकता बताई गई है जिससे वे तनावपूर्ण परिस्थितियों का मुकाबला कर सकें। डॉक्टरों और मरीजों तथा उनके परिजनों के बीच बेहतर संवाद की जरूरत बताई गई है।

अनेक मरीज व उनके परिजन अशिक्षित होते हैं। वे डॉक्टर द्वारा बोली जाने वाली भाषा भी नहीं समझते। ऐसी दशा में स्थानीय भाषा समझने वाले दुभाषिये की मदद से इन्हें इलाज के दौरान अनहोनी की संभावना और संभावित खर्च के विषय में आगाह किया जा सकता है। डॉक्टरों द्वारा किए गए असाधारण सेवा कार्यों की व्यापक मीडिया कवरेज देने का भी सुझाव है जिससे उनकी नकारात्मक छवि टूटे। मीडिया और डॉक्टरों के मध्य बेहतर संवाद स्थापित करने के लिए नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन कराने तथा मीडिया के लोगों को हॉस्पिटल की कार्य प्रणाली से परिचित कराने का भी सुझाव दिया गया है। छोटे कस्बों और ग्रामों में ग्राम सभाओं और स्थानीय संस्थाओं द्वारा डॉक्टरों पर हमला करने वालों पर जुर्माना आदि लगाया जा सकता है। चीन में डॉक्टरों पर आक्रमण करने वालों को राज्य की सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं के लाभों से वंचित कर दिया जाता है। ऐसा ही प्रयोग भारत में किया जा सकता है।

यह सुझाव महत्वपूर्ण हैं। किंतु भारत जैसे देश में जहां हेल्थकेयर पर होने वाले खर्च का 70 प्रतिशत भाग लोगों को अपनी जेब से देना पड़ता है, जहां जीडीपी का केवल 1.15 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है और जहां 11082 लोगों को सेवा देने के लिए केवल एक सरकारी डॉक्टर है, इन सुझावों को किस प्रकार क्रियान्वित किया जा सकेगा, यह भविष्य ही बताएगा। सरकारों की नीतियां चिकित्सा और चिकित्सा शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने की ओर अग्रसर हैं। आज चिकित्सा शिक्षा माफिया और चिकित्सा शिक्षा उद्योग जैसी अभिव्यक्तियां प्रचलन में हैं और अनेक राजनेताओं का नाम अप्रिय संदर्भों में इनसे जुड़ता रहा है। निजीकरण के बाद चिकित्सा शिक्षा दरअसल मेडिकल स्टूडेंट पर किया गया एक भारी निवेश बन जाती है। इसके बाद जो डॉक्टर इन निजी संस्थानों से पढ़कर बाहर आता है उसका एकमात्र उद्देश्य धन अर्जन होता है।

भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के कारण भारत में निजीकरण के वे चंद लाभ भी नजर नहीं आते जो हम विकसित देशों में देखते हैं। यदि सरकारी अस्पतालों का स्तर ऊंचा उठ जाएगा तो फिर कॉरपोरेट अस्पतालों को मुनाफा कैसे होगा? इस प्रकार मानव और भौतिक संसाधनों की कमी से जूझते सरकारी अस्पतालों में इलाज करने वाले डॉक्टरों को जनता के गुस्से और हिंसा के खतरे का सामना करना ही होगा और कॉर्पोरेट हॉस्पिटलों की मुनाफे की लूट का जाने अनजाने भाग बनने वाले डॉक्टरों तक लोगों के आक्रोश की आंच पहुंचेगी ही। डॉक्टर स्वास्थ्य सेवाओं का वह अंग है जो जनता से सीधे संपर्क में होता है, इसलिए प्रशासनिक लापरवाही और कुव्यवस्था से उपजे जन असंतोष का पहला शिकार भी इन्हीं को बनना पड़ता है।

शायद डॉक्टर अब अपने मरीजों का समर्पित सेवक न रहकर भारी भरकम फीस लेकर इलाज करने वाला सेवा प्रदाता बन गया है। अब रोगी-चिकित्सक संबंध का आधार सेवा और समर्पण न होकर सौदा बन गया है। यही कारण है कि समाज में डॉक्टरों की छवि धूमिल हुई है और उनकी कर्त्तव्य निष्ठा पर प्रश्न चिह्न लगे हैं। 

भारत रत्न डॉ बिधान चंद्र रॉय के जन्म एवं निर्वाण दिवस 1 जुलाई को मनाए जाने वाले डॉक्टर्स डे के अवसर पर एक चर्चित प्रसंग का उल्लेख आज के चिकित्सकों और राजनेताओं दोनों हेतु आवश्यक लगता है,संभवतः सन 1933 में मई माह में जब हरिजनों के हितों की रक्षा के लिए महात्मा गाँधी पूना में 21 दिन के उपवास पर थे,उनकी अवस्था चिंताजनक थी, तब उनके मित्र और चिकित्सक डॉ बी सी रॉय उनकी चिकित्सा के लिए आए। बापू ने पहले तो औषधि लेने से इंकार कर दिया क्योंकि वे भारत में निर्मित नहीं थीं।

उन्होंने डॉ बी सी रॉय से कहा- तुम मेरी मुफ्त चिकित्सा करने आये हो किन्तु क्या तुम देश के 40 करोड़ लोगों को मुफ्त इलाज दे सकते हो? डॉ रॉय ने उत्तर दिया- नहीं। मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं सबका मुफ्त इलाज नहीं कर सकता। लेकिन यहाँ मैं मोहन दास करमचंद गाँधी का इलाज करने नहीं आया हूँ, बल्कि उस व्यक्ति का इलाज करने आया हूँ जिसे मैं हमारे देश की 40 करोड़ जनता का प्रतिनिधि समझता हूँ। कहा जाता है कि इस उत्तर को सुनकर बापू ने हथियार डाल दिए और चिकित्सा के लिए सहमत हो गए। दुर्भाग्य से न तो अब बापू जैसे नेता हैं न डॉ बी सी रॉय जैसे चिकित्सक। फिर भी डॉक्टर्स डे यह अवसर तो प्रदान करता ही है कि इन विभूतियों के बहाने भुलाए जा रहे उदात्त जीवन मूल्यों की महत्ता का स्मरण किया जाए।

(डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)  

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