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Categories: बीच बहस

गांवों से शुरू हो गयी मजदूरों की वापसी, लेकिन काम का टोटा

महामारी के दौरान 3 करोड़ मजदूर गांव की तरफ निकल गये थे। सवाल है कि क्या वे शहर में काम पर लौटेंगे? और उनकी मजदूरी में वृद्धि का क्या हुआ?

ग्रामीण भारत के 60 प्रतिशत प्रवास महत्वाकांक्षा से प्रेरित हैं। शहर में उन्हें 2.50 गुना अधिक आय की संभावना रहती है। यह स्थिति गांव में दी जानी वाली मजदूरी बढ़ने तक रहेगी। तो, क्या गांव की आय में बढ़ोत्तरी होगी? दुखद है, हमें नहीं लगता है।

यह सच है कि ग्रामीण सुधार को लेकर उत्साहित हैं। गांव शहरों की तरह कठिन लाॅकडाउन नहीं झेले। सरकार ने यहां बहुत से अच्छे प्रावधान लागू कराये। मानसून की बारिश अच्छी है और फसल की बुआई भी अच्छी है। लेकिन यह उम्मीद बहुत दिन नहीं चल सकेगी यदि ग्रामीण स्तर पर लंबी अवधि की आय वाली व्यवस्था नहीं की गई।

हालांकि, सरकार ने नरेगा की लागत और वेतन में वृद्धि किया है, काम की मांग के साथ-साथ योजना पिछड़ रही है। इससे ग्रामीण आय को ऊंचा उठाने में यह कारगर साबित नहीं होगा।

निर्माण कार्य का कम हो जाना भी नुकसानदायक है। बहुत से ग्रामीण भारतीय जो भूमिहीन हैं, उनके मकान बनाने के काम में लग जाने की संभावना रहती है। रीयल इस्टेट और प्राॅपर्टी डेवलपमेंट के काम में 70 प्रतिशत संकटग्रस्त नाॅन-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के पैसों पर निर्भर हैं। जब तक कि ऋण की व्यवस्था वापस नहीं आती, निर्माण-कार्य सामान्य स्तर पर नहीं आयेगा। इसका मतलब है कि तब तक गांव में मजदूरी में वृद्धि नहीं होगी।

ऋण बढ़ने की वजह से भी मजदूरी गिर रही है। उधार उठाने और कुछ सालों से मुद्रास्फीत में गिरावट से ग्रामीण भारत की ‘वास्तविक’ ऋणग्रस्तता बढ़ी है, खासकर जमीन मालिक जो जमीन जोतने की एवज में भुगतान करते हैं। यह समस्या ऊंचा वेतन दे सकने की उनकी क्षमता को कमतर कर रही है।

यह संभव है कि ग्रामीण मजदूरी कुछ समय के लिए आसरा बन सकती है। वर्तमान मौसमी बुआई मजबूत है, इसके लिए जमीन पर और भी हाथ चाहिए। लेकिन यह जो मांग है वह वर्तमान खेती की मांग के साथ खत्म हो सकती है। इसमें यह बात निहित है कि ‘आकांक्षा’ पाले ये मजदूर तब बेहतर मजदूरी के लिए शहर की नौकरी की ओर लौट सकते हैं।

तो, क्या ये मजदूर शहरी भारत में लौट रहे हैं? बेरोजगारी की दर गिरी है और अप्रैल से श्रम-बाजार में सुधार हो रहा है।

शुरुआती साक्ष्य मिलने लगे हैं। मजदूर शहर में लौटने लगे हैं। कुछ अनुमानों में 15,500 प्रवासी अपने गांव को छोड़कर शहर की तरफ बढ़े हैं और अन्य राज्यों में गये हैं और महाराष्ट्र में प्रतिदिन वापसी कर रहे हैं। विशेष ट्रेनें जो मजदूरों को वापस गांव ले जा रही थीं, जून की शुरुआत में यह यात्रा एकदम कम हो गई थी। वास्तव में अब ऐसी ट्रेन की मांग है जो मजदूरों को शहर वापस ला सके।

वर्तमान खेती के मौसम के खत्म होते होते प्रवासी मजदूरों की वापसी लंबे समय तक नहीं रुकेगी। यह उम्मीद की जा रही है कि महामारी का उछाल तब तक खत्म हो चुका रहेगा। यदि हालात उल्टे भी रहे, तब भी ये ग्रामीण भारत के मजदूर शहरी भारत में काम की उपलब्धता चाह रहे हैं। इस तरह, वे क्या चाहते हैं? मजदूरी।

उपरोक्त कारणों से यह समझा जा सकता है कि मजदूरी के प्रति दृष्टिकोण पूर्व-महामारी की अपेक्षा और भी बुरा हुआ है। दरअसल, भारत में मजदूरी की समस्या नौकरी से ज्यादा विकट है।

जैसे, नोटबंदी के दौरान मजदूरों को नौकरियां तो मिलीं लेकिन मजदूरी कम हो चुकी थी। नोटबंदी के दौरान धीरे-धीरे बेरोजगारी गिरी थी लेकिन यह ग्रामीण रोजगार की मांग में वृद्धि की वजह से हुआ था न कि शहर के रोजगार से। उस समय ग्रामीण भारत ने शहर की अपेक्षा दोगुना रोजगार पैदा किया था। उस समय में रोजगार की वृद्धि की अवधि में मजदूरी में गिरावट का ग्राफ देखा जा सकता है।

इस बात का निहितार्थ क्या है? एक व्याख्या है कि शहर के रोजगार में कमी आई और ऐसे में मजदूर ग्रामीण भारत में नौकरी की तरफ गये जहां शहर की मजदूरी का 40 प्रतिशत ही भुगतान किया जाता है। ऐसे ही स्थिति आज भी है। अप्रैल और जुलाई के बीच श्रम-बाजार में थोड़ा सुधार हुआ है, और इससे ग्रामीण रोजगार तेजी से बढ़ेगा (लेकिन इसमें से अधिकांश मौसमी ही रहेंगे।)।

दूसरे दौर की महामारी से श्रम-बाजार कमजोर हो सकता है, यह पहले दौर की नौकरी खत्म होने और मजदूरी में गिरावट के रूप में सामने आ सकती है। यदि ऐसा होता है तब शहरी रोजगार का अवसर गिरेगा। खासकर, रेस्टाॅरेंट और आवासीय क्षेत्रों में यह गिरावट दिखेगी जो शहर में आम होगा और इसमें सुधार के लिए इंतजार करना होगा।

हमने देखा कि गांव और शहर की मजदूरी आर्थिक विकास के साथ जुड़ा हुई है। हम यह भी देख रहे हैं कि महामारी होने के बाद से भारत की मध्यम अवधि वाली विकास दर में 1 से 5 प्रतिशत की गिरावट है, यह अच्छे से काम नहीं कर रही है। ऐसे में बैंकिंग क्षेत्र पर बुरे लोन का भार बढ़ेगा, जबकि इससे टिकाऊ विकास की संचालक ताकतें कमजोर हो जाएंगी।

तो इसका हल क्या है? जो मजदूर आपूर्ति का संकट है, वह मुख्य नहीं है बल्कि इसमें कम मजदूरी भुगतान प्रमुख कारण है जिससे उनकी मांग में कमी हुई है। इसे शुरु करने के लिए जरूरी है कि यह संकट आवर्ती न हो जाए, इसमें नीति निर्माता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

खासकर, वे पूंजी की आपूर्ति को सुनिश्चित कर सकते हैं। इसके लिए भारत की बचत को इसमें लगाया जा सकता है जो अधिक उत्पादक होगा, और इसका परिणाम निवेश बनाये रखने में होगा। क्योंकि निवेश ही है जो अर्थव्यवस्था की क्षमता और श्रम के अच्छे भुगतान को सृजित करने के लिए जरूरी है।

कोविड-19 की पृष्ठभूमि में निवेश-वृद्धि के लिए पूंजी को पुनर्व्यवस्थित करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि जिन क्षेत्रों में पूंजी काम नहीं कर रही है उसे हटाकर नये क्षेत्रों में लगाना होगा। इसके लिए असंगतता और दिवालियापर प्रावधान की प्रक्रिया को ठीक करना होगा।

इसके लिए दूसरा कदम बैंकों को ठीक करना होगा जिससे पूंजी का प्रवाह बन सके, ऋण दिया जा सके। भारतीय बैंक जो एनपीए के पहाड़ से लद गये हैं और जो लगातार बढ़ता जा रहा है, इस बीमारी से हर हाल में बचना होगा। इसके लिए चिन्हीकरण, पुनर्संरचना, निदान, पुनर्पूंजीकरण और सुधार के रास्ते चलना होगा। यह उसके लिए लाभदायक है।

इस प्रकार, हमारा मानना है कि आपूर्ति में मजदूरों की वापसी वाला जो बिखराव दिख रहा है वह लंबे समय तक नहीं रहेगा लेकिन ऐसा कम मजदूरी की वजह से हुआ है और इससे मांग कम बनी रह सकती है। इसके लिए नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत है।

(प्रांजल भंडारी एचएसबीसी सिक्योरिटीज एण्ड कैपिटल मार्केट-इंडिया, प्राइवेट लिमिटेड, की मुख्य भारतीय अर्थशास्त्री हैं। अंग्रेजी के इस मूल लेख का हिंदी अनुवाद लेखक और एक्टिविस्ट अंजनी कुमार ने किया है।)

नोट: यह लेख एक ऐसे पंजीवादी अर्थशास्त्री का है जो खुद पूंजी की व्यवस्था को चलाने वालों में शामिल हैं। उनके नजरिये में ‘मजदूरी में वृद्धि’ शहरी अर्थव्यवस्था के लिए मुख्य और जरूरी पक्ष है। ज्यां द्रेज, अभिजीत बनर्जी, अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री इसके लिए ‘कीन्सियन सुधार’ की लगातार वकालत कर रहे हैं। यह सच है कि साम्राज्यवाद के दौर में वित्तीय प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है और पूंजी का ठोस रूप ‘मरणासन्न’ होने लगता है। लेकिन पूंजीवादी राज्य व्यवस्था को बचाये रखने के लिए जरूरी हो जाता है कि वित्तीय क्षेत्र पर नियंत्रण रखा जाए। इसी लिए तरह-तरह की विकासवादी, कल्याणकारी आदि आर्थिक सिद्धांतों को सामने लाया गया और ऐसे ही अर्थशास्त्रियों को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया।

यदि वित्तीय क्षेत्र को खुला छोड़ दिया जाए तो यह पूंजीवादी राज्य व्यवस्था के ‘लोकतंत्र’ को खाने लगता है और फासीवाद के अलग-अलग अवतारों में दिखने लगता है। यह लेख एक तरफ श्रम के मूल्य के भुगतान पर जोर देता है और दूसरी ओर ठोस पूंजी की बात करता है, हालांकि इस ठोस पूंजी को ठीक करने के लिए वह दबे स्वर में निजीकरण और ‘मध्यम अवधि वाले व्यवसाय’ यानी सेवा क्षेत्र में काम बढ़ाने, ऋण देने पर जोर देता है। यह भारतीय विकास का वही वित्तीय माॅडल है जो अनौपचारिक क्षेत्र के लूट के आधार पर चलता है और जिसकी पैदाइश भारत में दक्षिणपंथी राजनीति है। आज दक्षिणपंथी राजनीति अपने इस आधार को भी लात मारने में पीछे नहीं है। इस तरह यह लेख एक खास तरह के विरोधाभासों से भरा हुआ है। उम्मीद है, भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर चल रही चिंताओं से यह लेख लोगों को अवगत करा सकेगा।- संपादक

This post was last modified on August 28, 2020 2:27 pm

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi