Sunday, May 22, 2022

कोशी क्षेत्र में तबाही का कारण बना भूमि सर्वेक्षण

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जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बिहार की कोशी नदी के ‘दो पाटन के बीच फंसी’ आबादी नए किस्म की समस्या में उलझ गई है। समस्या जमीन के सर्वेक्षण की विशेष नियमावली की वजह से उत्पन्न हुई है। इसके अनुसार जिस जमीन पर नदी की धारा प्रवाहित है, उसे सरकारी भूमि के तौर पर निबंधित किया जाना है। अब कोशी की दोनों पाटों के बीच नदी की धाराएं अक्सर राह बदलती रहती हैं, नई धाराएं बनती हैं। कहीं बालू की ढेर इकट्ठा हो जाती है तो कहीं जंगल-झाड़ी उपज जाती है। इस तरह की सारी जमीन को ताजा सर्वेक्षण में सरकारी मिल्कियत करार दिया जाएगा। अगली बार बरसात के बाद धारा किसी दूसरी जगह होगी और कहीं बालू की ढेर होगी या जंगल-झाड़ी उग आएगी। तब वह जमीन बेआबाद हो जाएगी और उसे सरकारी करार दिया जा सकता है। इस तरह आबादी के धीरे-धीरे भूमिहीन हो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है। जलवायु परिवर्तन के दौर में धाराओं के राह बदलने और सिल्ट छोड़ने की प्रवृत्ति पहले से कहीं अधिक हुई है। इसलिए यह खतरा भी अधिक बड़ा है।

उल्लेखनीय है कि बिहार में चल रहे इस भूमि सर्वेक्षण में आधुनिक तकनीक खासकर रिमोट सेंसिंग की तस्वीरों का इस्तेमाल हो रहा है। तस्वीरों के आधार पर नदी की धारा, बालू की ढेर और जंगल-झाड़ी वाली जमीन को एक तरफ से सरकारी जमीन करार दिया जा रहा है। जिस जमीन के रैयत की पहचान हो रही है, उन रैयतों के लिए भी जमीन की मिल्कियत प्रमाणित करने के कागजात जुटाना आसान नहीं है। इस पूरी प्रक्रिया में गरीब किसान बुरी तरह तबाह हो रहे हैं। कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए हैं।  

इस मसले पर कोशी क्षेत्र के सुपौल में 25 अप्रैल को जन-सुनवाई हुई जिसकी अध्यक्षता पत्रकार अमरनाथ, सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार व स्थानीय समाजसेवी भुवनेश्वर प्रसाद ने की। इसमें कोशी तटबंधों के भीतर के विभिन्न इलाके से आए लोगों ने सर्वेक्षण के दौरान हो रही कठिनाइयों को विस्तार से बताया। अभी पहले चरण में सुपौल प्रखंड में सर्वेक्षण चल रहा है, जिले के अन्य प्रखंडों में सर्वेक्षण इसके बाद होगा। सर्वेक्षण के लिए रिमोट सेंसिंग से तस्वीर 2011-12 में लिया गया था। उसी तस्वीर के आधार पर सारा काम हो रहा है।

जन-सुनवाई में 1950 के दशक में कोशी तटबंध बनने के समय से इस क्षेत्र के लोगों के साथ हो रही वंचना का मामला भी उठा। लोग तटबंध बनने का विरोध कर रहे थे। देश के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने यहां आकर लोगों से सहयोग करने का अनुरोध किया और जिन लोगों को घर और खेती की जमीन छोड़ना पड़ेगा, उन्हें पर्याप्त मुआवजा व जमीन के बदले जमीन दिए जाने का आश्वासन दिया था। पर यह वायदा कभी पूरा नहीं हुआ। कुछ लोगों को घर बनाने की जमीन दी भी गई तो वह रिहाइश के लायक नहीं थी। लोग तभी से तबाही झेल रहे हैं। तबाही लगातार बढ़ती गई है। पूर्व सरपंच हरेराम जी ने कहा कि आजाद भारत में कोशीवासी गुलाम हो गए। सरकारी योजनाएं बनती भी हैं तो तटबंध के बाहर के इलाके में ही ठहर जाती हैं। उस इलाके में भी कुशहा-तटबंध टूटने से आए जल-प्लावन के दौरान कई वायदे किए गए, पर उन्हें पूरा नहीं किया गया। 

वर्तमान सर्वेक्षण कोशीवासियों की तबाही का नया दास्तान तैयार कर रहा है। इसके पहले 1967-68 में क्षेत्रीय सर्वेक्षण हुआ था। 85 में खतियान जारी हुआ। तब नदी का धारा जिस जगह थी, उस जमीन को सरकारी जमीन के तौर पर दर्ज किया गया। नए सर्वेक्षण में धारा जिस जमीन पर है, उसे सरकारी करार दिया जाने वाला है। पहले वाली जमीन तो सरकारी है ही। इस तरह रैयत के हाथ से उसकी जमीन निकल जाने वाली है। इसके खिलाफ बाद में कोई मुकदमा आदि भी नहीं किया जा सकेगा।

अध्यक्ष-मंडल के भुवनेश्वर जी ने कहा कि कायदे से जिस जमीन पर नदी की धारा प्रवाहित होने लगी है, उसके रैयत को मुआवजा दिया जाना चाहिए। पर यहां तो जमीन ही हाथ से निकल जाने की स्थिति बन गई है। उल्लेखनीय है कि नदी की धारा में फंसी जमीन का भूमि-राजस्व भी देना पड़ता है। इसे माफ करने के लिए दोनों पाटन के बीच बसी आबादी ने आंदोलन भी किया, पर कोई फल नहीं निकला। हालत तो यह है कि राजस्व के साथ-साथ विशेष कर (सेस) भी देने होते हैं। जिसमें भूमि राजस्व का 50 प्रतिशत स्वास्थ्य, 50 प्रतिशत शिक्षा, 25 प्रतिशत सड़क व 20 प्रतिशत कृषि विकास के मद में होता है। हालांकि तटबंधों के बीच में प्राथमिक स्वास्थ्य केंन्द्र, प्राथमिक विद्यालय, सड़क या खाद-बीज की आपूर्ति के इंतजाम कतई नहीं हैं। तटबंधों के बीच बसी आबादी के साथ चल रहे सरकारी अन्याय का यह प्रत्यक्ष सबूत है।

परमेश्वर यादव ने कहा कि 66-67 के सर्वेक्षण में भी कुछ गड़बड़ियां हुई थी, उसमें सुधार होना चाहिए। नए सर्वे में नदी के नाम पर जमीन दर्ज नहीं होना चाहिए। आलोक राय ने कहा कि यह सर्वेक्षण लोगों के विरुद्ध है। केवल पानी ही नहीं, बालू वाली जमीन जिसमें मेड नहीं है, उस सबको बिहार सरकार के खाते में डाला जा रहा है। फिर हम लोग कहां जाएंगे। इससे तो अच्छा है कि सरकार एकबारगी हम सभी की जमीन का अधिग्रहण कर ले और हमें मुआवजा दे दे। 

रंजीत ने कहा कि व्यवस्थित खतियान 1902-03 में बना था। लेकिन उसका कागज अब इतना खराब हो गया है कि प्रतिलिपि नहीं निकल पाती है। सुपौल में 70 के बाद के कागज उपलब्ध हैं, पर प्रति मिलने में दो-दो महीने लग जाते हैं। इसलिए जिन रैयतों की जमीन पानी या बालू में नहीं फंसी है, उन्हें भी अपनी मिल्कियत बताने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। यह बात भी सामने आई कि अमीन मौके पर नहीं जाते, किसी के दरवाजे पर बैठकर पूरे गांव के कागज लिख देते हैं।

महम्मद सदरुल ने कहा कि सरकार हमारे साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। इस बार आखिरी मौका है, अगर इस सर्वेक्षण में उसे मनमाना करने से नहीं रोका जा सका तो आने वाली पीढियां बर्बाद हो जाएगी। निर्मली के अरुण जी ने कहा कि बालू वाली जमीन को भी बिहार सरकार लिखा जाएगा, इससे तो कई गांव पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे।

पेशे से अमीन संतराम यादव ने बताया कि नदी क्षेत्र में जलधारा की जमीन का नक्शा बिंदू वाली लकीरों (डॉट) से बनाया जाता रहा है, जमीन का नंबर भी दिया जाता रहा है, इससे किसी रैयत की जमीन छिन जाने का खतरा नहीं होता। पर मौजूदा सर्वेक्षण में इस प्रावधान को लागू नहीं किया जा रहा है। उन्होंने पटना जिला में सर्वेक्षण में कार्यरत रहने के दौरान अपने अनुभवों को बताते हुए कहा कि नई निर्देशावली में बिंदु वाली लकीर बनाने का प्रावधान खत्म कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि अगर अभिलेख में जमीन बची रहेगी, तभी बाल-बच्चे भी उस पर कब्जेवार हो सकेगे। सरकारी जमीन करार दिए जाने पर तो यह भी नहीं हो सकेगा। उन्होंने कहा कि 66-67 के सर्वेक्षण के बाद 1971 में तत्कालीन निदेशक, सर्वेक्षण रामानुज के हस्ताक्षर से आदेश निकला था जिसमें धारा की जमीन का नक्शा बिन्दु वाली लकीरों से बनाने के लिए कहा गया था। इस आदेश में ही रैयत के नाम से खतियान बनाने का निर्देश था। 2011-12 में इन सारे प्रावधानों को समाप्त कर दिया गया है।

जन-सुनवाई में तय पाया गया कि वर्तमान सर्वेक्षण के खिलाफ सभी पंचायतों से सर्वेक्षण पदाधिकारी को आवेदन दिया जाए ताकि वर्तमान प्रावधानों के तहत सर्वेक्षण को रोकवाया जा सके। इन प्रावधानों के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी की जा रही है। अभी सुपौल प्रखंड के नौ पंचायतों में ग्रामीणों के विरोध के चलते सर्वेक्षण रुका हुआ है।

(अमरनाथ वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल पटना में रहते हैं।)

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