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कश्मीर में राष्ट्रवादी पाटों की चक्की में पिस रही है कानून-व्यवस्था

रणनीति का तकाजा होता है कि जब विपक्षी पर हमलावर होना हो तो स्वयं को एक छोटे टारगेट में तब्दील कर लो ताकि किसी पलटवार के नुकसान से बच सको। कश्मीर घाटी में ठीक इसका उलटा हो रहा है। आतंकियों को हमला करने के लिए ऐसे नए टारगेट मुहैय्या किये जा रहे हैं जिन्हें पूर्ण सुरक्षा नहीं दी जा सकती। सरकारी आंकड़ों में आतंक के नहीं आतंकी के सफाए (इस वर्ष अब तक 150) पर जोर है। कश्मीर से धारा 370 का साया हट जाने के बावजूद और सैन्य बलों की अभूतपूर्व सक्रियता को देखते हुए, बड़ी संख्या (लगभग 200) में स्थानीय आतंकियों का मुकाबले में बने रहना एक जरूरी सामरिक सबक लेने वाली परिघटना है।

8 जुलाई को जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा में बीजेपी नेता शेख वसीम बारी और उनके पिता और भाई की आतंकवादियों ने गोली कर हत्या कर दी थी। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने शोक जताया लेकिन एक महीने में चार और स्थानीय भाजपाई अपहरण और हत्या का शिकार हुए। यहाँ तक कि, अब पार्टी पदाधिकारियों को सेफ हाउस बनाकर शरण देनी पड़ रही है। एक साल के धारा 370 रहित शासन में, हिन्दुत्ववादी को डल झील के किनारे फ्लैट या कश्मीरी बहू बहुत दूर की कौड़ी लगने लगे होंगे। मोदी सरकार के अभूतपूर्व लॉकडाउन के बावजूद, कश्मीर में न उनकी भावनाओं के लिए जगह बन पा रही है और न उनकी राजनीति को पैर टिकाने के लिए जमीन मिल पा रही है।

हालांकि, कश्मीरी पंडित फिलहाल विस्थापन में कहीं ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं, बजाय सरकारी आश्वासनों पर भरोसा कर घर वापसी की सोचने के; अन्यथा स्थिति और भी बेकाबू हो रही होती। तब भी, भाजपा के घाटी में जमीनी स्तर पर राजनीतिक दल के रूप में आक्रामक प्रवेश करने और केंद्र शासित प्रशासन द्वारा व्यापक पैमाने पर स्थायी निवास के पंजीकरण को असमय शुरू करने से आतंकी समूहों को निशाना लेने के लिए एक बड़ा नागरिक टारगेट वर्ग उपलब्ध कराया जा चुका है। जैसे-जैसे इस वर्ग का आकार बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे उन पर आक्रमण भी बढ़ेंगे और असुरक्षा की भावना भी घर करेगी। 

कश्मीर में आज राष्ट्रवादी चक्की जितनी जोर-शोर से चलाई जा रही है, वैसी पहले कभी नहीं देखी गयी होगी। धारा 370 हटाने के जोश में मान लिया गया था कि इसमें राजनीतिक रूप से पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों को पिसना होगा और सामरिक रूप से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों को। लेकिन, हुआ क्या? एक ओर आतंकी गतिविधि में भाग लेने वाले स्थानीय युवकों की खेप समाप्त नहीं हो रही और दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति में सहज भागीदारी करने वाले कश्मीरी राजनेता भी मुख्य धारा से विमुख रहने पर विवश हो गए हैं। अलगाववादियों की बड़े पैमाने पर नजरबंदी और इस वर्ष अप्रैल से आतंकियों को रिकार्ड संख्या में मार गिराने के बावजूद, घाटी में राष्ट्रवादी राजनीति और कानून-व्यवस्था दोनों बैक फुट पर हैं। हिन्दू राष्ट्रवाद की चक्की में पीसा जाकर कश्मीर में जो कुछ हासिल हो रहा है वह, दरअसल, कानून-व्यवस्था की मिट्टी पलीद से ज्यादा कुछ नहीं।

जून 2018 से, महबूबा मुफ्ती सरकार गिरने पर, कश्मीर में 22 वर्षों बाद, 6 माह का राज्यपाल शासन रहा और दिसम्बर 2018 से राष्ट्रपति शासन चल रहा था। यानी केंद्र की मोदी सरकार का ही सीधा शासन, बेशक धारा 370 की व्यवस्था के अंतर्गत। इससे पहले भाजपा और महबूबा मुफ्ती की मिली-जुली सरकार ने अप्रैल 2016-जून 2018 तक भारतीय-कश्मीरी गठजोड़ राष्ट्रवाद के परंपरागत शासन को ही अंजाम दिया था। अब, मोदी सरकार पर, न इस गठजोड़ का प्रशासनिक अंकुश रहा और न धारा 370 का मनोवैज्ञानिक बोझ। लेकिन उसकी गाड़ी पहले से अधिक फंसी पड़ी है।

हालांकि, आतंकी हमलों से जमीनी सच्चाई नहीं बदलने जा रही। घाटी में भारत विरोध में मुखर पक्षों को इस वस्तुगत यथार्थ के साथ ही जीना है कि कश्मीर में भारतीय राष्ट्रवाद को सामरिक रूप से परास्त नहीं किया जा सकता। भारतीय नजरिये से यह मुद्दा है भी नहीं। मुद्दा है कि क्या भारतीय राष्ट्रवाद, आज के घोषित हिन्दू राष्ट्रवादी रास्ते पर चलते हुए, विजयी हो सकेगा?

जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश से पुनः राज्य का दर्जा देने की बात तो मोदी सरकार स्वयं कई बार दोहरा चुकी है। धारा 370 की पुरानी व्यवस्था वैसे भी प्रतीकात्मक ही थी; वह कागजों में फिर वापस आये न आये, पर हिन्दू राष्ट्रवाद के अश्वमेधी घोड़े को कश्मीर की धरती से वापस मोड़ना होगा। पाकिस्तान की कश्मीर में दिलचस्पी कम नहीं हो सकती; पाकिस्तान को यदि कश्मीर में असंगत बनाना है तो भारतीय-कश्मीरी गठजोड़ राष्ट्रवाद को उसकी केन्द्रीय भूमिका सौंपनी होगी।

जानकार एकमत मिलेंगे कि कश्मीर समस्या का मात्र प्रशासनिक हल, जिसे कि वर्तमान दौर की पहचान बना दिया गया है, लम्बे समय तक नहीं चल सकता। एक राजनीतिक समाधान ही वहाँ स्थायित्व लायेगा। तय है कि आतंकी मारने से न भारतीय राज्य को कश्मीरी की सहानुभूति मिलती है और न कश्मीरी राजनीति में बुनियादी रूप से कुछ बदलता है। अब्दुल्लाओं और मुफ्तियों की जमात को भी और लचीला बनाने पर जोर देने से कुछ नया नहीं होगा।

एक वर्ष पहले धारा 370 की व्यवस्था हटाने और राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद कश्मीर में, बेशक कब्रिस्तान की दमघोंटू शांति से भरा, खामोशी का भी दौर आया था। समझने वाली बात है कि तब भारतीय राज्य ने आतंक के भूत से हटकर कानून-व्यवस्था पर ध्यान केन्द्रित किया था। यदि कारोबार की प्रेरक शांति के साथ कश्मीर को यही मॉडल दिया जा सके! सेना को बैरक में और केन्द्रीय बलों को रिजर्व भूमिका में रखा जाये और स्थानीय पुलिस कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर हो! रणनीति में ऐसी बुनियादी फेर-बदल का माद्दा मोदी सरकार में नहीं है।

(विकास नारायण राय हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पुलिस एकैडमी के निदेशक रह चुके हैं।)

This post was last modified on September 3, 2020 9:58 am

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