Thursday, December 9, 2021

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कानून तो बना दिया, नियमावली बनी नहीं

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नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए अर्थात का) की नियमावली अभी तक नहीं बनी। जबकि इस कानून को लागू हुए एक साल से अधिक समय गुजर गया है। इस कानून के खिलाफ असम में लगातार आंदोलन चल रहा है। इसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब संशोधन विधेयक सामने आया और धरना-प्रदर्शन चल ही रहा था कि यह विधेयक संसद से पारित होकर अधिनियम बन गया। उस दिन समूचे असम में विद्रोह भड़क गया।

इसके विरोध में सक्रिय संगठनों के सम्मेलन में असम छात्र संघ और असम जातीयतावादी युवा छात्र वाहिनी के साथ-साथ प्रमुख बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया। इन्हीं दोनों छात्र-युवा संगठनों के साझा प्रयास से असम आंदोलन खड़ा हुआ था जिसकी परिणति असम समझौता में हुआ था। इस तरह असम जातीय दल का गठन हुआ। वह दल विधानसभा चुनाव के लिहाज से समीकरण बैठाने और चुनावी तैयारी में लगा है। पर नागरिकता अधिनियम विरोधी समन्वय समिति भंग नहीं हुई है और वह लगातार सक्रिय है। विधानसभा चुनावों में उसकी सक्रियता का कितना प्रभाव होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

गुवाहाटी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर व असम के सभी समुदायों में प्रतिष्ठित प्रो. हिरेन गुहाईं इस समन्वय समिति के संयोजक हैं। पिछले 30 जनवरी को गुवाहाटी में इसका बड़ा सम्मेलन हुआ जिसमें भाजपा को छोड़कर सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि, प्रोफेसर, पत्रकार, लेखक, पूर्व नौकरशाह आदि शामिल हुए। इसमें तय हुआ कि असम के समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश में लगी भाजपा को सत्ता से हटाने और उसकी विचारधारा के खिलाफ आमजन को सचेत करने के लिए बकायदा अभियान चलाया जाए।  

इधर केन्द्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि नियमावली बनाने में अभी पांच महीने लगेंगे। नियमावली बनाने की समय सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव का अनुमोदन संसद के दोनों सदनों ने दो फरवरी को कर दिया है। बाद में गृहराज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि लोकसभा की समिति ने 9 अप्रैल तक समय बढ़ा दिया है, जबकि राज्य सभा की समिति ने सरकार को 9 जुलाई तक का समय दे दिया है। इस कानून की अधिसूचना 12 दिसंबर, 2019 को जारी हुई थी और इसे 10 जनवरी, 2020 को लागू कर दिया गया।

सरकार ने यह स्पष्टीकरण दिया कि राष्ट्रव्यापी एनआरसी बनाने के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है। गृहमंत्री अमित शाह बार-बार कहते रहे हैं कि सीएए के बाद एनआरसी बनाया जाएगा क्योंकि दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम उन हिन्दू, जैन, सिख, पारसी, इसाई और बौध्द धर्म को मानने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने के बना है जो धार्मिक प्रताड़ना के शिकार होकर बांग्लादेश, पाकिस्तान और अपगानिस्तान से 31 दिसंबर, 2014 के पहले भारत आए हैं। लेकिन नियमावली नहीं बनने से इसे लागू नहीं किया जा सका है। निमयावली से ही तय होगा कि धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होने और 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आने का कौन सा प्रमाण देना होगा। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि उक्त धार्मिक समूहों के लोगों को धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होने का कोई प्रमाण नहीं देना होगा, इसे स्वयंसिध्द मान लिया जाएगा।

इसी मुद्दे पर असम में इस कानून का जबरदस्त विरोध है। असम के लोग बांग्लादेश से 25 मार्च 1971 के बाद आए सभी लोगों को चिन्हित करने और बाहर निकालने की मांग करते रहे हैं। उन अवैध प्रव्रजनकारियों के बीच धार्मिक आधार पर विभाजन करना असम के लोगों को मंजूर नहीं है। संशोधित नागरिकता कानून से विदेशियों की पहचान की तारीख 31 दिसंबर 2014 कर रहा है जो असम समझौता के प्रावधानों के खिलाफ है। उल्लेखनीय है असम समझौता केन्द्र सरकार और असम के आंदोलनकारी छात्रों व जनसंगठनों के बीच हुआ था और वह एक तरह से असम सरकार और केन्द्र सरकार के लिए बाध्यकारी है।

(वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा का लेख।)

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