बीच बहस

आईपीएल की तरह ही बाजार का अश्लील खेल है एग्जिट पोल

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का सिलसिला खत्म हो चुका है। चुनाव के वास्तविक नतीजे आने लगे हैं, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी विभिन्न सर्वे एजेंसियों और टीवी चैनलों और एग्जिट पोल के अपने-अपने अनुमान पेश कर दिए हैं, जो तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी को लेकर तो करीब-करीब एक जैसे हैं और उन प्रदेशों के राजनीतिक माहौल के मुताबिक ही हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल और असम को लेकर एग्जिट पोल के अनुमानों में काफी विरोधाभास है और विभिन्न दलों के नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों ने भी उन्हें स्वीकार नहीं किया है।

दरअसल हमारे देश में एग्जिट पोल हमेशा ही तुक्केबाजी और टीवी चैनलों के लिए एक कारोबारी इवेंट होता है। ये कभी भी विश्वसनीय साबित नहीं हुए हैं और इन पर संदेह करने की ठोस वजहें मौजूद हैं। जब से हमारे देश में एग्जिट पोल का चलन शुरू हुआ तब से लेकर अब तक एग्जिट पोल के सबसे सटीक अनुमान सिर्फ 1984 के आम चुनाव में ही रहे। अन्यथा तो लगभग हमेशा ही वास्तविक नतीजे एग्जिट पोल के अनुमानों से हटकर ही रहे हैं। इस सिलसिले में पिछले तीन दशक के दौरान हुए तमाम चुनावों के कुछ चुनिंदा उदाहरण गिनाए जा सकते हैं, जब एग्जिट पोल्स के अनुमान औंधे मुंह गिरे और वास्तविक नतीजे उनके उलट आए। ऐसा होने पर एग्जिट पोल्स करने वाली एजेंसियों और उन्हें दिखाने वाले टीवी चैनलों की बुरी तरह भद्द भी पिटी, लेकिन इससे उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता और ‘दिल है कि मानता नहीं’ की तर्ज पर वे हर चुनाव के बाद एग्जिट पोल का इवेंट आयोजित करते हैं।

2004 के आम चुनाव में लगभग सभी एग्जिट पोल्स के नतीजों में बताया गया था कि अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए फिर सरकार बनाएगी, लेकिन वास्तविक नतीजे इसके बिल्कुल उलट रहे। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए की सरकार बनी। डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। 2009 के आम चुनाव में भी सभी एग्जिट पोल्स के नतीजों में यूपीए और लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई वाले एनडीए के बीच कांटे की टक्कर बताते हुए दोनों को ही बहुमत के आंकड़े से बहुत दूर दिखाया गया था। लेकिन असल नतीजों में यूपीए को बहुमत से थोड़ी सी कम यानी 262 सीटें मिलीं और सपा-बसपा के बाहरी समर्थन से उसने सरकार बनाई। एनडीए को महज 159 सीटें ही मिल सकीं।

इस सिलसिले में हमें 2104 और 2019 के आम चुनावों के वक्त दिखाए गए एग्जिट पोल्स के अनुमानों को भी नहीं भूलना चाहिए। दोनों ही चुनावों में तमाम सर्वे एजेंसियों और टीवी चैनलों ने एग्जिट पोल्स में एनडीए के सत्ता में आने का अनुमान तो जताया गया था, लेकिन किसी ने भी यह नहीं बताया था कि देश पर सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस अपने इतिहास की सबसे शर्मनाक हार से रूबरू होगी और उसे 100 से भी कम सीटें ही हासिल होंगी, लेकिन दोनों ही चुनावों में जब वास्तविक नतीजे आए तो कांग्रेस को क्रमश: 44 और 52 सीटें ही मिल पाईं।

इन चार आम चुनावों के अलावा पिछले करीब एक दशक के दौरान हुए तमाम विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल्स भी हकीकत से बहुत दूर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में 2011 के विधानसभा चुनाव में किसी भी एग्जिट पोल में वामपंथी मोर्चा के हारने और तृणमूल कांग्रेस के भारी बहुमत से सत्ता में आने का अनुमान नहीं जताया था, लेकिन जब वास्तविक चुनाव नतीजे आए तो वामपंथी मोर्चा को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा।

इसी तरह 2014 में हुए दिल्ली विधानसभा के चुनाव में सभी एग्जिट पोल्स भाजपा की सरकार बनवा रहे थे, लेकिन वास्तविक नतीजे आए तो 70 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा को महज तीन सीटें ही मिलीं और कांग्रेस का तो खाता भी नहीं खुला। सारे अनुमानों को ध्वस्त करते हुए आम आदमी पार्टी ने 67 सीटों के साथ सरकार बनाई। 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में भी सभी एग्जिट पोल्स के अनुमान बुरी तरह जमींदोज हुए थे। इसके बाद तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों ने भी एग्जिट पोल्स के अनुमानों को अपने आसपास तक नहीं फटकने दिया।

ऐसा नहीं है कि एग्जिट पोल्स के नतीजे सिर्फ भारत में मुंह की खाते हों, विदेशों में भी ऐसा होता है, जहां पर कि वैज्ञानिक तरीकों से एग्जिट पोल्स किए जाते हैं। दो साल पहले हुए आस्ट्रेलिया के चुनाव को ताजा मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है। आस्ट्रेलिया के संघीय चुनाव में तमाम सर्वेक्षणों में विपक्षी लिबरल-नेशनल गठबंधन को बहुमत के करीब और सत्ता में आता हुआ दिखाया गया था, लेकिन चुनाव नतीजे बिल्कुल उलट रहे। इस सिलसिले में अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के चुनाव को भी याद किया जा सकता है, जिसमें सारे ओपनियन और एग्जिट पोल्स हिलेरी क्लिंटन की बढ़त दिखा रहे थे, लेकिन चुनाव नतीजों में जीत ट्रंप की हुई थी।

हालांकि दावा तो हमारे यहां भी वैज्ञानिक तरीके से ही एग्जिट पोल्स करने का किया जाता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। वैसे हकीकत यह भी है कि भारत जैसे विविधता से भरे देश में जहां 60-70 किलोमीटर की दूरी पर लोगों के रहन-सहन और खान-पान की शैली, भाषा-बोली और उनकी आवश्यकताएं और समस्याएं बदल जाती हों, वहां किसी भी प्रदेश के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों के मुट्ठीभर लोगों से बातचीत के आधार पर किसी सटीक निष्कर्ष पर पहुंचा ही नहीं जा सकता। यह बात सर्वे करने वाली एजेंसियां भी जानती हैं, लेकिन यह और बात है कि वे इसे मानती नहीं हैं।

दरअसल हमारे यहां चुनाव को लेकर जिस बड़े पैमाने पर सट्टा होता है और टेलीविजन मीडिया का जिस तरह का लालची चरित्र विकसित हो चुका है, उसके चलते एग्जिट पोल्स की पूरी कवायद चुनावी सट्टा बाजार के नियामकों और टीवी मीडिया इंडस्ट्री के एक संयुक्त कारोबारी उपक्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। कभी-कभी सत्तारूढ़ दल भी इस उपक्रम में भागीदार बन जाता है। इस उपक्रम से होने वाली कमाई का एक छोटा हिस्सा टीवी चैनलों पर एग्जिट पोल्स के अनुमानों का विश्लेषण और उन पर टिप्पणी देने वाले दलाल किस्म के पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों को भी मिल जाता है। इसलिए एग्जिट पोल्स दिखाने की कवायद को सिर्फ क्रिकेट के आईपीएल जैसे अश्लील और सस्ते मनोरंजक इवेंट के तौर पर ही लिया जा सकता है और ज्यादातर लोग इसे इसी तौर पर लेते भी हैं।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on May 2, 2021 12:16 pm

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