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Wednesday, August 4, 2021

विरासत और बगावत: लोजपा दो फाड़

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जिस बात का खौफ था, वही हुआ। पिछले रविवार की शाम एक नाटकीय घटनाक्रम में लोकजनशक्ति पार्टी अचानक से दो फाड़ हो गई। उसके छह सांसदों में से पाँच ने वर्तमान संसदीय दल के नेता चिराग पासवान की जगह, रामविलास पासवान के छोटे भाई और सांसद पशुपति कुमार पारस को नेता चुन लिया और इसकी लिखित सूचना लोकसभा सचिवालय को भेज दी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक लोकसभा सचिवालय ने पशुपति पारस को लोकजनशक्ति संसदीय दल का नेता घोषित कर दिया है। इसका अर्थ है, अब चिराग अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़ गए हैं।

पिछले साल 8 अक्टूबर (2020 ) को जब लोकजनशक्ति पार्टी सुप्रीमो रामविलास पासवान की मृत्यु हुई, तभी से इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि इस पार्टी का भविष्य संदिग्ध है। लोग रामविलास के बेटे और युवा सांसद चिराग पासवान को राजनीतिक तौर पर अपरिपक्व मान रहे थे। रामविलास ऐन चुनाव के वक़्त दिवंगत हुए थे। यह वैसा ही था, जैसे अषाढ़ में किसी किसान गृहस्त की मौत। इसका नतीजा चुनाव में दिखा भी। पिता की मृत्यु के बाद चिराग लोकजनशक्ति पार्टी के आलाकमान बनाए गए थे। लेकिन विगत बिहार विधान सभा चुनाव में उनकी भूमिका को किसी ने परिपक्व नहीं कहा। एनडीए में अपनी पार्टी को जगह दिलाने में वह विफल हुए।

विरोधाभास यह था कि केंद्र में वह एनडीए के साथ थे, किन्तु उस बिहार में, जहाँ उसका आधार है ,उससे अलग -थलग थे। उन्होंने जनतादल यूनाइटेड के उम्मीदवारों के खिलाफ उम्मीदवार दिए , लेकिन भाजपा उम्मीदवारों के खिलाफ नहीं। पूरे चुनाव में उन्होंने स्वयं को प्रधानमंत्री मोदी का हनुमान बताया। हवा में बात फैली कि भाजपा के इशारे पर चिराग यह सब कर रहे हैं। चुनाव में उन्हें कुछ नहीं मिला। येन-केन बस एक सीट मटिहानी से मिल सकी। अलबत्ता, नीतीश कुमार की पार्टी को नुकसान पहुँचाने में वह कामयाब जरूर हुए। नीतीश 115 सीटें लड़ कर केवल 43 जीत सके। बिहार में वह तीसरे नंबर की पार्टी बन गए। भले ही राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया ,लेकिन यह तो सब ने महसूस किया कि उनका जादू ख़त्म हो गया है।

स्वाभाविक है , नीतीश कुमार के मन में एक प्रच्छन्न रोष चिराग के प्रति होगा । दरअसल इस चुनाव में वह दो युवा ‘ भतीजों ‘ से जूझ रहे थे। ये थे तेजस्वी यादव और चिराग पासवान। पौराणिक रामकथा का उत्तरपक्ष पिता -पुत्र संग्राम है। युवा लव -कुश ने अपने ही पिता के अश्वमेध के घोड़े को थाम लिया था। नतीजतन पिता -पुत्र में संघर्ष हुआ। यहाँ चाचा -भतीजा संघर्ष था। नीतीश के खिलाफ इस चुनाव में तेजस्वी और चिराग संघर्ष कर रहे थे। चाचा का गुस्सा सार्वजानिक हो रहा था।

लेकिन , यह कहा गया कि चुनाव में चिराग ने किसी समझ का प्रदर्शन नहीं किया था , उनके गुस्से का प्रदर्शन जरूर हुआ था। गुस्से के साथ आप कोई सफलता हासिल नहीं कर सकते। इसके लिए विवेक की जरुरत होती है । उनके पास विवेक होता तो येनकेन एनडीए में अपनी जगह बनाते। यदि यह संभव नहीं हो रहा था ,तब वह सीधे राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन के साथ होते। मांझी , साहनी और कुशवाहा का महागठबंधन से अलगाव हो चुका था। उनके लिए जगह आसानी से बन सकती थी। ऐसा हुआ होता ,तो बिहार में एनडीए की विदाई सुनिश्चित हो जाती और इसका श्रेय चिराग को मिलता। लेकिन ऐसा नहीं कर के वह एक विचित्र संघर्ष के हिस्सा बन गए और अंततः हास्यास्पद बन कर उभरे। तभी से पार्टी के लोगों में बेचैनी थी कि आगे क्या होगा ! बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में लोजपा के एक -एक सदस्य थे। एमएलसी नूतन सिंह और एमएलए राजकुमार सिंह । चुनाव बाद एक भाजपा और दूसरे जदयू में शामिल हो गए । और अब छह में से पाँच सांसदों ने अलग होकर नीतीश कुमार की जयकार की है । चिराग अब मुश्किल में हैं।

रामविलास पासवान परिपक्व राजनेता थे । 1969 में वह विधानसभा के सदस्य बने और समाजवादी राजनीति से जुड़े रहे। बिहार की समाजवादी राजनीति दलितों की हमदर्द जरूर थी ,लेकिन वह उनकी पार्टी नहीं थी । इसे रामविलास जी ने महसूस किया था । 1977 में वह पहली दफा सांसद बने थे। उसी साल नालंदा जिले के एक गांव बेलछी में दलितों का सामूहिक दहन हुआ था। सार्वजानिक रूप से रामविलास जी ने जब इस मुद्दे को उठाया ,तो उन्हें चरण सिंह की फटकार सुननी पड़ी। वह चुप लगा गए। 1984 में जब वह लोकसभा चुनाव हारे तब उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें राज्यसभा भेजा जाएगा। लेकिन लोकदल विधायकों में यादव अधिक थे और एक दलित को भेजना संभव नहीं हुआ। रामविलास जी उपेक्षा का घूंट पीकर रह गए। 1990 में उन्होंने मंडल आरक्षण आंदोलन का पुरजोर समर्थन किया। इससे दलितों को कोई लाभ नहीं मिलने वाला था ,क्योंकि उन्हें तो पूर्व से ही आरक्षण मिल रहा था।

लेकिन पासवान ने समाजवादी नीति के तहत इसका जोरदार समर्थन किया। 1990 के दशक में पिछड़े वर्ग में जब जातिवादी कवायद शुरू हुई और माई तथा लव -कुश के समीकरण बनने लगे ,तब भी पासवान जनतादल के हिस्से बने रहे। हाँ , सन 2000 में पिछड़े नेताओं से अपमानित हो कर उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली -लोकजन शक्ति पार्टी । थोड़े दिनों के लिए वह अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के हिस्सा भी बने ,लेकिन गोधरा मामले पर केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया । 2004 में लालू प्रसाद और कांग्रेस के साथ मिल कर बिहार में एनडीए की खटिया खड़ी कर दी । साल भर के भीतर लालू प्रसाद से भी खटपट हुई और 2005 के चुनाव में पंद्रह वर्षों से चली आ रही लालू प्रसाद की राजनीतिक सत्ता को भी ध्वस्त कर दिया । वह एक ऐसी ताकत बन गए थे ,जिसे लालू और नीतीश दोनों ख़त्म करना चाहते थे ।

अंततः 2005 में उनकी पार्टी को नीतीश कुमार तोड़ने में सफल हुए । उनके 29 विधायकों में से 21 को अपनी पार्टी में मिला कर उन्हें किनारे कर दिया गया। अनेक वर्षों तक अपमानजनक स्थितियों से गुजरते हुए 2014 में उन्होंने एक बार फिर खेला किया ,जब उन्होंने नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हुए अपनी पार्टी को भाजपा के साथ नत्थी कर लिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में लालू और नीतीश की राजनीति को इकट्ठे पटकनी देने में वह सफल हुए। नतीजतन नीतीश और लालू 2015 में साथ होने के लिए मजबूर हो गए।

रामविलास पासवान को बिहार के लोग राजनीति का मौसम -विज्ञानी कहते थे। विफल होने का उनका रिकॉर्ड कमजोर था । राजनीति की नब्ज पर उनका ध्यान होता था । वह जीवित होते तो हरगिज पिछले चुनाव में लोजपा का वैसा निर्णय नहीं होता ,जैसा चिराग ने किया था। रामविलास जी कहते थे ,दाएं या बाएं एक तरफ चलो। बीच में चलोगे तो कुचले जाओगे । अफ़सोस कि उनके बेटे ने ही उनकी बात पर अमल नहीं किया। चिराग रास्ते के बीच में चल कर कुचले गए ।

अब जब कि लोजपा दोफाड़ हो चुकी है , इसका बिहार की राजनीति पर क्या असर होगा ? आज का मुख्य प्रश्न यही है । राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि इसके पीछे नीतीश कुमार का हाथ है । 2005 में भी उस पार्टी को तोड़ने में उनकी भूमिका थी ,इसलिए कि टूटे हुए सभी इक्कीस विधायक जदयू में शामिल हुए थे । उस बार नीतीश कुमार की राजनीति को उससे बल मिला था । लेकिन क्या इस बार भी वैसा होगा ?

इसकी संभावना कमजोर है।आज जब राजनीति में विचार-शून्यता की स्थिति विकसित हो रही है, तब जाति और धर्म के मुद्दे स्वाभाविक रूप से अहम हो रहे हैं । लोजपा के प्रभाव में मुख्यतः पासवान जाति के लोग रहे हैं । यह लड़ाकू कौम है । इसका अपना इतिहास है । 1757 के पलासी युद्ध में ईस्ट इंडिया कम्पनी की निर्णायक जीत में क्लाइव की सेना में पासवान सैनिकों का होना बताया जाता है ,जैसे भीमा- कोरेगांव की निर्णायक लड़ाई में पेशवा की हार के पीछे कम्पनी फ़ौज के महार सैनिक थे । सवाल यह होगा कि इन पासवानों को अब कौन प्रभावित कर पाएगा ।क्या लोजपा का वह गुट ,जो पशुपति के नेतृत्व में बना है , या फिर चिराग पासवान । अब तक जानकारी यही मिल रही है कि इस आधार पर चिराग का ही प्रभाव है । यदि चिराग एनडीए में नहीं होते हैं तब दो ही स्थितियां होंगी । वे या तो तेजस्वी के साथ एकजुट होंगे ,या फिर स्वतंत्र रूप से राजनीति करेंगे। स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का खामियाजा वह भुगत चुके हैं। अब शायद ही ऐसा करें। लेकिन यदि उन्होंने स्वयं को महागठबंधन से जोड़ लिया ,तो अगले चुनाव में बिहार की राजनीति में क्या होगा ,कोई भी अनुमान कर सकता है।

लेकिन यह नहीं लगता कि भाजपा की इन सब पर नजर नहीं है। फिलहाल उसके पास दलित नेताओं का अकाल है। यह ठीक है कि रामविलास पासवान आज पार्थिव रूप से नहीं हैं। लेकिन उनके नाम का प्रभाव दलितों के एक हिस्से पर आज भी है। रामविलास जी कहते थे ,वह भाजपा के साथ नहीं जाना चाहते थे ,इस के लिए चिराग ने उन्हें तैयार किया । भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अपने ‘हनुमान ‘ को इतनी आसानी से जाने देगा , इस पर विश्वास करना कठिन है ।

(प्रेम कुमार मणि बौद्धिक चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आप आजकल पटना में रहते हैं। यह लेख उनके फेसबुक वाल से साभार लिया गया है।)

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