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Categories: बीच बहस

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को ब्राह्मण ही श्रेष्ठ क्यों लगते हैं?

मौजूदा वक्त में जब देश की तमाम संवैधानिक संस्थान और उनमें बैठे लोग अपने पतन की नित नई इबारतें लिखते हुए खुद को सरकार के दास के रूप में पेश कर रहे हों, तब ऐसे माहौल में लोकसभा अध्यक्ष भी कैसे पीछे रह सकते हैं! हालांकि इस सिलसिले में सोलहवीं लोकसभा की अध्यक्ष रहीं सुमित्रा महाजन महाजन भी ऐसा काफी कुछ कर गई हैं, जिससे इस संवैधानिक पद की मर्यादा का हनन हुआ है। लेकिन जो वे नहीं कर सकीं, उसे अब सत्रहवीं यानी मौजूदा लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला पूरा करते दिख रहे हैं। बाकी मामलों में तो वे अपनी पूर्ववर्ती के नक्श-ए-कदम पर चल ही रहे हैं।
ओम बिरला का मानना है कि सभी जातियों और वर्गों में ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है। अपने निर्वाचन क्षेत्र और गृह नगर कोटा राजस्थान में पिछले दिनों आयोजित अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा, ”हमारे समाज में ब्राह्मणों का हमेशा से उच्च स्थान रहा है। उन्हें यह स्थान उनकी त्याग व तपस्या की वजह से प्राप्त है। इसी वजह से ब्राह्मण हमेशा ही समूचे समाज के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में रहा है और इसी वजह से उसे पैदा होने के साथ ही समाज में सम्मान और श्रेष्ठता हासिल हो जाती है।’’
लोकसभा अध्यक्ष यहीं नहीं रुके। उन्हें अपना यह निहायत घटिया और शर्मनाक बयान इतना महत्वपूर्ण लगा कि उन्होंने बाद में इसे ट्विट भी किया।
ओम बिरला एक व्यक्ति के तौर पर देश-दुनिया के किसी भी जाति-समुदाय के बारे में अपनी राय रखने के स्वतंत्र हैं। वे जिसे चाहे श्रेष्ठ माने, जिसे चाहे निकृष्ट समझे। हालांकि संविधान से संचालित होने वाला एक आधुनिक और सभ्य समाज तो व्यक्तिगत तौर पर भी किसी को ऐसा मानने और समझने की इजाजत नहीं दे सकता। मानवीय और नैतिक मूल्यों का भी तकाजा यही है कि किसी भी जाति या समुदाय को किसी अन्य से कमतर नहीं समझा जाए।
बहरहाल ओम बिरला सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। उनकी राजनीतिक-वैचारिक पृष्ठभूमि और शैक्षणिक योग्यता चाहे जो हो, वे लोकसभा के अध्यक्ष यानी देश की सबसे बडी निर्वाचित संस्था के मुखिया हैं। इस बात का भी कोई मतलब नहीं कि इस पद के लिए उनका चयन करने वाले सक्षम लोग किस राजनीतिक दल या विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। ओम बिरला नैतिक और तकनीकी रूप से अब उस राजनीतिक दल के सदस्य भी नहीं हैं, जिसके टिकट पर वे लोकसभा का चुनाव लड़े और लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए उस दल के शीर्ष नेतृत्व की पसंद बने।
फिर भी लोकसभा अध्यक्ष के रूप में ओम बिरला ने एक समुदाय विशेष को सबसे श्रेष्ठ, त्यागी-तपस्वी और समाज का मार्गदर्शक बताकर स्पष्ट रूप से न सिर्फ देश के अन्य जातीय समुदायों को बल्कि प्रधानमंत्री सहित उस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी परोक्ष रूप से लांछित और अपमानित किया है, जिसकी बदौलत वे आज इस पद पर बैठे हैं। यही नहीं, उन्होंने अपनी वाहियात और निहायत गैर जरुरी टिप्पणी से उस संविधान की भी अवमानना की है, जिसकी शपथ लेकर वे लोकसभा के सदस्य और फिर उसके अध्यक्ष पद पर आसीन हुए हैं।
सवाल उठता है कि आखिर ओम बिरला ने ऐसा बयान क्यों दिया और उन्हें इस तरह का बयान देने की प्रेरणा कहां से मिली होगी?
दरअसल ओम बिरला की पूरी राजनीतिक-सामाजिक शिक्षा-दीक्षा उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संस्कार शाला में हुई है, जिसका नेतृत्व उसकी स्थापना से लेकर आज तक कमोबेश ब्राह्मणों के हाथों में ही रहा है। संघ के विचार प्रवर्तक और मुख्य भाष्यकार माधव सदाशिव गोलवलकर द्वारा रचित पुस्तकों में भी उस वर्णाश्रम व्यवस्था और मनु स्मृति का पुरजोर समर्थन महिमामंडन किया गया है, जो ब्राह्मणों को अन्य जातीय समुदायों की तुलना में श्रेष्ठ प्रतिपादित करती है। इन्हीं पुस्तकों में भारतीय संविधान को भी सिरे से नकारा गया है। संघ के शीर्ष नेतृत्व यानी सर संघचालक से लेकर उसके तमाम नीति-नियामक पदाधिकारी ब्राह्मण और उसमें भी एक विशेष तथा कथित तौर पर ‘उच्च’ स्तर की मेधा-संपन्न मानी जाने वाली प्रजाति के (चितपावन/कोंकणस्थ) ब्राह्मण ही होते हैं। विभिन्न राज्यों में संघ के प्रादेशिक स्तर के पदाधिकारी भी ब्राह्मण या अन्य सवर्ण समझी जाने वाली जातियों के ही बनाए जाते हैं।
तो ऐसे संगठन के विचारों से अनुप्राणित ओम बिरला अगर सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का बखान करते हैं तो यह स्वाभाविक ही है। रही बात संविधान और उसकी शपथ की, तो जब ओम बिरला को लोकसभा अध्यक्ष के पद पर बैठाने वाले ही संविधान को ताक में रखकर सरकार चला रहे हैं, अदालतें कई मामलों में संविधान की अनदेखी कर रही हैं या उसकी मनमानी व्याख्या कर रही हैं और बाकी संवैधानिक संस्थाएं भी संविधान को परे रखकर सरकार की मर्जी के मुताबिक काम कर रही हैं तो लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर ओम बिरला ही क्यों संविधान की परवाह करें?
यह सही है कि ओम बिरला कोई बहुत अनुभवी राजनेता नहीं हैं। तीन मर्तबा विधानसभा और दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए बिरला ने लोकसभा अध्यक्ष बनने से पहले कभी किसी संवैधानिक पद का दायित्व नहीं संभाला है। उनकी औपचारिक शिक्षा भी औसत दर्जे की ही है। इन्हीं सब वजहों से लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए उनका चयन चौंकाने वाला था। दूसरे दलों की बात तो दूर, खुद उस भाजपा में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अलावा आज तक कोई नहीं जान सका कि ओम बिरला को उनके किन गुणों या काबिलियत के चलते लोकसभा अध्यक्ष बनाया गया।
हालांकि ऐसा नहीं है कि ओम बिरला के रूप में पहली बार ही किसी गैर अनुभवी सांसद ने लोकसभा अध्यक्ष का पद संभाला हो। उनसे पहले भी गैर अनुभवी या कम अनुभवी सांसद लोकसभा के अध्यक्ष बने हैं और उन्होंने बेहतर तरीके से अपने दायित्व का निर्वहन किया है। इस सिलसिले में पहला नाम तेलुगू देशम पार्टी के जीएमसी बालयोगी का लिया जा सकता है, जो एनडीए सरकार के समय 1998 में बारहवीं और 1999 में तेरहवीं लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए थे। पहली बार जब वे अध्यक्ष चुने गए थे तो वह लोकसभा में उनका दूसरा कार्यकाल था। सन 2002 में एक विमान दुर्घटना में उनका आकस्मिक निधन हो जाने पर उनकी जगह पहली बार ही संसद के सदस्य बने शिवसेना नेता मनोहर जोशी को लोकसभा अध्यक्ष चुना गया था। बालयोगी और जोशी दोनों ने ही सदन में और सदन के बाहर अपने कामकाज और व्यवहार से लोकसभा अध्यक्ष के पद की गरिमा को कायम रखा था।
ओम बिरला ने सिर्फ अपने विवादास्पद बयान से ही अपनी पद की गरिमा नहीं गिराई है, बल्कि लोकसभा की कार्यवाही का संचालन करते हुए भी वे ज्यादातर मौकों पर सरकार और सत्तारूढ दल के संरक्षक के तौर पर ही पेश आते दिखे हैं। कुल मिलाकर वे अपने कामकाज और व्यवहार से उन लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर रहे हैं, जिन्होंने इस संवैधानिक और गरिमामय पद के लिए उनका चयन किया है।
(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on September 13, 2019 7:59 pm

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