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Categories: बीच बहस

पश्चिम बंगाल में ममता ने ही दिया भाजपा को पनपने का मौका

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा के 77 विधायक चुने गए हैं। बंगाल में भाजपा का सूर्योदय हुआ है तो दूसरी तरफ कांग्रेस और वाम मोर्चा के लिए यह चुनाव सूर्यास्त साबित हुआ है। यह पहला मौका है जब बंगाल विधानसभा में कांग्रेस और माकपा के एक भी विधायक नहीं होंगे। इसके साथ ही यह भी पहला मौका है जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पराजित होने के बावजूद किसी ने मुख्यमंत्री की शपथ ली हो।

आइए सबसे पहले बंगाल में भाजपा के सूर्योदय पर गौर करते हैं। ऐसा क्यों और कैसे हुआ? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी विधानसभा में कहा कि अच्छा होता अगर कांग्रेस और वाम मोर्चा के भी कुछ विधायक यहां होते। पर कहते हैं, अब पछताए का होत है जब चिड़िया चुग गई खेत।

जनसंघ का गठन पश्चिम बंगाल के ही नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया था। बंगाल के लोगों ने सांप्रदायिकता की कोख से जन्मे तब जनसंघ और अब भाजपा को कभी पनपने नहीं दिया। बंगाल में राजनीति और चुनाव हमेशा ही वाद और वर्ग संघर्ष की पृष्ठभूमि में होता रहा है। यह पहला मौका है जब बंगाल में भाजपा मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में है और विधानसभा में कांग्रेस और वाम मोर्चा विधायकों की संख्या शून्य हो गई है। बंगाल के बुद्धिजीवियों ने नारा दिया था नो बीजेपी, इसके बावजूद भाजपा के 77 विधायक चुने गए। इसे जानने और समझने के लिए हमें 2011 की तरफ लौटना पड़ेगा।

विधानसभा के 2011 के चुनाव में ममता बनर्जी 34 साल से जमी वाममोर्चा सरकार को उखाड़ कर सत्ता में आईं थीं। पूंजीवादी देशों ने उन्हें एक मसीहा का दर्जा दे दिया था। हेराल्ड लस्की ने कहा है कि सत्ता लोगों को भ्रष्ट बनाती है और निरंकुश सत्ता तानाशाह बना देती है। ममता बनर्जी ने 2011 में वाममोर्चा को नसीहत दी थी कि बीस साल तक जाकर सो जाइए। इसके साथ ही कहा था कि हमें बदला नहीं लेना है बल्कि परिवर्तन लाना है।

पर ऐसा हुआ नहीं और वाम मोर्चा के नेता सड़कों पर जमे रहे। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने खासकर के माकपा कार्यालय पर दखल करने, आगजनी करने और माकपा नेताओं को घर से बेघर करने का सिलसिला शुरू कर दिया। माकपा के सुशांत घोष, लक्ष्मण सेठ सरीखे बहुत सारे नेताओं के लिए अपने क्षेत्र में जाना तक नामुमकिन हो गया। इसके साथ ही कांग्रेस और माकपा विधायकों को दबाव में डालकर तृणमूल में लाने का सिलसिला भी जारी रहा।

इसके बावजूद 2016 तक वाममोर्चा और कांग्रेस का वजूद बना रहा और विधानसभा चुनाव में उनके 76 विधायक चुनकर आए थे। इसके बाद भी यह संख्या दल-बदल के कारण सिमट कर आधी रह गई। यानी पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नाम पर शून्य बनता जा रहा था। इसके बाद आया 2018 का पंचायत चुनाव और रही सही कसर भी पूरी हो गई। तृणमूल कांग्रेस ने 33 फ़ीसदी से अधिक स्थानों को निर्विरोध जीत लिया। बाकी बचे स्थानों पर विपक्ष के लिए नामांकन दाखिल करना भी मुश्किल काम था।

इसके बाद से माकपा समर्थक अपने वजूद को बचाने के लिए किसी अलग राजनीतिक प्लेटफार्म की तलाश करने लगे थे। लोकसभा चुनाव ने यह मौका दिया और माकपा समर्थक थोक के भाव में भाजपा में शामिल हो गए। इसकी मिसाल पेश है। उत्तर 24 परगना के कमरहटी विधानसभा में 2016 के चुनाव में भाजपा को 7. 8 फ़ीसदी और माकपा को 45.1 फ़ीसदी वोट मिले थे। अब देखिए 2019 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर कैसे बदलती है। माकपा का वोट घट कर 15.6 फ़ीसदी रह गया और भाजपा का वोट बढ़कर 33.2 फ़ीसदी पर पहुंच गया।

एक और मिसाल। राजारहाट न्यू टाउन विधानसभा में 2016 में भाजपा को 17877 वोट और माकपा को 81478 वोट मिले थे। लोकसभा चुनाव में भाजपा को 77872 वोट मिले। माकपा का वोट 7.8  फ़ीसदी पर सिमट गया और भाजपा का वोट बढ़कर 38.2 फ़ीसदी पर पहुंच गया।

यही वजह थी कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के 18 सांसद चुन लिए गए और कांग्रेस दो पर सिमट गई और माकपा शून्य पर आ कर थम गई। इसका सीधा सा अर्थ यह होता है कि अगर 2011 के विधानसभा चुनाव के बाद वाममोर्चा और कांग्रेस को अपनी राजनीति करने दी गई होती तो भाजपा को पश्चिम बंगाल में पैर जमाने का मौका ही नहीं मिला होता। अब सवाल यह उठता है कि माकपा के जो समर्थक भाजपा में चले गए क्या वह वापस लौट आएंगे। यह तभी संभव है जब ममता बनर्जी वामपंथियों को खुलकर अपनी राजनीति करने दें और उन पर दमन का चक्र नहीं चलाएं।

दूसरा सवाल है कि भाजपा 77 पर ही आकर क्यों सिमट गई। मोदी और शाह तो दो सौ के पार का दावा करते थे। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 122 विधानसभाओं में तृणमूल कांग्रेस से आगे थी। इसकी वजह यह थी कि इस बार का पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव पिछले छह दशक के चुनाव से बिल्कुल अलग था। मोदी और शाह के कारण ऐसा लगने लगा था जैसे किसी बाहरी देश ने बंगाल पर फतह पाने को हमला बोल दिया है। इसी वजह से मतों का ध्रुवीकरण हो गया, लेकिन यह ध्रुवीकरण भाजपा के मनमाफिक नहीं था। यानी हिंदू और मुसलमान के रूप में नहीं हुआ। यह बीजेपी और नो बीजेपी के रूप में हो गया।

अल्पसंख्यकों के साथ वे लोग भी एकजुट हो गए जो सांप्रदायिकता की राजनीति के विरोधी हैं। उन्हें लगा कि तृणमूल के उम्मीदवार ही भाजपा को हरा सकते हैं, इसलिए सारे वोट उनके पक्ष में चले गए। यहां तक कि मुर्शिदाबाद और मालदह जैसे कांग्रेस के गढ़ और बर्दवान दुर्गापुर उत्तर 24 परगना जैसे माकपा के गढ़ से उनका सफाया हो गया। यह सांप्रदायिकता विरोधी लहर का ही कमाल था कि भाजपा कोलकाता की जोड़ासाँको भवानीपुर और बेलियाघाटा केंद्रों से भी साफ हो गई। इन सीटों पर लोकसभा चुनाव में भाजपा आगे थी।

अब सवाल उठता है कि अब तक जात-पात, धर्म और सांप्रदायिकता की राजनीति से अलग रहे पश्चिम बंगाल में भी क्या भाजपा अपना स्थान बना लेगी? बंगाल विधानसभा में लगी सांप्रदायिकता की पौध वक्त के साथ एक पेड़ में बदल जाएगी? याद दिला दें कि 2023 में बंगाल में पंचायत चुनाव और 2024 में लोकसभा चुनाव भी होना है। क्या कांग्रेस और वामपंथियों को अपनी राजनीति करने दी जाएगी। इसका जवाब ममता बनर्जी के पास है, क्योंकि,
लम्हों ने खता की थी
सदियों ने सजा पाई है

अंत में इस बार का विधानसभा चुनाव एक और मायने में अनोखा रहा है। यह पहला मौका है जब किसी पराजित मुख्यमंत्री ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। इससे पहले 1967 में प्रफुल्ल सेन को उनके वफादार अजय मुखर्जी ने पराजित किया था, लेकिन प्रफुल्ल सेन की सरकार नहीं बनी थी। सिद्धार्थ शंकर राय 1972 में मुख्यमंत्री बने तब वे विधानसभा के सदस्य नहीं बल्कि सांसद थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद रायगंज से विधायक चुने गए थे। अब ममता बनर्जी भी शायद खरदह विधानसभा केंद्र से चुनाव लड़ेगी।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कलकत्ता में रहते हैं।)

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This post was last modified on May 9, 2021 5:28 pm

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