Tuesday, September 27, 2022

माओवाद व्यवस्था की विसंगतियों की उपज है, वह गोली से नहीं मरेगा

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गृह मंत्रालय की ताजा आधिकारिक घोषणा के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वामपंथी उग्रवाद मुक्त भारत की परिकल्पना को साकार करने तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उग्रवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत गृह मंत्रालय देशभर में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के अंतिम चरण में पहुंच गया है। इस दावे की पुष्टि के लिये मंत्रालय ने माओवादियों के मारे जाने और उनके प्रभाव क्षेत्र में फिर कानून का राज स्थापित हो जाने के लिये कुछ आंकड़े भी पेश किये हैं जिनमें कहा गया है कि वर्ष 2010 में देश के 96  जिले नक्सलवाद प्रभावति थे जिनकी संख्या घट कर अब मात्र 36 रह गयी है। हिंसक घटनाओं में 39 प्रतिशत, सुरक्षा बलों की शहादत में 26 प्रतिशत और नागरिकों के हताहत होने के मामलों में 44 प्रतिशत कमी आ गयी है। ये आंकड़े निश्चित रूप से सुखद हैं। लेकिन भारत को माओवाद मुक्त करने की लड़ाई को अंतिम दौर में बताना बहुत जल्दबाजी ही है। क्योंकि आप माओवादी को मार सकते हैं मगर माओवाद को मारना इतना आसान नहीं जितना समझा जा रहा है।

यह समस्या बहुत गंभीर है लेकिन कुछ माओवादियों को मार देने से माओवाद समाप्त नहीं हो जायेगा। जिन जिलों से माओवाद का सफाया किया जा रहा है वहां दुबारा माओवाद के नहीं लौटने की संभावना बनी रहती है। दरअसल भारत सरकार अपनी सफलता को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में किये गए विकास के बजाय हिंसक हमलों की संख्या के आधार पर माप रही है। जबकि यह देखा जाता है कि पुलिस द्वारा किसी क्षेत्र पर कब्जा करने के बाद भी, प्रशासन उस क्षेत्र के लोगों को आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने में विफल रहता है जिस कारण उग्रवाद के दुबारा पांव पसारने की पूरी संभावना रहती है। सच्चाई यह है कि हम माओवादियों को तो मार सकते हैं मगर माओवाद को नहीं मार सकते। आदमी को गोली से मारा जा सकता है मगर विचार को बंदूक की गोली से नहीं मारा जा सकता। आज तक ऐसी बन्दूक नहीं बनी जो कि सीधे आदमी के दिमाग में घुस कर किसी विचार को मार सके। इस समस्या की जड़ ही इसका समाधान भी है।

यह सही है कि लचर कानून व्यवस्था के कारण माओवाद पर अंकुश नहीं लग सका और क्षेत्रीय असन्तुलन ने इसे पनाह दी है। लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि माओवाद हमारे लोकतंत्र की विसंगतियों की कोख से ही जन्मा हुआ है और हमारा ध्यान विसंगतियों की ओर कम और बंदूक पर ज्यादा है। नक्सलवाद के लिये समाज में व्याप्त गैरबराबरी, अन्याय, शोषण और गरीबी जैसे कारण असली जिम्मेदार हैं। संविधान समानता की गारंटी तो अवश्य ही देता है मगर वह समानता है कहां? सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में समान रूप से हर किसी को तरक्की के अवसर कहां हैं? भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और अगड़े लोगों द्वारा तरक्की के सारे अवसर आम आदमी तक पहुंचने से पहले ही लपक लिये जाते हैं। लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल रहा है। न्याय के महंगे होते जाने से वह आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। हर कोई न्याय के लिये हाइकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट तक नहीं जा सकता और ना ही किसी महंगे वकील से न्याय पाने के लिये पैरवी करा सकता है।

मुकदमेबाजियों और इलाज के लिये गरीबों की जमीनें बिक जाती हैं। बड़ी संख्या में लोग बिना जमानत के जेलों में सड़ रहे हैं। जबकि ऊंची पहुंच वाले धनाड्य लोगों (अभिनेता भी ) को कुछ ही घण्टों में जमानत मिल जाती है। साधन सम्पन्न लोग महंगा वकील रख कर अपने कुकर्मों की सजा से बच जाते हैं। आधा से ज्यादा गंभीर आपराधिक मामलों में अपराधी बच निकलते हैं। यही हाल जीवन रक्षा के मौलिक अधिकार का भी है। जेब में पैसे हैं तो बचो वरना तड़प-तड़प कर मर जाओ!

इन तमाम विकृतियों पर धार्मिक उन्माद का लबादा डाल कर छिपाया नहीं जा सकता। यह मजहबी उन्माद गरीबी, भेदभाव, बेरोजगारी, शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति नहीं दिला सकता। वंचित समाज की इन कुंठाओं का इलाज बंदूक की गोली से नहीं किया जा सकता है। धर्म, जाति और भाषा आदि संकीर्णताओं से वोट मिल सकते हैं तथा लच्छेदार भाषणों से सत्ता भी मिल सकती है, मगर समाज का असन्तोष ज्यादा समय तक दबाया या छिपाया नहीं जा सकता। देखा जाय तो माओवाद सामाजिक असन्तोष की उपज भी है और यही असन्तोष उनकी खुराक, शक्ति और प्रेरणा भी है।

कहा जाता है कि न्याय का विलंबित होना न्याय से वंचित होना ही है। टाइम्स ऑफ इंडिया में 23 सितम्बर को छपी नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की जिला और ताल्लुका अदालतों में ही एक लाख से अधिक मामले 30 साल से अधिक समय से अनिर्णीत पड़े हैं। इसी तरह 4.89 लाख मामले 20 साल से लेकर 30 से अनिर्णीत पड़े हुये हैं। उत्तराखण्ड जैसे शांत और छोटे से राज्य में 4,885 मामले 10 से लेकर 20 तक, 112 मामले 20 से लेकर 30 तक और एक मामला तो 30 साल से अधिक समय से निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा है।

न्याय के मंदिरों में भी गरीबी आड़े आ जाती है। अमीर के मतलब के मामले जल्दी निपट जाते हैं लेकिन जहां साधन सम्पन्न वादकारी का पक्ष कमजोर और गरीब का मजबूत हो वहां मामले दशकों तक खिंच जाते हैं, ताकि गरीब थक कर स्वयं ही हार जाय। अगर किसी गरीब को साजिशन फंसा दिया जाय तो वह सालों तक जेल में ही निर्दोष साबित होने की प्रतीक्षा करता है। आजकल जमानत कराने का खर्च ही लाख रुपये बैठता है। छोटी अदालतों में न्याय पीठ के नीचे या पास बैठे पेशकार को जेब में नोट भरते हुये देखा जा सकता है। इसीलिये इन आदलतों में कैमरे लगाने की मांग हो रही है। स्वतंत्र और निष्पक्ष मानी जाने वाली न्यायपालिका को भी मजहबी रंग में रंगने की पूरी कोशिशें की जा रही हैं।

चूंकि आदिवासी सर्वाधिक शोषण, उत्पीड़न और गैरबराबरी के शिकार हैं और इसीलिये आदिवासी इलाके माओवादियों के सुरक्षित गढ़ बने हुये हैं। जनजातियां युगों से वनों में ‘‘आखेटक संग्रहक’’ रही हैं। इनको जल, जगल और जमीन पर नैसर्गिक अधिकार मिला है। लेकिन विकास के नाम पर उनके इसी नैसर्गिक को छीनने का निरन्तर प्रयास होता रहा है। कहीं जंगल के ठेकेदार तो कहीं खनन के पट्टेदार और कहीं-कहीं विकास के नाम पर स्वयं सरकार द्वारा भोलेभाले आदिवासी समाज के नैसर्गिक अधिकारों का निरन्तर हनन होता रहा है। उत्तराखण्ड की तराई में बाहरी लोगों ने वहां के मूल निवासी थारू और बुक्सा की जमीनें हड़प लीं, मगर कहीं सुनवाई नहीं हुयी।

संविधान में आदिवासियों के हितों के संरक्षण की गारण्टी तो दी गयी है, मगर फिर भी उनका शोषण रुक नहीं रहा है। वन क्षेत्र में पीढ़ियों से निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों के लिये 2006 में वनाधिकार अधिनियम बना मगर उसका पूरा लाभ अब तक आदिवासियों को नहीं मिल सका। प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गयी 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार इस अधिनियम के तहत कुल 42,50,602 आवेदन हुये थे जिनमें से केवल 19,05,602 को ही वन भूमि आवंटित हो सकी। माओवादियों को जड़ें जमाने के लिये समाज का ऐसा ही उपेक्षित वर्ग चाहिये। इन उपेक्षितों के बीच आश्रय मिलने के साथ ही इनके आक्रोश की शक्ति भी मिलती है। इनकी कुंठाओं को गुस्से में बदल कर इन्हें सत्ता के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है।

स्वभाव से ये प्रकृति पुत्र निश्चित रूप से शान्त रहे हैं, मगर इतिहास गवाह है कि जब भी उन पर शोषण और दमन की इन्तहा हुयी है, उन्होंने उग्र पतिरोध करने में भी संकोच नहीं किया है। मुगल शासनकाल में औरंगजेब ने जब धर्म-परिर्वतन और ’जजिया कर’ चलाया तो इन आदिवासियों ने इसका विरोध किया। सन् 1817 में भीलों ने खान देश पर आक्रमण किया और वह आंदोलन 1824 में सतारा और 1831 में मालवा तक चला गया।

सन् 1846 में जाकर अंग्रेज इस विद्रोह पर काबू पा सके। डूंगरपूर में ललोठिया तथा बांसवाड़ा, पंचमहाल (गुजरात) में गोबिंद गिरी ने धार्मिक आंदोलन चलाए। सन् 1812 में गोबिंद गिरी को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। उड़ीसा में ‘मलका गिरी’ का कोया विद्रोह सन् 1871-80 में हुआ। फूलबाने का खांडे विद्रोह (1850) में तथा साओरा का विद्रोह (1810-1940) में हुआ। ये विद्रोह आर्थिक शोषण के कारण हुए। सन् 1853 में संथाल-विद्रोह हुआ। सन् 1895 में मुंडा विद्रोह हुआ। सन्  1914 में उंरावों का ताना-भगत विद्रोह हुआ। मिजो आंदोलन लंबे समय तक चला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।

(जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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