मी लॉर्ड! खोरी में ‘कानून का शासन’ है या ‘कानून द्वारा शासन’?

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15 जुलाई की प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की अपने निर्वाचन क्षेत्र बनारस की भव्य यात्रा में शहर के लिए 1500 करोड़ से अधिक की विकास योजनाओं की सौगात शामिल थी। देश के एलीट और सुविधा प्राप्त वर्गों के लिए इससे अधिक आश्वस्त करने वाला सन्देश और क्या होगा कि कोरोना की दूसरी लहर के बाद सामान्य जीवन लौट रहा है। बेशक मोदी ने अब बनारस को क्योटो बनाने का जिक्र न किया हो पर वे बुलेट ट्रेन की याद दिलाना नहीं भूले। तीसरी लहर जब आएगी तब देखी जाएगी!

यही नहीं कि पंचतारा मॉल फिर गुलजार होने लगे हैं और पहाड़ों पर सैलानी उमड़ने लगे हैं। इतना ही नहीं कि धार्मिक यात्रा और सांप्रदायिक राजनीति एक बार फिर मीडिया की सुर्खियां बटोरने लगे हैं। दरअसल, देश की शासन व्यवस्था के सामान्य होने का सबसे बड़ा प्रमाण खोरी विस्थापन के रूप में सामने आया है। हरियाणा सरकार के फरीदाबाद नगर निगम की गुहार पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने जून में दिल्ली से लगे अरावली वन क्षेत्र के दस हजार घरों पर बुलडोज़र फेरने का हुक्म दे डाला। लिहाजा श्रमिक वर्ग के 50 हजार स्त्री, पुरुष, बच्चे 19 जुलाई तक डंडे के जोर पर विस्थापित कर दिए जायेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में इसी अरावली वन क्षेत्र के अतिक्रमणकारी सैकड़ों फार्म हाउसों, धार्मिक केन्द्रों और सितारा होटलों इत्यादि को शामिल करना जरूरी नहीं समझा। मुंह दिखाने के लिए राज्य सरकार ने खोरी के विस्थापितों के लिए एक पुनर्वास नीति की घोषणा की है, लेकिन इसके कार्यान्वयन की न कोई समय सीमा है और न इसके समन्वयन के लिए कोई विशेष कार्यालय। यानी उजड़े विस्थापितों को उसी लालफीताशाही प्रशासन और भू माफिया के दलाल रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है जिसने उन्हें आर्थिक रूप से निचोड़-निचोड़कर गत 30 वर्षों से खोरी में बसा रखा था।

खालिस कानून व्यवस्था के लिहाज से समाज पर किसका बोझ भारी पड़ेगा­- प्रधानमन्त्री की बनारस जैसी यात्रा का या खोरी जैसे विस्थापन का? बनारस में बंदोबस्त के नाम पर हजारों पुलिसवाले कई दिनों से जुटे रहे होंगे और करोड़ों रुपये खर्च हुए होंगे। खोरी में कई हफ़्तों से सैकड़ों पुलिस वाले लगे हैं और उन पर लाखों खर्च हो जायेंगे। यानी इस लिहाज से खोरी ऑपरेशन सस्ता पड़ा। लेकिन, क्या यह तुलना इतनी भर ही है? बनारस में किया गया निवेश कुछ न कुछ रोजगार भी पैदा करेगा। जबकि खोरी विस्थापन की कवायद से हताश बेरोजगारों का ऐसा दिशाहीन व्यापक जत्था जरूर निकलेगा जो अपराध की दुनिया में किस्मत आजमाएगा और वर्षों कानून व्यवस्था को छकाता रहेगा।

कानून पर अंग्रेजी में एक कहावत है, ‘Law is an ass’ यानी कानून गधा होता है। मतलब, कानून को चलाने वाला उसे जैसे चाहे हांकता रहता है। खोरी में ठीक यही हो रहा है। पुलिस ने अवैध रूप से वहां प्लाट बेचने वाले दलालों और उन्हें संरक्षण देने वाले भू माफियाओं के खिलाफ केस दर्ज किये हैं। वह भी शायद दिखावे के लिए ही क्योंकि आगे इनमें भी कुछ नहीं किया गया है। लेकिन, दशकों से यह सारा फर्जीवाड़ा तरह-तरह के प्रशासनिक और राजनीतिक माफिया संरक्षण में चल रहा था, उस पक्ष को जरूर पूरी तरह से अछूता छोड़ दिया गया है।

भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश पीवी रमना ने पिछले दिनों एक स्मृति व्याख्यान में ‘कानून का शासन’ और ‘कानून द्वारा शासन’ में अंतर की विद्वतापूर्ण व्याख्या की थी। ‘कानून का शासन’ एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है और ‘कानून द्वारा शासन’ औपनिवेशिक। पहले में कानून भेदभाव नहीं करता जबकि दूसरे में कानून का इस्तेमाल भेदभाव बनाये रखने में होता है। सर्वोच्च न्यायालय को कई मुख्य न्यायाधीशों के बाद रमना के रूप में एक साहसी और स्वतंत्र नेतृत्व मिला है। वे आसानी से देख सकते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय से महज 25-30 किलोमीटर दूर खोरी में भेदभाव का कैसा नंगा नाच हो रहा है, जहाँ केवल गरीब खोरी निवासियों को उजाड़ा गया जबकि पड़ोस के तमाम अमीर अतिक्रमणकारियों को स्पर्श भी नहीं किया गया।

उपरोक्त वक्तव्य में मुख्य न्यायाधीश रमना ने सभी को यह भी याद दिलाया था कि लोकतंत्र में कानून सार्वभौम राज्य के समर्थन से केवल सामाजिक नियंत्रण का काम करने के लिए ही नहीं हो सकता। उसमें न्याय (justice) और साम्य (equity) के तत्वों का समावेश होना भी अनिवार्य होता है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से खोरी निवासियों के कोरोना आपदा के बीच बिना पुनर्वास के विस्थापन को क्या कहा जाएगा? शायद यही कि देश सामान्य हो चला है?

(विकास नारायण राय हैदराबाद पुलिस एकैडमी के निदेशक रह चुके हैं।)

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