बीच बहस

बहुमूल्य प्राकृतिक सम्पदा लुटाने पर आमादा मोदी सरकार

रायपुर: लगातार विफल रही नीलामी प्रक्रिया के बावजूद मोदी सरकार ने कामर्शियल कोल माइनिंग के लिये दूसरे चरण की नीलामी प्रक्रिया शुरु कर 67 खदानों को बोली पर लगाया है, जिसमें छत्तीसगढ़ की 18 खदानें शामिल हैं। हालांकि कोयला खदानों की नीलामी वर्ष 2012 से होती आयी है, लेकिन बिना अंत-उपयोग निर्धारित किए मात्र निजी मुनाफे के लिये यह दूसरी बार प्रक्रिया चलाई जायेगी। गौरतलब है कि पिछले चरण की प्रक्रिया में आधी से कम खदानें ही आवंटित हुई, और विश्लेषकों ने कम बोलीदारों की संख्या तथा गैर-प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया के चलते कम बोली दरों पर कई सवाल उठाए थे। ऐसे में पिछली प्रक्रियाओं से सीख लिये बिना ही और बिना किसी बुनियादी ज़रूरत के बगैर नई नीलामी प्रक्रिया की शुरुआत और उसमें और भी लचीले नियम सरकार की मंशा पर गम्भीर सवाल उठाता है – क्या इसकी कड़ी देश की सभी आर्थिक और प्राकृतिक सम्पदा को बेच निकलने की मोदी सरकार की नीतियों से जुड़ी है? क्या नियमों को बेहद लचीला बनाकर और गैर-प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया के ज़रिये कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने की यह साज़िश है? क्या यह कोरोना काल की आपदा को खनन कंपनियों के लिए अवसर में बदलने की एक और कोशिश है? या फिर अपनी आर्थिक नीतियों की विफलताओं को छुपाकर किसी भी तरह लाभ-धन जुटाने का एक और भद्दा प्रयास है?

क्या थे पिछ्ली प्रक्रिया के अनुभव? पिछ्ले साल जून माह में कोरोना के चरम-सीमा पर पहुंचने के बीचों-बीच व्यापक प्रचार-प्रसार से मोदी सरकार ने कामर्शियल कोल माइनिंग के लिए प्रथम चरण की नीलामी की घोषणा की थी। उस समय दावे किए थे कि खदान नीलामी आत्मनिर्भर भारत और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की ओर एक क्रांतिकारी कदम है। हालांकि इसके तुरंत बाद सभी ओर से इसका विरोध शुरु हो गया – विश्लेषकों ने बतलाया कि यह गलत समय है और भारत को इस पैमाने पर कोयला ज़रूरत ही नहीं है, जनांदोलनों और मीडिया ने इससे जुड़े पर्यावर्णीय तथा सामाजिक सवालों को उठाकर प्रक्रिया पर गम्भीर आरोप लगाये, तीन राज्य सरकारों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया और इस सम्बन्ध में झारखण्ड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई जो केस अभी तक लम्बित है। यहां तक कि कई खनन कंपनियों ने भी कोयला की मांग-पूर्ति की स्थिति का हवाला देकर प्रक्रिया पर चिंतायें जताईं। सभी तरफ़ से विरोध के बीच केंद्र सरकार ने छः खदानों को, यह मानते हुए कि इससे बहुत गम्भीर पर्यावर्णीय दुष्प्रभाव होंगे, नीलामी सूची से बाहर भी किया। परंतु फिर भी नीलामी के लिये 38 खदानों के लिये बोलियां आमंत्रित की गयी जिनमें बहुत सी खदानें संवेदनशील इलाकों में थी और अनेकों जगह भारी जन-विरोध था।

ऐसे में जैसा कि छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने पूर्वानुमान लगाया था, यह नीलामी प्रक्रिया पूरी तरह अपने सभी कथित उद्देश्यों पर विफल रही। जिन 38 खदानों के लिये बोलियां आमंत्रित की गई, उनमें से केवल आधे यानी 19 खदानों पर ही न्यूनतम बोलीदार सामने आए जिसके कारण बाकी खदानों की प्रक्रिया को रद्द करना पड़ा। गौरतलब है कि इस बार नियमों को लचीला बनाने हेतु न्यूनतम बोलिदारों की संख्या मात्र दो रखी गई थी जो कि पिछले नीलामी प्रक्रिया से भी कम है। वही दूसरी ओर यदि नीलामी की बोली- दरों पर नज़र डालें तो साफ है कि बाकी की 19 खदानों को कौड़ी के भाव पर बेच दिया गया। अधिकांश खदानों के लिये बोली अनुसार केवल 10-30% आय का हिस्सा ही राज्य सरकारों को दिया जायेगा जो कि पिछली नीलामी की दर तथा कोयले के वास्तविक मूल्य से बहुत कम है। स्पष्ट रूप से जब आवंटित और संचालित कोल ब्लॉक से ही देश की जरूरत का कोल उपलब्ध है उस स्थिति में इस नीलामी प्रक्रिया की कोई आवश्यकता नहीं थी। यह सिर्फ बहुमूल्य खनिज संसाधनो को कारपोरेट को सौपने की कोशिश है जिसका छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन पुरजोर विरोध करता है।

क्यों विफल हुई नीलामी?

नीलामी प्रक्रिया के विफलताओं के अनेक कारण हैं –

1. देश में इतने पैमाने पर कोयले की ज़रूरत ही नहीं है जिसका जिक्र CEA, कोल इंडिया लिमिटेड vision-2030, तथा अन्य विश्लेषकों ने किया है। गौरतलब है कि 2015 के बाद आवंटित 72 में से सिर्फ 20 खदानें ही चालू हो पाई हैं जबकि 50 से अधिक खदानें अभी तक खनन शुरु नहीं कर पाई हैं। यदि ये खदानें शुरु हुई तो लगभग 320 मिलियन टन का उत्पादन बढ़ जायेगा जो कि भारत की वर्तमान कोयला ज़रूरतों से बहुत ज़्यादा है ।

2. कोयला क्षेत्र की अधिकांश कंपनियाँ या तो दिवालिया हो चुकी हैं या आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। वहीं विदेशी कंपनियों ने भी कोरोना के समय में कोई रुचि नहीं दिखायी। ऐसे में बोलीदारों का अभाव रहा जिसके कारण केवल चार खदानों को ही पांच से अधिक बोलियां मिली जबकि कुल 10 के लिये ही तीन से अधिक बोलियां लगाई गई ।

3. नीलामी में रखी ज़्यादातर खदानों के पास पर्यावरण तथा वन स्वीकृतियाँ नहीं थी जिससे बोलीकारों को अधिक जोखिम उठाना पड़ रहा था।

4. नीलामी की विफलता का एक कारण यह भी था की सरकार ने MDO के जरिये चुनिन्दा कंपनियों के लिए पिछले दरवाज़े का रास्ता खोला जिसमें जोखिम कम और मुनाफा अधिक था।

5. कोविड के इस संकट में जब विश्व कि अर्थव्यवस्था लगभग मृतप्राय हो, कॉरपोरेट अपने लिये पैकेज कि मांग कर रहे हैं, उस स्थिति में नीलामी के सफल होने की उम्मीद वैसे भी कम ही थी, इसी कारण झारखंड समेत कई राज्यों ने इसे स्थगित करने की पहले ही मांग की थी।

क्या है वर्तमान नीलामी प्रक्रिया का असली सबब ?

नीलामी से जुड़े सभी तथ्यों से यह तो स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया का सम्बन्ध तथाकथित देश की या जन-समुदाय की आत्मनिर्भरता से कोई लेना-देना नहीं है। ना ही भारत की कोयला ज़रूरतों या आर्थिक हितों को ध्यान में रखा गया है। ना ही राज्यों से कोई चर्चा – सहमति ली गई है। ना ही प्रतिस्पर्धा बढ़ाकर कोयले के असली मूल्य निकालकर राज्यों को आर्थिक-हित देने का कोई भी प्रयास है – इस प्रक्रिया में तो यूं माने कि पूर्णतया प्रतिस्पर्धा खत्म ही कर दी गई है। रोलिंग यानि नित्य प्रक्रिया के चलते अब जो कंपनी जब चाहे तब न्यूनतम बोलीदार एकत्रित कर मनचाहे दामों पर खदान ले सकेगी ।

ऐसे में साफ है कि इसका उद्देश्य कुछ निजी कंपनियों को आपदा को अवसर में बदलने का एक और मौका दिया जा रहा है और सरकार देश की सारी धन-संपदा को चुनिंदा कॉरपोरेट साथियों को बेचने की नीति में एक और प्रयास कर रही है। वहीं दूसरी ओर सबसे ज़्यादा दुष्प्रभाव खदान क्षेत्रों के पर्यावरण तथा आदिवासी समुदायों के विस्थापन पर पड़ेंगे। साथ ही यहां की ग्राम सभाएं अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर लगातार खनन का विरोध करती आई हैं, और पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में ज़ाहिर है कि जन-विरोध को दरकिनार कर की हुई यह निलामी प्रक्रिया अपने आप में कानून और संविधान की धज्जियां उड़ाने के समान है। अब ऐसे में देखें यह है कि छत्तीसगढ़ राज्य सरकार इस पर क्या रुख उठाती है – क्या वह छत्तीसगढ़ राज्य तथा यहां के गरीब-आदिवासी समुदाय के हक में आवाज़ उठायेगी या फिर वह भी कॉरपोरेट घरानों और केंद्र सरकार के सामने अपने घुटने टेक देगी।

-छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन संगठन के प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित

This post was last modified on April 1, 2021 6:04 pm

Share
Published by