Monday, January 24, 2022

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मोदी की बौखलाहट का नतीजा है पीएम से जुड़ा पंजाब सुरक्षा प्रकरण

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एक देश के प्रधानमंत्री से सबसे पहली उम्मीद यह की जाति है कि उसके बयान प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुकूल हों, न कि वह किसी गली के गुंडे की तरह अनाप-शनाप बके। पंजाब में प्रधानमंत्री के काफिले के रूकने के संदर्भ में उनका  यह कहना कि “अपने सीएम (चरणजीत सिंह चन्नी) को थैंक्स कहना कि मैं बठिंडा एयरपोर्ट तक जिंदा लौट पाया।” प्रधानमंत्री का यह कथन सीधे-सीधे इस बात की ओर व्यंग्यात्मक इशारा है कि पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने उन्हें मारने की कोई योजना बनाई थी और वे उसमें असफल हुए। प्रधानमंत्री के इस कथन को शायद ही कोई तर्कशील और विवेकवान व्यक्ति स्वीकार कर पाए और इस बयान को प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुकूल माने।

आखिर प्रधानमंत्री ने यह बात क्यों कही? इसकी पहली वजह तो यह लगती है कि प्रधानमंत्री यह कहकर कि वे मरते-मरते बचे लोगों की सहानुभूति अर्जित करना चाहते हैं। आखिर इस स्तर पर जाकर प्रधानमंत्री को सहानुभूति अर्जित करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इसकी दो वजहें पहली तो यह कि प्रधानमंत्री दिन-प्रतिदिन अपनी लोकप्रियता खो रहे हैं,  इंडिया टुडे ने अपने मूड ऑफ द नेशन पोल का पिछले वर्ष नतीजा जारी क‍िया था। सर्वे में पूछा गया था कि भारत के लिए सबसे उपयुक्त अगला पीएम कौन होना चाहिए? जवाब में अगस्त 2021 में 24 फीसदी लोगों ने मोदी को अपनी पहली पसंद बताया, जबकि जनवरी 2021 में वह इस मामले में 38 फीसदी लोगों की पसंद थे। वहीं, अगस्त 2020 में पीएम के लिए 66 फीसदी जनता ने मोदी को अपनी पहली पसंद बताया था।

शायद ही कोई इससे इंकार कर पाए कि प्रधानमंत्री लगातार अपनी लोकप्रियता खो रहे हैं और भाजपा को चुनाव जिताने की उनकी क्षमता कमजोर पड़ती जा रही है और करिश्माई व्यक्तित्व का उनका आभामंडल निरंतर धूमिल पड़ रहा है। आरएएस-भाजपा की सारी ताकत, कार्पोरेट के अकूत धन और सरकारी एजेंसियों की बेजा इस्तेमाल के बाद भी बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की जीत, उसके पहले दिल्ली में केजरीवाल की आदम आदमी पार्टी की जीत, बिहार में सारे तीन-तिकड़म के बाद बहुत ही कम अंतर से राजद की हार और 13 राज्यों के 29 विधान सभा सीटों के उपचुनावों में भाजपा की सापेक्षिक पराजय ने प्रधानमंत्री को बुरी तरह से मनोवैज्ञानिक तौर पर हताश कर दिया है। देशव्यापी स्तर पर किसान आंदोलन के व्यापक असर के सामने घुटने टेकने की स्थिति ने भी प्रधानमंत्री को गहरे स्तर तक बेचैन किया है। निकट भविष्य में उत्तर प्रदेश और अन्य प्रदेशों के चुनावों में आसन्न हार की आहट ने भी प्रधानमंत्री को भीतर-भीतर मनोवैज्ञानिक तौर पर बौखलाहट की स्थिति में डाल दिया है।

प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता में गिरावट और चुनाव जिता पाने की क्षमता लगातार कमजोर पड़ने के साथ ही नरेंद्र मोदी सभी मोर्चों पर लगातार असफल साबित हो रहे हैं। 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में अपने चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री ने विकास को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था और उसके साथ हिंदुत्व के मुद्दे का मेल किया था। विकास के मुद्दे पर प्रधानमंत्री पूरी तरह असफल साबित हुए हैं। अर्थव्यवस्था लगातार रसातल में जा रही है। बेरोजागारी नित नए रिकॉर्ड बना रही है, देश की बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे चली गई है, भूख, गरीबी और कुपोषण के मामले में भारत दुनिया के सबसे बदतरक देशों की सूची में शामिल हो गया है। शिक्षा और स्वास्थ्य की हालत बद से बदतर होती जा रही है। वैदेशिक संबंधों के मामले में भारत अलग-थलग पड़ता जा रहा है और एक भी पड़ोसी देश ऐसा नहीं रह गया है, जिसे भारत अपना विश्वसनीय सहयोगी कह सके। चीन भारत के नए क्षेत्रों पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर रहा है, नेपाल भी भारत के कुछ हिस्सों पर अपना दावा प्रस्तुत कर रहा है।

अपनी मजबूत अर्थव्यस्था के दम पर चीन भारत के पड़ोसी देशों के साथ अपने गहरे रिश्ते बना चुका है और दुनिया में भी उसका दबदबा है। आजादी के बाद भारत की एकमात्र सबसे बड़ी उपलब्धि राजनीतिक लोकतंत्र की निरंतरता और विस्तार की साख पर भी गहरे धब्बे लग चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र की स्तंभ संवैधानिक संस्थाओं ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, जिसमें चुनाव आयोग भी शामिल है। विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारतीय लोकतंत्र को चुनी तानाशाही की संज्ञा दे रही हैं। मुख्यधारा की भारतीय मीडिया के बहुलांश हिस्से ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर अपनी साख खो दी है। 2014 में नरेंद्र मोदी ने जितने सपने दिखाए थे, वे सब धूल-धूसरित हो चुके हैं। इन सच्चाइयों से प्रधानमंत्री जरूर ही रूबरू होंगे।

प्रधानमंत्री के पास अपनी लोकप्रियता बनाये रखने के लिए सिर्फ और सिर्फ एक मुद्दा हिंदुत्व और हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का बचा है, जो देश को, वैमनस्य, अराजकता और गृहयुद्ध  की ओर धकेल रहा है। नरेंद्र मोदी को इस तथ्य का जरूर अहसास होगा हिंदुत्व की राजनीति पर सवार होकर नरेंद्र मोदी ज्यादा दिन अपनी नैया पार नहीं लगा सकते हैं, न अपनी लोकप्रियता बरकरार रख सकते हैं और न ही भाजपा को चुनावी सफलता दिला सकते हैं। हिंदुत्व के मामले में उनसे होड़ करने वाले योगी आदित्यनाथ जैसे नेता भी उन्हें चुनौती दे रहे हैं। इंडिया टुडे सर्वे के पोल में जहां नरेंद्र मोदी 24 प्रतिशत लोगों की पसंद हैं, वहीं योगी आदित्यनाथ भी 11 प्रतिशत लोगों की पसंद हैं।

इस पूरे हालात ने नरेंद्र मोदी को गहरे स्तर पर हताश कर दिया है, उन्हें लग रहा है कि भाजपा और देश में उनकी बादशाहत का युग अवसान की ओर है, थोड़ा देर सबेर उन्हें सिंहासन खाली करना होगा, लेकिन नरेंद्र मोदी जैसा आत्ममुग्ध और अति महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व तथा एक हद तक कुंठित व्यक्तित्व इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं है और किसी भी तरह से अपनी नायक की छवि बनाए रखना चाहते हैं। “अपने सीएम (चरणजीत सिंह चन्नी) को थैंक्स कहना कि मैं बठिंडा एयरपोर्ट तक जिंदा लौट पाया।” यह कथन प्रधानमंत्री के हताश मनोविज्ञान की एक अभिव्यक्ति है। लेकिन खतरा यह है कि प्रधानमंत्री का यह हताश मनोविज्ञान उन्हें किसी भी स्तर पर ले जा सकता है, कोई भी हताशा भरा कदम उठाने की तरफ बढ़ सकता है, जो देश के लिए बहुत ही खतरनाक होगा।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक सलाहकार संपादक हैं।)

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